कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
About this granth
The Kaushika Sutra (कौशिक गृह्यसूत्रम्) is the domestic ritual manual of the Atharvaveda in the Shaunaka tradition. Besides the usual life-cycle rites and household offerings, it prescribes the use of Atharvan hymns for healing, averting harm, prosperity, building a house, rites concerning women and expiation of evil omens, which makes it a rich source for daily life, medicine and belief in the Vedic period.
This edition gives the sutras with the brief Sanskrit commentary of Darila and Keshava and a Hindi translation by Thakur Udaynarayan Singh, translator also of the Sarvadarshanasangraha and Surya Siddhanta. He published it from his Shastraprakash Bhavan at Mathurapur, Muzaffarpur (Bihar), and it was printed at the Jyotish Prakash Press, Benares. The dedication says the edition first printed in America was brought out in India with Hindi through the support of Babu Umashankar of Muzaffarpur.
A detailed Hindi table lists the rites section by section, from rites for intelligence and preparing consecrated water to house-building, pumsavana, a child's teething, and remedies for portents such as eclipses, famine and cholera.
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १०७
मुखादीनि गात्राणि प्रक्षालयते ॥१८॥ मुखं शुन्धस्व देव-
यज्याया इति ॥१९॥ प्राणानिति नासिके ॥२०॥ चक्षुरि-
ति चक्षुषी ॥२१॥ श्रोत्रमिति कर्णौ ॥२२॥ यत्ते क्रूरं यदा-
स्थितमिति समन्तं रज्जुघानम् ॥२३॥ चरित्राणीति पा-
दान्समाहृत्य ॥२४॥ नाभिमिति नाभिम् ॥२५॥ मेढ्र-
मिति मेढ्रम् ॥२६॥ पायुमिति पायुम् ॥२७॥ यत्ते क्रूरं यदा-
स्थितं तच्छुन्धस्वेत्यवशिष्टाः पार्श्वदेशोऽवसिच्य यथार्थं
व्रजति ॥ २८ ॥ वपाश्रपण्यावाज्यं स्रुवं स्वधितिं दर्भ-
मादायाभिव्रज्योत्तानां परिवर्त्मानुलोमं नाभिदेशे द-
र्भमास्तृणाति ॥२९॥ ओषधे त्रायस्वैनं स्वधिते मैनं हिं-
सीरिति शस्त्रं प्रयच्छति ॥३०॥ इदमहमामुष्यायणस्यामु-
ष्याः पुत्रस्य प्राणापानावपकृन्तामीत्यपकृत्य ॥ ३१ ॥
अधरप्रवस्केन लोहितस्यापहृत्य ॥ ३२ ॥ इदमहमामुष्या-
मुख आदि अङ्गों को प्रक्षालन करे ॥१८॥ “मुखं शुन्धस्व०” इत्यादि,
“प्राणान्” से नासिका के दोनों छिद्रों को प्रक्षालन करे ॥१९॥२०॥
“चक्षुः०” से दोनों आँखें ॥२१॥ “श्रोत्रं०” से दोनों कानों को ॥२२॥
“यत्ते क्रूरं यदास्थितं०” से गर्दन के सब बन्धन स्थानों को प्रक्षालन
करे ॥२३॥ “चरित्राणि०” से दोनों पैरों को समिट कर प्रक्षालन करे
॥२४॥ “नाभिम्०” से नाभि को ॥२५॥ “मेढ्रम्०” से मेढ्र को ॥२६॥
“पायुं०” से पायु ( मल स्थान ) ॥२७॥ “यत्ते क्रूरं यदास्थितं तच्छु-
न्धस्व०” से अवशिष्ट अङ्गों को, पार्श्व देश में अवसेचन कर जहाँ
इच्छा हो जावे ॥२८॥ वपाश्रपणी दो, आज्य, स्रुव, उस्तुरा कुश इन को
ले जाकर उत्तान वशा के लोमानुगत लक्षित नाभि देश में कुशों से
आस्तरण करे ॥२९॥ “ओषधे त्रायस्व०” इत्यादि पढ़ कर और मारने
वाले के हाथ में शस्त्र देवे ॥३०॥ “इदमहमामुष्यायणस्य०” इत्यादि से
नाभि देश को काटे ॥३१॥ एवं नीचे के अप्रवस्क से लोहित को
दूर कर ॥३२॥ “इदमहमामुष्या०” इत्यादि से दर्भ के अधर खण्ड
से लोहित को छूकर दूसरे मंत्र से—लोहित लिप्त दर्भ खण्ड को (श्लेष्म
१०८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
यणस्यामुष्याः पुत्रस्य प्राणापानौ निखनामीत्यास्ये नि-
खनति ॥ ३३॥ वपया द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथामिति वपा-
श्रपण्यौ वपया प्रच्छाद्य ॥ ३४ ॥ स्वधितिना प्रकृत्यो-
त्कृत्य ॥३५॥ आव्रस्कमभिघार्य ॥३६॥ वायवे स्तोकाना-
मिति दर्भाग्रं प्रास्यति ॥३७॥ प्रत्यूष्टं रक्ष इति चरुमङ्गा-
रे निदधाति ॥३८॥ देवस्त्वा सविता श्रपयत्विति श्रप-
यति ॥३९॥ सुशृतां करोति ॥४०॥८॥४४॥
यद्यष्टापदी स्याद्गर्भमञ्जलौ सहिरण्यं सयवं वा य
आत्मदा इति खदायां त्र्यरत्नावग्नौ सकृज्जुहोति ॥ १ ॥
विशस्य समवत्तान्यवद्येत् ॥ २ ॥ हृदयं जिह्वा श्येनश्च
दोषी पार्श्वे च तानि षट् । यकृद्वृक्कौ गुदश्रोणी तान्येका-
दश दैवतानि ॥३॥ दक्षिणः कपिल्लाटः सव्या श्रोणिर्गु-
दञ्च यः॥ एतानि त्रीणि त्र्यङ्गानि स्विष्टकृद्भाग एव ॥४॥
श्रपण में धरे हुए को ) आस्य स्थान को निखनन करे ॥३३॥
“वपया द्यावा०” इत्यादि मंत्र से वपाश्रपणियों को वपा से ढाक देवे
॥३४॥ उस्तुरे से जहाँ से वपा को निकाला था उसी देश को आव्रस्क
को अभिघारण करके ' वायवे०' इत्यादि से प्राशन करे। नाभि देश में
पहिले धरा हुआ दर्भाग्नि को अनियत देश में फेके । ॥३५॥३६॥३७॥
