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कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

by महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह)

DevanagariHindipublished361 pages

Page 144 of 361

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Page 144

११२ अथर्ववेदीय-कौशिकसूत्रम् ।
अवकीर्णिने दर्भशुल्बमासज्य यत्ते देवीत्यावपति ॥१९॥
एवं सम्पातवतोदपात्रेणावसिच्य ॥२०॥ मन्त्रोक्तं शान्त्यु-
दकेन सम्प्रोक्ष्य ॥२१॥ सं समिदिति स्वयंप्रज्वलितेऽग्नौ
॥२२॥ अग्नी रक्षांसि सेधतीति सेधन्तम् ॥२३॥ यद-
स्मृतीति संदेशमपर्याप्य ॥२४॥ प्रत्नो हीति पापनक्षत्रे
जाताया मूलेन ॥२५॥ मा ज्येष्ठं तृते देवा इति परिवि-
त्तिपरिविविदानावुदकान्ते मौञ्जैः पर्वसु बद्ध्वा पिञ्ज-
लीभिराप्लावयति ॥२६॥ अवसिञ्चति ॥२७॥ फेनेषूत्तरा-
न्पाशानाधाय नदीनां फेनानिति प्रप्लावयति ॥२८॥ सर्वैश्च
प्रविद्व्यापां सूक्तैः ॥२९॥ देवहेडनेन मन्त्रोक्तम् ॥३०॥
भाचार्याय ॥३१॥ उपदधीत ॥३२॥ खदाशयस्यावपते॥३३॥
मत है ॥१७॥ असमाप्त ब्रह्मचर्य वाला ब्रह्मचारी फिरसे उपनयन करे
॥१८॥ अवकीर्णी ( मैथुन करने से भ्रष्ट ब्रह्मचारी ) के गले में डाभ की
रस्सी को डाल “यत्ते देवी०” से तिल की आहुती देवे ॥१९॥ इसी प्रकार
सम्पात वाले जलपात्र से गले की रस्सी को सिंचन कर के रस्सी को गले
से खोल देवे ॥२०॥ मन्त्रोक्त शान्तिजल से सम्प्रोक्षण करे ॥२१॥ “सं
समिद्०” से स्वयं प्रज्वलित अग्नि में हो तो उसी में एक बार हवन
करे ॥२२॥ “अग्नी रक्षांसि सेधति०” से उसी अग्नि का हाथ से उप-
स्थान करे ॥२३॥ यदि किसी सन्देश ( समाचार कहने को लावे और
उसे भूल से न कहे ) को भूल जावे तो “यदस्मृति०” से आहुति देवे
॥२४॥ ज्येष्ठादि पाप नक्षत्रों में से मूल नक्षत्र में सन्तान पैदा हो तो
जात कुमार के लिये “प्रत्नो हि०” से आहुति देवे ॥२५॥ यदि बड़े भाई
के रहते छोटे भाई विवाह कर लेवे तो जल के पास मूँज के पांशों से
शरीर की सन्धियों में बान्ध कर सम्पात वाले जल से कुश की पिंजुली
से नहावे ॥२६॥ और उसी से अवसिंचन करे ॥२७॥ नदी के फेनों पर
उन मूँज के पाशों को स्थापन करके “नदीनां फेनान्०” से उसको
बहावे ॥२८॥ जल सूक्तों से घड़े को धर कर अभिमंत्रण करके आप्लावन
करे ॥ २९ ॥ “यद्देवा देवहेडनं०” अनुवाक से मेदस्वता स्रुच से