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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

DevanagariHindipublished361 pages

Page 158 of 361

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Page 158

१२६ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
मति ॥१॥ व्युदस्यत्यसंख्याताः शर्कराः ॥२॥ तृणानि
छित्त्वोपतिष्ठते ॥३॥ आरेऽस्मूः पारे पातं नो य एनं परि-
षीदन्ति यदायुधं दण्डेन व्याख्यातम् ॥४॥ दिष्ट्या मुखं
विमाय संविशति ॥५॥ त्रीणि पदानि प्रमायोत्तिष्ठति
॥६॥ तिस्रो दिष्टीः ॥७॥ प्रेतं पादावित्यवशास्य ॥८॥
पाययति ॥९॥ उपस्थास्त इति त्रीण्योप्यातिक्रामति
॥१०॥ स्वस्ति मात्र इति निश्युपतिष्ठते ॥११॥ इन्द्रमह-
मिति पण्यं सम्पातवदुत्थापयति ॥१२॥ निमृज्य दिग्यु-
क्ताभ्यां दोषो गाय पातं न इति पश्चानडूह्यो यमो
घड़े को अभिमंत्रण करके गोचर भूमि में गौ को ले जावे और धूलि को
ढेर कर उसमें से आधे को दहिने हाथ से उठा कर फेके । और एक-एक
दर्भ आदि तृणों को तोड़ तोड़ कर फेके और इन्द्र देवता के लिये पाक-
यज्ञ के विधान से बलि देवे और उपस्थान करे ॥ मार्जन कर अभिमंत्रण
करके राजा को देवे और “आरेऽस्मूः” इत्यादि मंत्र से खड्गादि हथियार
को ग्रहण करे ॥४॥ तर्जनी अङ्गुली से मुख को माप कर रात्रि में शयन
करे ॥५॥ और प्रातः काल उठकर सूक्त का जप कर तीन पग जप कर
तब अपने काम में प्रवृत्त होवे ॥६॥ और तीन प्रादेश मात्र जमीन नाप
करके चले । मार्ग में जाने के लिये सम्बल ले लेवे । एवं “प्रेतं पादौ०”
इत्यादि ऋचा से अभिमंत्रण कर सम्बल में से थोड़ा ब्राह्मण