“प्रत्यूष्टं रक्ष०” से चरु को आग पर धरे ॥३८॥ “देवस्त्वा सविता०”
इत्यादि से श्रपण करे और भली भाँति पकावे ॥३९॥४०॥८॥४४॥ यह
चौवालिसवीं कण्डिका पूरी हुई ।
“यद्यष्टापदी स्याद्०” इत्यादि से गर्त्त में तीन अन्तरियों को एकवार
अग्नि में आहुति देवे ॥१॥ काट काट कर समवत्तों को टुकड़े करे ।
हृदय, जिह्वा, श्येन, दोषी, दोनों पार्श्व, ये छः यकृत्, वृक्क-दो, गुद-
श्रोणी अर्थात् दोश्रोणी,, ये ग्यारह पशु के अंग लिये जाते हैं । इनमें
से स्विष्टकृत् के लिये तीन अवदान ग्रहण किये जाते हैं । जैसे-दहिना
बाहु, वाम जंघा, और अन्त्र विभाग । इन टुकड़ों में से चिह्नित टुकड़े
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १०९
तदवद्य प्रज्ञातानि श्रपयेत् ॥५॥ होष्यन् द्विर्द्विर्देवतानाम-
वद्येत् ॥६॥ सकृत्सकृत्सौविष्टकृतानाम् ॥ ७ ॥ वपायाः
समिद्ध ऊर्ध्वा अस्येति जुहोति ॥ ८ ॥ युक्ताभ्यां तृती-
याम् ॥९॥ आनुमतीं चतुर्थीम् ॥ १० ॥ जातवेदो वपया
गच्छ देवांस्त्वं हि होता प्रथमो बभूथ । घृतस्याग्ने त-
न्वा सम्भव सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः स्वाहा॥११॥
ऊर्ध्वं नभसं मारुतं गच्छतमिति वपाश्रपण्यावनुप्रहर-
ति ॥१२॥ प्राचीमेकशृङ्गां प्रतीचीं द्विशृङ्गाम् ॥१३॥ पि-
त्र्येषु वह वपां जातवेदः पितृभ्यो यत्रैतान् वेत्थ निहितान्
पराके। मेदसः कुल्या उप तान् स्रवन्तु सत्या एषामाशिषः
सन्तु कामाः स्वाहा स्वधेति वपायास्त्रिर्जुहोति ॥१४॥ स-
मवत्तानाम् ॥१५॥ स्थालीपाकस्य सम्राडस्यधिश्रयणं नाम
सखीनामभ्यहं विश्वा आशाः साक्षीय ॥ कामोऽसि कामाय
त्वा सर्ववीराय सर्वपुरुषाय सर्वगणाय सर्वकामाय
को ले २ कर श्रपण करे ॥५॥ इसके अनन्तर जिस देवता के निमित्त पशु
हो—उसी देवता के नाम चरु पकाना चाहिये। होम करते समय हृद-
यादि के दो २ टुकड़े करा २ कर आहुति देवे ॥६॥ और एक २ बार स्विष्ट-
कृत्-खण्डों की आहुतियाँ देवे ॥७॥ “वपायाः समिद्ध ऊर्ध्वा अस्य०”
से एक मंत्र से—पहिली और दूसरे मंत्र से दूसरी आहुति करे ॥८॥
तीसरी आहुति मिले हुए मंत्रों से, चौथी “अनुमतिः सर्व०” से आहुति
करे ॥९॥१०॥ “जातवेदो वपया०” इत्यादि से एक बार आज्य की
आहुति करे ॥११॥ “ऊर्ध्वं नभसं मारुतं गच्छतं” से वपा श्रपणी में डाले
॥१२॥ पूर्वाग्र करके एक वपा श्रपणी से और पश्चिमाग्र करके दोनों
वपाश्रपणी को साथ करके आहुति देवे ॥१३॥ परन्तु पितृ कार्य में—
“वह वपां०” इत्यादि से वपा की तीन बार आहुतियाँ करे ॥१४॥ तब
समवत्तों से आहुतियाँ करे ॥१५॥ “स्थाली पाकस्य०” इत्यादि से आहुति
करे। फिर “अन्वद्य नो०” इत्यादि से आहुति देवे। “सम्राट्०” मंत्र से
आज्य की आहुति देवे। और “सर्ववीराय०” से चार आहुतियाँ देने।
११० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
जुहोमि ॥ अन्वद्य नोऽनुमतिः पूषा सरस्वती मही ।
यत्करोमि तद्ध्यतामनुमतये स्वाहेति जुहोति ॥१६॥ क
इदं कस्मा अदात् कामस्तदग्रे यदन्नं पुनर्मैत्विन्द्रियमिति
प्रतिगृह्णाति ॥१७॥ उत्तमा सर्वकर्मा ॥१८॥ वशाया
पाकयज्ञा व्याख्याताः ॥१९॥९॥४५॥
उतामृतासुः शिवास्त इत्यभ्याख्याताय प्रयच्छति
॥१॥ द्रुघणशिरो रज्ज्वा बध्नाति ॥२॥ प्रतिरूपं पलाशायो-
लोहहिरण्यानाम् ॥३॥ येन सोमेति याजयिष्यन् सारू-
पवत्समश्नाति ॥ ४ ॥ निधने यजते ॥ ५ ॥ यं याचामि
यदाशासेति याचिष्यन् ॥६॥ मन्त्रोक्तानि पतितेभ्यो देवाः
वशा शान्ति कर्म समाप्त हुआ । जिस घर में वशा होती है—उस घर के
धनादि का नाश होता है इसलिये शान्ति करनी चाहिये ॥१६॥ “क इदं
कस्मा०” इत्यादि से प्रतिग्रह को ग्रहण करे ॥१७॥ सब ही कम्मों में—
इस सूक्त से प्रतिग्रह आदि ग्रहण करे ॥१८॥ इस वशा के द्वारा पशु-
पाकयज्ञों का व्याख्यान हुआ जानना ॥१९॥९॥४५॥ यह पैतालिसवीं
कण्डिका समाप्त हुई ॥
“उतामृतासुः०” इत्यादि से अभ्याख्यात (जिसको झूठा कह कर
कि इसने प्रतिषिद्ध कर्म किये हैं) पुरुष के लिये मंथनी देवे ॥१॥ और
द्रुघण शिर (पलाश सदृश) काला लोहा, तामा, सोना इनसे द्रुघण
शिर की भाँति (प्रतिकृति) मणि बना कर कृष्ण लोह मणि, ताम्र मणि,
हिरण्य मणि, द्रुघण प्रतिरूप बना कर अभिमंत्रण कर अ० पुरुष को
बान्धे । परन्तु यह स्मरण रखना चाहिये कि इस ग्रंथ में जहाँ २
एककार्य के लिये एक साथ अनेक कर्म करने का विधान है वहां २
उनमें से किसी एक को करे या सब को करे ॥२॥३॥ “येन सोम०”
से याग करना हो तो सारूपवत्सा गौ के दूध को ऋत्विगगण तथा
यजमान खावें । जिससे याग में विघ्न न हो ॥४॥ याग की समाप्ति
में सोम देवत्य चरु बना कर आहुति करे ॥५॥ जिससे कुछ मांगे
वह अवश्य देवे अस्वीकार न करे । ऐसी कामना के लिये सारूपवत्सा
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १११
कपोत ऋचा कपोतममून्येतिरिति महाशान्तिमावपते
