कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)
Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation
by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)
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Read in context१२० अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
भ्रातृव्यक्षयणमित्यरण्ये सपत्नक्षयणीरादधाति ॥१॥
ग्राममेत्यावपति ॥२॥ पुमान् पुंस इति मन्त्रोक्तमभिहुता-
लङ्कृतं बध्नाति ॥३॥ यावन्तः सपत्नास्तावतः पाशानि-
ङ्गिडालङ्कृतान्सम्पातवतोऽनूक्तान्ससूत्रांश्चम्वा मर्मणि
निखनति ॥४॥ नावि प्रैणान्नुदस्व कामेति मन्त्रोक्तं शाखया
प्रणुदति ॥५॥ तेऽधराञ्च इति प्रप्लावयति ॥६॥ बृहन्नेषामि-
स्यायन्तं शप्यमानमन्वाह॥७॥ वैकङ्कतेनेति मन्त्रोक्तम्॥८॥
ददिहींति साग्नीनि ॥९॥ देशकवडु प्रदक्षिणाति ॥१०॥
तेऽवदन्निति नेतॄणां पदं वृश्चति ॥११॥ अन्वाह ॥१२॥
ब्रह्मगवीभ्यामन्वाह ॥१३॥ चेष्टाम् ॥१४॥ विचृतति ॥१५॥
अरण्य में जाकर “भ्रातृव्यक्षयणं०” से शत्रुक्षयणीय अश्वत्थ,
कृकलास, एरण्ड, श्लेष्मान्तक, खदिर, शर की समिधाओं का आधान
करे ॥१॥ तब ग्राम में आकर व्रीहि, यव, तिल इनको अग्नि में हवन
करे ॥२॥ खैर के वृक्ष से उत्पन्न अश्वत्थ के मणि को “पुमान्पुंस०”
से आहुति देकर अलंकृत कर बाँधे ॥३॥ जितने शत्रु हों उतने ही पाशों
को इङ्गिडों से अलंकृत करके सम्पात वाला करके प्रकृत सूक्त से अनूक्त
के साथ सूत से सम्बन्ध करके मर्मों को निखनन करे ॥४॥ “नावि
प्रैणान्नुदस्व काम” से दोनों को अश्वत्थ शाखा से प्रणुदन करे ॥५॥
“तेऽधराञ्च०” से नाव को जल से भर देवे ॥६॥ शत्रु या आक्रु-
ष्यमाण पुरुष अग्नि के सम्मुख आता हो तो “बृहन्नेषां०” मंत्र पढ़े
॥७॥ वैकङ्कत स्रुव से मंत्रोक्त को आहुति देवे ॥८॥ कृक-
लास कर्म, शरभृष्टि कर्म, शत्रुक्षयणीय कर्म, ६ गाँव में आकर करले
६ कर्म तीन पाश कर्म, विकङ्कत कर्म २१ तंत्र होते हैं ॥९॥ सूक्त के
अन्तिम मंत्र से सर्प छत्र को चूर्ण करे ॥१०॥ “तेऽवदन्न०” से ब्राह्मण
गो-नेतृ के पद को काटे या नेताओं को कहे ॥११॥१२॥ “नैतां ते
देवा” इति एका ब्रह्मगवी, दूसरी “श्रमेण तपसा०” इन दो ब्रह्मगवी
ऋचाओं को नेताओं को कहे । सदा गोहरण और मारण क्रिया में ब्रह्म-
चारी जप करे ॥१३॥ मारण, विशसन, अधिश्रयण, भक्षणादि द्वेष्य