॥७॥ परीमेऽग्निमित्यग्निं गामादाय निशि कारयमाण-
स्त्रिः शालां परिणयति ॥८॥ परोऽपेहि यो न जीव इति
स्वप्नं दृष्ट्वा मुखं विमार्ष्टि ॥९॥ अतिघोरं दृष्ट्वा मैश्रधान्यं
पुरोडाशमन्याशायां वा निदधाति ॥१०॥ पर्यावर्त इति
पर्यावर्तते ॥११॥ यत्स्वप्न इत्यशित्वा वीक्षते ॥१२॥
विद्मा ते स्वप्नेति सर्वेषामप्ययः ॥१३॥ न हि ते अग्ने
तन्व इति ब्रह्मचार्याचार्यस्यादहन उपसमाधाय त्रिः
परिक्रम्य पुरोडाशं जुहोति ॥१४॥ त्रिरात्रमपर्यावर्तमानः
शयीत ॥१५॥ नोपशयीतेति कौशिकः ॥१६॥ स्नानी-
याभिः स्नायात् ॥१७॥ अपर्यवेतव्रतः प्रत्युपैयात् ॥१८॥
के दूध में पायस बनाकर अभिमंत्रण कर खावे ॥६॥ कपोत, उलूक यदि
घर पर बैठे उसकी महाशान्ति कही है। कृत्या प्रहरण की भाँति इसकी महा-
शान्ति करे ॥ शान्ति उदक में आवपन कर तब मातली की मूर्त्ति बना
कर के रात्रि में उस शान्ति उदक से उस स्थान को “यतायै०” मंत्रों से
प्रोक्षण करे जहाँ तक कपोत, उलूक बैठा हो ॥७॥ और “परीमेऽग्निं०”
गौ को लाकर रात्रि में तीन बार उसे शाला की परिक्रमा करावे या
कपोत स्थान के चारो ओर घूमावे ॥८॥ यदि बुरा स्वप्न देखे तो “परो-
ऽपेहि यो न जीव”० से अपने मुख का मार्जन करे ॥९॥ यदि अत्यन्त
घोर स्वप्न देखे तो मैश्रधान्य को पुरोडाशको अन्यशाला में रक्खे ॥१०॥
जिस करवट होकर सोने में स्वप्न देखा था उससे करवट बदल कर “पर्या-
वर्त०” मंत्र का जप कर सोवे ॥११॥ आचार्य के मरने पर ब्रह्मचारी
“अग्निर्भूम्यां०” इत्यादि से पाँच सामिधेनी की आहुति देकर तब दहन
को तीन फेरा लगाकर “न हि ते अग्ने तन्व०” सूक्त के अन्त में पुरो-
डाश की आहुति उस दहन में देवे ॥ और तीन रात तक गुरु की मृत्यु
जहाँ हुई है उस स्थान के पार्श्व में ब्रह्मचर्यसे शयन करे ॥१५॥ कौशिका-
चार्य्य कहते हैं—“न सोवे” ॥१६॥ “अपो दिव्या०” से चार ऋचाओं
से स्नान करके तीन रात्रि घर पर आकर सोवे यह कौशिकाचार्य्य का
११२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
अवकीर्णिने दर्भशुल्बमासज्य यत्ते देवीत्यावपति ॥१९॥
एवं सम्पातवतोदपात्रेणावसिच्य ॥२०॥ मन्त्रोक्तं शान्त्यु-
दकेन सम्प्रोक्ष्य ॥२१॥ सं समिदिति स्वयंप्रज्वलितेऽग्नौ
॥२२॥ अग्नी रक्षांसि सेधतीति सेधन्तम् ॥२३॥ यद-
स्मृतीति संदेशमपर्याप्य ॥२४॥ प्रत्नो हीति पापनक्षत्रे
जाताया मूलेन ॥२५॥ मा ज्येष्ठं तृते देवा इति परिवि-
त्तिपरिविविदानावुदकान्ते मौञ्जैः पर्वसु बद्ध्वा पिञ्ज-
लीभिराप्लावयति ॥२६॥ अवसिञ्चति ॥२७॥ फेनेषूत्तरा-
न्पाशानाधाय नदीनां फेनानिति प्रप्लावयति ॥२८॥ सर्वैश्च
प्रविद्व्यापां सूक्तैः ॥२९॥ देवहेडनेन मन्त्रोक्तम् ॥३०॥
भाचार्याय ॥३१॥ उपदधीत ॥३२॥ खदाशयस्यावपते॥३३॥
मत है ॥१७॥ असमाप्त ब्रह्मचर्य वाला ब्रह्मचारी फिरसे उपनयन करे
॥१८॥ अवकीर्णी ( मैथुन करने से भ्रष्ट ब्रह्मचारी ) के गले में डाभ की
रस्सी को डाल “यत्ते देवी०” से तिल की आहुती देवे ॥१९॥ इसी प्रकार
सम्पात वाले जलपात्र से गले की रस्सी को सिंचन कर के रस्सी को गले
से खोल देवे ॥२०॥ मन्त्रोक्त शान्तिजल से सम्प्रोक्षण करे ॥२१॥ “सं
समिद्०” से स्वयं प्रज्वलित अग्नि में हो तो उसी में एक बार हवन
करे ॥२२॥ “अग्नी रक्षांसि सेधति०” से उसी अग्नि का हाथ से उप-
स्थान करे ॥२३॥ यदि किसी सन्देश ( समाचार कहने को लावे और
उसे भूल से न कहे ) को भूल जावे तो “यदस्मृति०” से आहुति देवे
॥२४॥ ज्येष्ठादि पाप नक्षत्रों में से मूल नक्षत्र में सन्तान पैदा हो तो
जात कुमार के लिये “प्रत्नो हि०” से आहुति देवे ॥२५॥ यदि बड़े भाई
के रहते छोटे भाई विवाह कर लेवे तो जल के पास मूँज के पांशों से
शरीर की सन्धियों में बान्ध कर सम्पात वाले जल से कुश की पिंजुली
से नहावे ॥२६॥ और उसी से अवसिंचन करे ॥२७॥ नदी के फेनों पर
उन मूँज के पाशों को स्थापन करके “नदीनां फेनान्०” से उसको
बहावे ॥२८॥ जल सूक्तों से घड़े को धर कर अभिमंत्रण करके आप्लावन
करे ॥ २९ ॥ “यद्देवा देवहेडनं०” अनुवाक से मेदस्वता स्रुच से
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ११३
वैवस्वतं यजते ॥३४॥ चतुःशरावं ददाति ॥३५॥
उत्तमर्णं मृते तदपत्याय प्रयच्छति ॥३६॥ सगोत्राय
॥३७॥ श्मशाने निवपति ॥३८॥ चतुष्पथे च ॥३९॥
कक्षानादीपयति ॥४०॥ दिवो नु मामिति वीप्रुबिन्दून्प्र-
क्षालयति ॥४१॥ मन्त्रोक्तैः स्पृशति ॥४२॥ यस्योत्तम-
दन्तौ पूर्वौ जायेते यौ व्याघ्रावित्यावपति ॥४३॥ मन्त्रो-
क्तान् दंशयति ॥४४॥ शान्त्युदकश्लृतमादिष्टानामाश-
यति ॥४५॥ पितरौ च ॥४६॥ इदं यत्कृष्ण इति शकुनिनाधि-
क्षिप्तं प्रक्षालयति ॥४७॥ उपमृष्टं पर्यग्नि करोति ॥४८॥
आहुति करे॥३०॥आचार्य के लिये भी वैसा ही करे ॥३१॥ “देव हेडन०”
से हवनीय में से किसी से आहुति करे ॥३२॥ खड्डा में धरे धान्य से
सूर्य के लिये चरु पकावे ॥३३॥३४॥ उसी खदाशय धान्य में से चार
शराव ( पुरवा ) धान्य ब्राह्मण को देवे ॥३५॥ यदि महाजन (कर्ज देने
वाला) मर जावे तो ऋणी “अपमित्यप्रतीत्तं०” इत्यादि तीन सूक्तों से
द्रव्य को अभिमंत्रण करके उसके पुत्र को रुपये देवे ॥३६॥ यदि उसके
पुत्रादि न हों तो उसके गोत्रवाले को देवे ॥ यदि सगोत्री भी न हो तो
मरघट में डाल देवे ॥ श्मशान के अभाव में चौराहे पर डाल देवे
॥३९॥ कक्षों को जलाकर प्रकाश करे ॥४०॥ “दिवो नु मां०” दो मंत्रों
से (मेघ जल से नहाने की शान्ति है ) शरीर को प्रक्षालन करे ॥४१॥
“दिवो नु मां०” सूक्त से एक तैल को सर्वौषधि गन्ध, सोना-इनको
अभिमंत्रण कर शरीर को उबटन से मले ॥ या आम्रादि वृक्षों से स्वयं
गिरे हुए फलों से शरीर को स्पर्श करावे ॥४२॥ जिस बच्चे को ऊपर
के दो अगले दाँत पहिले निकले तो “यौ व्याघ्रौ०” से व्रीहि आदि
अग्नि में डाले ॥४३॥ व्रीहि, यव, तिल, माष को इकट्ठा करके दोनों
निकले दाँतों से कटवावे ॥४४॥ व्रीहि आदि में से किसी एक को
शान्ति जल से पका कर खावे ॥४५॥ बच्चे के माँ बाप भी खावे ॥४६॥
काले काक से छू जाने पर “इदं यत्कृष्ण०” शान्ति जल से प्रक्षालन
करे ॥४७॥ और उल्मुक अभिमंत्रण करके काक मुख से अपमृष्ट पुरुष
१५
११४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
प्रतीचीनफल इत्यपामार्गेध्मेऽपामार्गीरादधाति ॥४९॥
यदर्वाचीनमित्याचामति ॥५०॥ यत्ते भूम इति विख-
नति ॥५१॥ यत्त ऊनमिति संवपति ॥५२॥ प्रेहि प्रहरेति-
कापिञ्जलानि स्वस्त्ययनानि भवन्ति ॥५३॥ प्रेहि प्रहर
वा दावान् गृहेभ्यः स्वस्तये । कपिञ्जल प्रदक्षिणं शतप-
त्राभि नो वद् ॥ भद्रं वद दक्षिणतो भद्रमुत्तरतो वद ॥
भद्रं पुरस्तान्नो वद् भद्रं पश्चात् कपिञ्जल ॥ शूनं वद
दक्षिणतः शूनमुत्तरतो वद । शूनं पुरस्तान्नो वद शूनं
पश्चात् कपिञ्जल ॥ भद्रं वद पुत्रैर्भद्रं वद गृहेषु च । भद्र-
मस्माकं वद भद्रं नो अभयं वद ॥ आवदंस्त्वं शकुने
भद्रमावद तूष्णीमासीनः सुमतिं चिकिद्धि नः ॥ यदु-
त्पतन्वदसि कर्करिर्यथा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः । यौव-
नानि महयसि जिग्युषामिव दुन्दुभिः ॥ कपिञ्जल प्रद-
क्षिणं शतपत्राभि नो वदेति ॥ कापिञ्जलानि स्वस्त्यय-
नानि भवन्ति ॥५४॥ यो अभ्यु बभ्रुणार्यसि स्वपन्त-
को अग्नि की परिक्रमा करावे ( उपरि घुमाकर दूर में उसे फेंक देवे )
॥४८॥ संक्रामक सब ही रोगों के संसर्ग दोष की शान्ति को कहते हैं ।
अपामार्ग की इध्मों को अग्नि में डाले ॥४९॥ 'यदर्वाचीनं०' से आच-
मन करे ।५०॥ "यत्ते भूम" से ओषधि आदि को खने (जहां कहीं जिस
ओषधि आदि को खनने का काम पड़े वहाँ इसी मंत्र से खनन करे )
॥५१॥ और "यत्ते ऊनं०" से खने हुए गर्त को भर देवे ॥ ५२॥ “प्रेहि
प्रहर०” इत्यादि से कापिञ्जल स्वस्त्ययन होते हैं ॥५३॥ कपिञ्जल पक्षी
की बोली सुनकर ग्राम में या वन में किसी पक्षी कि बोली को सुनकर या
स्वयं क्रुद्ध भाषण करके या दूसरे की बात सुनकर । उलूक, कपोतकी
बोली पूर्व या उत्तर दिशा से सुनने पर लोक में निन्दित मानी जाती
है, जो कुछ संसार में विरुद्ध सुने या देखे सब ही के लिये यह स्वस्त्ययन
होता है ॥ ५४ ॥ मैदान में यदि सोवे, वन या शून्य घरमें या पर्वत
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । ११५
मत्तिस पुरुषं शयानमगमत्स्व लम् ॥ अयस्मयेन ब्रह्मणाऽ-
श्ममयेन वर्मणा पर्यस्मान्वरुणो दधदित्यभ्यवकाशे संवि-
शत्यभ्यवकाशे संविशति ॥५५॥ ॥१०॥४६॥
इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥५॥
उभयतः परिच्छिन्नं शरमयं बर्हिराभिचारिकेषु॥१॥
दक्षिणतः सम्भारमाहरत्याङ्गिरसम् ॥२॥इङ्गिडमाज्यम्॥३॥
सव्यानि ॥४॥ दक्षिणापवर्गाणि ॥५॥ दक्षिणा प्रवण
ईरिणे दक्षिणामुखः प्रयुङ्क्ते ॥६॥ साग्नीनि ॥७॥ अग्ने
यत्ते तप इति पुरस्ताद्धोमाः ॥८॥ तथा तदग्ने कृणु
जातवेद इत्याज्यभागौ ॥९॥ निरमुं नुद इति संस्थित-
पर तब “यो अभ्य बभ्रूणा” इस ऋचा का जपकर सोवे ॥५५॥१०॥४६॥
यह छयालीसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥४६॥
इति अथर्ववेद के कौशिकसूत्र का पञ्चम अध्याय का भाषानुवाद समाप्त हुआ ॥५॥
अब अथर्ववेद विहित अभिचार कर्म को कहते हैं । यद्यपि मीमांसा
ग्रन्थ में इसका निषेध है परन्तु मनुस्मृति में विहित करके लिखा गया
है । दोनों ओर मूल और अग्र भाग कटे शरों से आभिचारिक वेदिका
अस्तरण करना चाहिये ॥१॥ आङ्गिरस कल्प के अनुसार प्रयोजनीय
सामग्रियों को दक्षिण भाग में लाकर धरे ॥२॥ दक्षिण दिशा में मण्डप
बनवावे उसमें यथोक्त विधि से पताका तोरणों से सुसज्जित दरवाजे
बनवावें । इङ्गिड को आज्य करे । वाम से आरम्भ कर दक्षिण में आभि-
चारिक कर्मों की समाप्ति करे ॥३॥४॥५॥ वेदि दक्षिण को ढालुआ हो,
दक्षिण मुख करके कर्त्ता कर्म करने में प्रवृत्त होवे ॥६॥ जितने कर्म हों
सब अग्नि के साथ हों ॥७॥ “अग्ने यत्ते०” इत्यादि पाँच सूक्त, पाँच
अपत्य और पाँचजन्य होते हैं । इनसे पुरस्तात् होमों को करे ॥८॥९॥
और “तदग्ने कृणु जातवेद०” इत्यादि सूक्त से आज्यभाग की दो ऋचायें
॥९॥ “निरमुं नुद” इत्यादि सूक्त से संस्थित होमों को करे ॥१०॥ अब अभि-
११६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
होमाः ॥१०॥ कृत्तिकारोकारोधावाप्येषु ॥११॥ भर-
द्वाजप्रवस्केनाङ्गिरसं दण्डं वृश्चति ॥१२॥ मृत्योरहमिति
बाधकोमादधाति ॥१३॥ य इमामयं वज्र इति द्विगुणा-
मेकवीरान्संनह्य पाशान्त्रिमुष्टितृतीयं दण्डं सम्पात-
वत् ॥१४॥ पूर्वाभिर्बध्नीते ॥१५॥ वज्रोऽसि सपत्नहा
स्वयाद्य वृत्रं साक्षीय । त्वामद्य वनस्पते वृक्षाणामुद-
युष्महि ॥ स न इन्द्र पुरोहितो विश्वतः पाहि रक्षसः ।
अभि गावो अनूषताभि द्युम्नं बृहस्पते। प्राण प्राणं त्रयस्वा-
सो असवे मृड ॥ निर्ऋते निर्ऋत्या नः पाशेभ्यो मुञ्च ॥
इति दण्डमादत्ते ॥१६॥ भक्तस्याहुतेन मेखलाया ग्रन्थि-
चार प्रयोग करने के लिये काल का नियम कहते हैं। कृत्तिका-नक्षत्र में
अरोध कृष्णपक्ष अरोधकः, अमावास्या के साथ-योग होना चाहिये ।
इन समयों में अभिचार कार्य होना चाहिये कृत्तिका औरोध में ।
अवाप्य ग्रहण विधान की समाप्ति तक समझने के लिये । अभ्या-
तानान्त होम के पश्चात् "दूष्या दूषिरसि०" इस सूक्त से तिलक मणि
को लाकर अभिमंत्रण कर इस मणि को कर्म कराने वाले, कर्त्ता और
सदस्य प्रत्येक व्यक्ति बाँध लेवें-आत्मरक्षा के लिये ॥११॥ अब दीक्षा
कही जाती है। शुक्लपक्ष की त्रयोदशी तिथि में अपराह्न समय अभ्या-
तानान्त तक कर्म करके "द्यावापृथिवी उर्वन्तरिक्षं ०" सूक्त और
"कनकरजत०" सूक्त-इन दो सूक्तों से कर्त्ता बास के दण्ड को काटे
॥१२॥ "मृत्योरहं०" से बाधक (व्याधिघातिक) समिधाओं का आधान
करे ॥१३॥ "य इमां देवो मेखलां०" पञ्च सूक्त इस सूक्त से मेखला धर
कर । "अयं वज्र०" इस सूक्त से दण्ड को रख कर "य इमां०" ऋचा से
मेखला कमर में बांधे "वज्रोऽसि०" सूक्त से दण्ड को ग्रहण करे ॥
"नमो नमस्कृद्भ्य०" से सप्तर्षियों का उपस्थान करे-शाला के बाहर ।
तब शाला के भीतर जाकर व्रतादानीय समिधों को आधान करे ।
(शान्तवृक्षों की) और व्रतश्रावण वहीं करे, अभ्यातानादि उत्तर तंत्र
करे ॥ एवं दीक्षित तीन रात तक भोजन न करे ॥ तीन रात बीत जाने
मालिम्पति ॥१७॥ अयं वज्र इति बाह्यतो दण्डमूर्ध्व-
मवागग्रं तिसृभिरन्वृचं निहन्ति ॥१८॥ अन्तरुपस्पृ-
शेत् ॥१९॥ यदश्नामीति मन्त्रोक्तम् ॥२०॥ यहपात्रमाहन्ति
फड्ढतोऽसाविति ॥२१॥ इदमहमामुष्यायणस्यामुष्याः
पुत्रस्य प्राणापानावप्यायच्छामीत्यायच्छति ॥२२॥ ये
अमावास्यामिति संनह्य सीसचूर्णानि भक्तेऽलङ्कारे
॥२३॥ पराभूतवेणोर्यष्ट्या बाहुमात्राद्यालङ्कृत्याहन्ति॥२४॥
द्यावापृथिवी उर्विति परशुपलाशेन दक्षिणा धावतः पदं
वृश्चति ॥२५॥ अन्वक्तिस्तिर्यक्तिः ॥२६॥ अक्ष्णया
संस्थाप्य ॥२७॥ आव्रस्कान्यांशूनपलाशमुपनह्य अष्टेऽभ्य-
पर कृष्णपक्ष के पड़िवा को कर्म होगा ॥१४॥१५॥१६॥ पूर्वोक्त दण्ड को
लेकर मेखला के गाँठ को “आहुतास्यभिहुता०” इस ऋचा को पढ़
कर प्रति दिन लीपे ॥१७॥ “अयं वज्र०” से शाला के बाहर दण्ड
को पकड़ कर अग्रभाग को तीन ऋचा में से प्रत्येक ऋचा को पढ़ २ कर
मारे ॥१८॥ और शालाके भीतर जल का स्पर्श करे ॥१९॥ “यद-
श्नामि यद् गिरामि०” इन दो ऋचा से भोजन करे, और “यत्पिबामि०”
ऋचा से जल पीवे ॥२०॥ और “फड्ढतोऽसौ०” से भोजन (यहाँ
असौ की जगह शत्रु का नाम बोले) पात्र को मारे ॥२१॥ फिर दण्ड
को पकड़ कर “इदमहमामुष्यायणस्यामुष्याः पुत्रस्य०” इत्यादि पढ़ कर
“आमुष्यायणस्य” की जगह शत्रु का नाम लेकर मेखला के गाँठ को
दृढ़ करे ॥२२॥ “येऽमावास्यां०” से सीस (सिसा) को चूर्ण करके शत्रु
के भोजन या वस्त्रालंकारादि में डाल देवें ॥२३॥ गिरे हुए बाँस की
हाथ भर की अलंकृत छड़ी से शत्रु को मारे ॥२४॥ “द्यावापृथिवी
उरु०” इत्यादि से परशु वृक्ष के पत्ते से दक्षिणादि दौड़ते शत्रु के
पैर की जगह को हलका काटे ॥२५॥ छेदन का नियम यह है कि-अनुपद
की रेखाओं से टेढ़े त्रिकोण में एक २ को तीन २ बार सूक्त को पढ़े
॥२६॥ कोण द्वारा संस्थापन करके उस पैर चिह्न से धूलि लेकर वध के
पत्ते में बाँध कर के आष्ट्र में डाल देवे ॥२८॥ शब्द होने पर शत्रु मर
११८ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
स्यति ॥२८॥ स्फोटत्सु स्तुतः ॥२९॥ पश्चादग्नेः कर्ष्यां
कूर्चुपस्तोर्णायां द्वादशरात्रमपर्यावर्तमानः शयीत ॥३०॥
तत उत्थाय त्रिरह उदवज्रान्प्रहरति ॥३१॥ नद्या अनाम-
सम्पन्नाया अश्मानं प्रास्यति ॥३२॥ उष्णेऽक्षतसक्तून्-
नूपमथिताननुच्छ्रसन्पिवति ॥३३॥ कथं त्रींस्त्रीन्काशीं-
स्त्रिरात्रम् ॥३४॥ द्वौ द्वौ त्रिरात्रम् ॥३५॥ एकैकं षड्-
रात्रम् ॥३६॥ द्वादश्याः प्रातः क्षीरौदनं भोजयित्वोच्छि-
ष्टानुच्छिष्टं बहुमत्स्ये प्रकिरति ॥३७॥ सन्धावत्सु स्तुतः ॥
॥३८॥ लोहितशिरसं कृकलासममूनू हन्मीति हत्वा सद्यः
कार्यो भाङ्गे शयने ॥३९॥ लोहितालङ्कृतं कृष्णव
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १११९
दहति ॥४०॥ एकपदाभिरन्योऽनुतिष्ठति ॥४१॥ अङ्गुशः
सर्वहुतमन्यम् ॥ ४२ ॥ पश्चादग्नेः शरभृष्टीर्निधायोदग्व-
जस्त्या स्वेदजननात् ॥४३॥ निवृत्य स्वेदाल्लङ्कृता जुहोति ।
॥४४॥ कोश उरः शिरोऽवधाय पदात्पांसून् ॥४५॥ पश्चा-
दग्नेर्लवणमृडीचीस्तिस्रोऽशोतीर्विकर्णीः शर्कराणाम्॥४६॥
विषं शिरसि ॥४७॥ बाधकेनावागग्रेण प्रणयन्नन्वाह ॥४८॥
पाशे स इति कोशे ग्रन्थीनुद्ग्रथ्नाति ॥ ४९ ॥ आमुमित्या-
दत्ते ॥५०॥ मर्मणि खादिरेण स्रुवेण गर्तं खनति ॥ ५१ ॥
बाहुमात्रमतीव इति शरैरवज्ज्वालयति ॥५२॥ अवधाय
सञ्चित्य लोष्टं स्रुवेण समोप्य ॥५३॥ अमुमुन्नैषमित्युक्ता-
वलेखनीम् ॥५४॥ छायां वा ॥ ५५ ॥ उपनिनयते ॥५६॥
अन्वाह ॥५७॥१॥४७॥
“अग्ने यत्ते तपः०” इत्यादि पाँच सूक्तों से उपस्थान करे । और अन्य
कर्त्ता ८ टुकड़ा करके प्रत्येक ऋचा से आहुति देवे । और लोग एक पैर
से खड़े रहें । अग्नि के पश्चात् भाग में शरभृष्टी को डाल कर । उत्तर
तंत्र क्रिया करने को जाने में जो पसीना आया हो तो पसीना सूख जाने
पर उस पसीने से अभ्यक्त शरभृष्टी से आठ २ आहुतियाँ प्रत्येक ऋचा
से देवे ॥४४॥४५॥ अभ्यातानान्त करके हृदय और शिर पर धूलि डाल
कर, अग्नि के पश्चिम भाग में लवणरुजका को और २४० शर्करा कोश
में धर कर विष को शिर पर धरे ॥४५॥४६॥४७॥ व्याधिघातक दण्ड
से प्रेरण करता हुआ प्रति कोश को पीछे से कहे ॥४८॥ “पाशे स बद्ध०”
से कोश में गांठें बाँधे । “आमुं०” से लेवे ॥४९॥५०॥ मर्म में खादिर
स्रुव से गर्त को बाहुमात्र खनन करे । और “अतीव य०” से शरों से
जलावे ॥५१॥५२॥ धूलि को गर्त में स्रुव से डाल कर ॥५३॥ “अमुमु-
न्नैषं०” इस मंत्र से उक्तावलेखनी को, या शत्रु की छाया को दार्भुष
से विद्ध करे और शत्रु के पास के जल से मार्जन करे ( भरद्वाज
प्रत्नस्क से ) ॥५४॥५५॥१॥४७॥ यह सैंतालिसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥
१२० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
भ्रातृव्यक्षयणमित्यरण्ये सपत्नक्षयणीरादधाति ॥१॥
ग्राममेत्यावपति ॥२॥ पुमान् पुंस इति मन्त्रोक्तमभिहुता-
लङ्कृतं बध्नाति ॥३॥ यावन्तः सपत्नास्तावतः पाशानि-
ङ्गिडालङ्कृतान्सम्पातवतोऽनूक्तान्ससूत्रांश्चम्वा मर्मणि
निखनति ॥४॥ नावि प्रैणान्नुदस्व कामेति मन्त्रोक्तं शाखया
प्रणुदति ॥५॥ तेऽधराञ्च इति प्रप्लावयति ॥६॥ बृहन्नेषामि-
स्यायन्तं शप्यमानमन्वाह॥७॥ वैकङ्कतेनेति मन्त्रोक्तम्॥८॥
ददिहींति साग्नीनि ॥९॥ देशकवडु प्रदक्षिणाति ॥१०॥
तेऽवदन्निति नेतॄणां पदं वृश्चति ॥११॥ अन्वाह ॥१२॥
ब्रह्मगवीभ्यामन्वाह ॥१३॥ चेष्टाम् ॥१४॥ विचृतति ॥१५॥
अरण्य में जाकर “भ्रातृव्यक्षयणं०” से शत्रुक्षयणीय अश्वत्थ,
कृकलास, एरण्ड, श्लेष्मान्तक, खदिर, शर की समिधाओं का आधान
करे ॥१॥ तब ग्राम में आकर व्रीहि, यव, तिल इनको अग्नि में हवन
करे ॥२॥ खैर के वृक्ष से उत्पन्न अश्वत्थ के मणि को “पुमान्पुंस०”
से आहुति देकर अलंकृत कर बाँधे ॥३॥ जितने शत्रु हों उतने ही पाशों
को इङ्गिडों से अलंकृत करके सम्पात वाला करके प्रकृत सूक्त से अनूक्त
के साथ सूत से सम्बन्ध करके मर्मों को निखनन करे ॥४॥ “नावि
प्रैणान्नुदस्व काम” से दोनों को अश्वत्थ शाखा से प्रणुदन करे ॥५॥
“तेऽधराञ्च०” से नाव को जल से भर देवे ॥६॥ शत्रु या आक्रु-
ष्यमाण पुरुष अग्नि के सम्मुख आता हो तो “बृहन्नेषां०” मंत्र पढ़े
॥७॥ वैकङ्कत स्रुव से मंत्रोक्त को आहुति देवे ॥८॥ कृक-
लास कर्म, शरभृष्टि कर्म, शत्रुक्षयणीय कर्म, ६ गाँव में आकर करले
६ कर्म तीन पाश कर्म, विकङ्कत कर्म २१ तंत्र होते हैं ॥९॥ सूक्त के
अन्तिम मंत्र से सर्प छत्र को चूर्ण करे ॥१०॥ “तेऽवदन्न०” से ब्राह्मण
गो-नेतृ के पद को काटे या नेताओं को कहे ॥११॥१२॥ “नैतां ते
देवा” इति एका ब्रह्मगवी, दूसरी “श्रमेण तपसा०” इन दो ब्रह्मगवी
ऋचाओं को नेताओं को कहे । सदा गोहरण और मारण क्रिया में ब्रह्म-
चारी जप करे ॥१३॥ मारण, विशसन, अधिश्रयण, भक्षणादि द्वेष्य
ऊबध्ये ॥१६॥ श्मशाने ॥१७॥ त्रिरमूनूहनस्वेत्याह ॥१८॥
द्वितीयायाश्मानमूबध्ये गूहयति ॥१९॥ द्वादशरात्रं सर्व-
व्रत उपश्राम्यति ॥२०॥ द्विरुदिते स्तुतः ॥२१॥ अवाग-
ग्रेण निवर्तयति ॥२२॥ उप प्रागादिति शुने पिण्डं पाण्डुं
प्रयच्छति ॥२३॥ तार्क्षं बध्नाति ॥२४॥ जुहोति ॥२५॥
आदधाति ॥२६॥ इदं तद्युजे यत्किं चासौ मनसेत्याहि-
ताग्निं प्रतिनिर्वपति ॥२७॥ मध्यमपलाशेन फलीकरणा-
ञ्जुहोति ॥२८॥ निरमुमित्यङ्गुष्ठेन त्रिरनुप्रस्तृणाति ॥२९॥
शरं कट्टिन्दुकोष्ठैरनुनिर्वपति ॥३०॥ लोहिताश्वत्थपला-
शेन विषावध्वस्तं जुहोति ॥३१॥ त्वं वीरुधामिति मूत्र-
गौ में चेष्टा, वध्य के निमित्त हवि करना ॥१४॥१५॥ ऊबध्य को श्मशान
में धर कर उस पर बैठ कर "श्रमेण तपसा०” अनुवाक का जप करे ।
१२ रात तक प्रति दिन जप करे । उसके बाद दो बार सूर्य के उदय होने
पर अर्थात् चौदहवां दिन—शत्रु मारा गया जानो ॥२१॥ तब बाँस के
दण्ड के अग्रभाग से निवर्तन करे ॥२२॥ "उपप्रागात्०” से श्वेत मिट्टी
को अभिमंत्रण कर कुत्ते को देवे ॥२३॥ पलाशमणि लाकर अभिमंत्रण
कर उसे बाँधे ॥२४॥ इङ्गिड की आहुति देवे ॥२५॥ समिदाधान करे
॥२६॥ "इदं तद्युजे यत्किंचासौ मनसा०” से आहिताग्नि के प्रति
अभिचार करे ॥२७॥ "इदं तद्युजे०” सूक्त के पांच ऋचा से पलाश
के मध्यम पत्र से चावल के गुण्डे से आहुति देवे ॥२८॥ "निरमुं०”
से अग्नि के पश्चिम भाग में अंगूठे से तीन तह आस्तरण करे ॥२९॥ शर
से स्तरण करे, ओडेक, कोष्ट, इङ्गिड, इनमें से एक को हटा देवे और
शेष की आहुति देवे ॥३०॥ लाल अश्वत्थ के पत्ते से विषावध्वस्त की
आहुति करे ॥३१॥ बाहर लवनादि प्रतिष्ठापनान्त तक करके उस अग्नि
को विकाश करे और शर से अग्नि का प्रणयन करे । "निरमुं०” सूक्त
से स्तरण करके फिर मंत्र से स्तरण करे । एवं "निरमुं०” सूक्त द्वारा
अभ्यातानान्त करके इङ्गिड की आहुति देवे । "त्वं वीरुधां०” से मल
मूत्र को बछड़े के शेफ के चमड़े में क्रकच से धर कर बाधक से पीस
१६
१२२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
पूरीषं वत्सशेप्यायां ककुचैरपिधाप्य संपिष्य निखनति
॥३२॥ शेप्यानण्डे ॥ ३३ ॥ शेप्यायाम् ॥ ३४ ॥ यथा सूर्य
इत्यन्वाह ॥३५॥ उत्तरया यांस्तान् पश्यति ॥३६॥ इन्द्रो-
तिभिरग्ने जातान्यो नस्तायदिप्सति यो नः शपादिति
वैद्युदतीः ॥३७॥ सान्तपना इत्यूर्ध्वशुषीः ॥३८॥ ग्रंसश्रुतं
पुरोडाशं ग्रंसविलीनेन सर्वहुतम् ॥३९॥ उदस्य श्यावा-
वितीषीकाञ्जिमण्डूकं नोललोहिताभ्यां सूत्राभ्यां सकक्षं
बद्ध्वोष्णोदके व्यादाय प्रत्याहुति मण्डूकमपनुदत्य-
भिन्युब्जति ॥४०॥ उपधावन्तमसदन् गाव इति
काम्पिलं संनह्य क्षीरोत्सिक्ते पाययति लोहितानां चैक-
शम् ॥ अशिशिशोः क्षीरौदनम् ॥४२॥ आमपात्रम
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १२३
सपत्नहनमित्यृषभं सम्पातवन्तमतिसृजति ॥ १ ॥
आश्वत्थीरवपन्नाः ॥२॥ स्वयमिन्द्रस्यौज इति प्रक्षाल-
यति ॥३॥ जिष्णवे योगायेत्यपो युनक्ति॥४॥ वातस्य
रंहितस्यामृतस्य योनिरिति प्रतिगृह्णाति ॥५॥ उत्तमाः
प्रताप्याधराः प्रदायैनमेनानधराचः पराचोऽवाचस्तपसस्त-
मुन्नयत देवाः पितृभिः संविदानः प्रजापतिः प्रथमो देवता-
नामित्यतिसृजति ॥ ६ ॥ इदमहं यो मा प्राच्या दिशो-
ऽघायुरभिदासार्दपवादीदिषूगुहः तस्येमौ प्राणापानावप-
क्रामामि ब्रह्मणा ॥७॥ दक्षिणायाः प्रतीच्या उदीच्या
ध्रुवाया व्यध्वाया ऊर्ध्वायाः ॥८॥ इदमहं यो मा दिशाम-
न्तर्देशेभ्य इत्यपक्रामामीति ॥९॥ एवमभिष्ठा ॥१०॥ नापो-
क्षीरौदन शत्रु के लिये खाने को देवे और कच्चे पात्र में हाथ धोवे
॥४१॥४२॥४३॥२॥४८॥ यह अड़तालिसवीं कण्डिका समाप्त हुई ॥
“सपत्नहनं०” सूक्त से सम्पातवन्त करके ऋषभ ( वृषभ ) को वृषो-
त्सर्ग की भाँति छोड़े। इसका विधि आगे कहा जाता है। स्वयं पतित
(अपने आप गिरे हुए) अश्वत्थ की लकड़ियों की समिधा बनावे ॥१॥२॥
“स्वयमिन्द्रस्यौज०” से प्रक्षालन करे ॥३॥ “जिष्णवे योगाय०” से जल
लावे ॥ “वातस्य रंहितस्यामृतस्य योनिः०” से जल ग्रहण करे ॥५॥ उद्-
वज्रों के विधान को कहते हैं । “इन्द्रस्यौज०” से दूर्वा डाले घट को
जल से प्रक्षालन करे । “जिष्णवे योगाय” इत्यादि से छः जल भरे घड़ों
को जल के पास रक्खे । एवं “इदमहं यो मा प्राच्या दिशः०” से आठ
ऋचा वाले कल्पज सूक्त से जल में घड़े को डाले । “इदमहं०” से घड़े
से उदक में “इदमहं०” सूक्त से घड़े के मुख को जल में डुबावे और
“इदमहं यो मा प्राच्या दिशः०” सूक्त से घड़े में जल भर कर लौट
आकर “इदमहं०” सूक्त से उसे मण्डप में स्थापना करे--इस भाँति
अभिचार कर्म में जल का लाना होता है । जिस नियम से वज्र प्रहरण
किया जाता है उसे कहते हैं । “इन्द्रस्य०” इत्यादि से सब क्रियाओं को
करके “इदमहं०” से स्थापनान्त तक करके “अग्नेर्भाग०” इत्यादि आठ
१२४ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
हननिवेष्टनानि सर्वाणि खलु शश्वद्धूतानि ॥ ११ ॥
ब्राह्मणाद्वज्रमुद्यच्छमानाच्छङ्कन्ते मां हनिष्यसि मां हनि-
ष्यसीति तेभ्योऽभयं वदेच्छमग्नये शं पृथिव्यै शमन्त-
रिक्षाय शं वायवे शं दिवे शं सूर्याय शं चन्द्राय शं
नक्षत्रेभ्यः शं गन्धर्वाप्सरोभ्यः शं सर्पेतरजनेभ्यः शिवं
मह्यमिति ॥१२॥ यो व आपोऽपां यं वयमपामस्मै वज्र-
मित्यन्वृचमुदद्वज्रान् ॥१३॥ विष्णोः क्रमोऽसीति
विष्णुक्रमान् ॥१४॥ ममाग्ने वर्च इति बृहस्पतिशिरसं
पृषातकेनोपसिच्याभिमन्त्र्योपनिदधाति ॥१५॥ प्रति-
जानन्नानुव्याहरेत् ॥१६॥ उत्तमेनोपद्रष्टारम् ॥१७॥
उदेहि वाजिनित्यर्धर्चेन नावं मज्जतीम् ॥१८॥ समिद्धो-
ऋचाओं से दो करना आधे को घड़े में करके आधे को भाजन में धर
के भाजन को अग्नि पर तपावे और घड़े को अन्य पुरुष को देकर
“अग्नेर्भाग०” आठ ऋ० से तपावे । बाहर दक्षिणाभिमुख होकर बैठ
भाजन को आगे करके “वातस्य रंहितस्य०” मंत्र से जल को लेकर
“समग्नय०” कल्पज सूक्त से सब भूतों के लिये अभय कहना । और
“यो व आपोऽपां०” से वज्र को फेके “अनाधराच पराच” इस कल्पज
ऋचा से भाजन, उदक को भूमि पर लावे ॥ “यं वयं०” इस सूक्त ही
से “अपामस्मै वज्रं०” इस एक ऋ० से ऐसा ही करे । “इन्द्रस्यौज०”
इत्यादि करे ॥ “विष्णोः क्रमोऽसि” १२ ऋचाओं में से प्रत्येक ऋचा से
विष्णु क्रमों को शत्रु के सम्मुख करे । सब विधान से बृहस्पति शिर
ओदन को शत्रु के लिये देवे ॥ “ममाग्ने वर्च'० इस सूक्त से उस को
पृषातक से सिंचन करके “तस्यौदनस्य०” इस अर्ध सूक्त से अभि-
मंत्रण करके देवे । सूक्त से अभिस्रुत करने पर सूक्त से सम्पातवन्त
करे ॥ “उदेहि नावं” शत्रुओं को कहे । शङ्कुसहित पाशों को अभिमंत्रण
करके वन में डाल देवे । शत्रु के पदचिन्ह को छेदन करे । पाशों
को भाष्ट्र में डाले। कच्चे पात्र पर शत्रु के हाथ प्रक्षालन करे ॥
वृषभको लाकर शत्रु के घरों की ओर उसे छोड़े॥ लाल शालि के क्षीरौ
अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् । १२५
ऽग्निर्य इमे द्यावापृथिवी अजैष्मेत्यधिपाशानादधाति
॥१९॥ पदे पदे पाशान् वृश्चति ॥२०॥ अधिपाशान्
बाधकाञ्छङ्कूंस्तान् संक्षुद्य संनह्य भ्रष्ट्रेऽभ्यस्यति ॥२१॥
अशिशिषोः क्षीरौदनादीनि त्रीणि ॥२२॥ गर्तेध्मा-
वन्तरेणावलेशनीं स्थाणौ निबध्य द्वादशरात्रं सम्पातान-
भ्यतिनिनयति ॥२३॥ षष्ठ्योदवज्रान्प्रहरति ॥२४॥
सप्तम्याचामति ॥२५॥ यश्च गामित्यन्वाह ॥२६॥ निर्दु-
र्मण्य इति संधाव्याभिमृशति ॥२७॥३॥४९॥
इत्यथर्ववेदे कौशिकसूत्रे षष्ठोऽध्यायः समाप्तः ॥६॥
स्वस्तिदा ये ते पन्थान इत्यध्वानं दक्षिणेन प्रका-
दन को लाकर अभिमंत्रण करके शत्रु के लिये देवे ॥ शत्रु की मूर्त्ति मट्टी
की बनाकर वेदि के मध्य में ऊँचे स्थाणु में बाँध देवे और उसके शिर
पर घी के सम्पातों को चुलावे ॥ “यस्मिन् षडुर्वीः पञ्च”० से उदवज्रों
से उक्त विधान से शत्रु के शिर पर मारे ॥ “योऽन्नादोऽन्नपतिः०” ऋचा
से शत्रु को मन से आचमन करे तो स्वयं शत्रु का मरण हो जावेगा ।
“यश्च गां पदा स्फुरति ऋग्द्वयाधिकारः” तीन ऋ० से शत्रु को देखकर
पढ़े ॥ अवभृथ में स्नान कर “निर्दुर्मण्य०” से सर्वौषधियों से अपने
को अभिमर्शन करे ॥ अभिचार करके इस शान्ति को कर्त्ता करे ॥
अभिचार पद्धति समाप्त हुई ॥ इस प्रयोग से मरण, बन्धन या बेहोश
गिर जाना, पागल होना, होता है ।६।७।८।९।१०।११।१२।१३।१४।१५।१६
।१७।१८।१९।२०।२१।२२।२३।२४।२५।२६।२७॥३॥४९॥ यह उनचासवी
कण्डिका समाप्त हुई ॥४९॥ और अथर्ववेद के कौशिक सूत्र के छठा
अध्याय का भाषानुवाद भी समाप्त हुआ ॥६॥
अब स्वस्त्ययन कर्म को कहते हैं । व्याघ्र, चोर, हुराल, चरक, सिंह
आदि बनैले हिंसक जन्तुओं का मार्ग में चलते समय भय हो तो “स्व-
स्तिदा ये ते०” इत्यादि मंत्रों को मार्ग में जाने के पहिले दहिना पग
आगे कर चले और गौ को आगे कर स्वयं उसके पीछे-पीछे चले । मार्ग
में कीलक गाड़ता उखाड़ता हुआ घर से जंगल को जावे ॥१॥ जल भरे
१२६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मति ॥१॥ व्युदस्यत्यसंख्याताः शर्कराः ॥२॥ तृणानि
छित्त्वोपतिष्ठते ॥३॥ आरेऽस्मूः पारे पातं नो य एनं परि-
षीदन्ति यदायुधं दण्डेन व्याख्यातम् ॥४॥ दिष्ट्या मुखं
विमाय संविशति ॥५॥ त्रीणि पदानि प्रमायोत्तिष्ठति
॥६॥ तिस्रो दिष्टीः ॥७॥ प्रेतं पादावित्यवशास्य ॥८॥
पाययति ॥९॥ उपस्थास्त इति त्रीण्योप्यातिक्रामति
॥१०॥ स्वस्ति मात्र इति निश्युपतिष्ठते ॥११॥ इन्द्रमह-
मिति पण्यं सम्पातवदुत्थापयति ॥१२॥ निमृज्य दिग्यु-
क्ताभ्यां दोषो गाय पातं न इति पश्चानडूह्यो यमो
घड़े को अभिमंत्रण करके गोचर भूमि में गौ को ले जावे और धूलि को
ढेर कर उसमें से आधे को दहिने हाथ से उठा कर फेके । और एक-एक
दर्भ आदि तृणों को तोड़ तोड़ कर फेके और इन्द्र देवता के लिये पाक-
यज्ञ के विधान से बलि देवे और उपस्थान करे ॥ मार्जन कर अभिमंत्रण
करके राजा को देवे और “आरेऽस्मूः” इत्यादि मंत्र से खड्गादि हथियार
को ग्रहण करे ॥४॥ तर्जनी अङ्गुली से मुख को माप कर रात्रि में शयन
करे ॥५॥ और प्रातः काल उठकर सूक्त का जप कर तीन पग जप कर
तब अपने काम में प्रवृत्त होवे ॥६॥ और तीन प्रादेश मात्र जमीन नाप
करके चले । मार्ग में जाने के लिये सम्बल ले लेवे । एवं “प्रेतं पादौ०”
इत्यादि ऋचा से अभिमंत्रण कर सम्बल में से थोड़ा ब्राह्मण