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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

प्रस्तावना एवं मंगलाचरण

<u>कल्कि पुराण के बारे में ध्यान देने योग्य बातें</u>
ये भूतकाल वाचक वाक्य में लिखा गया है (Past
Sentence)
जैसे हम कहेंगे :- “भगवान कलिक का अवतार सम्बल
ग्राम में होगा “
परन्तु कलिक पुराण में लिखा गया है:- “भगवान कलिक
का अवतार सम्बल ग्राम में हुआ“

श्रीकल्कि-पुराण

(१) कलिकाल की भीषणता २५७, (२) कल्किका जन्म २६५
(३) कल्कि को शिवजी का शस्त्र-प्रदान २७२, (४) कल्कि का उपदेश २८१
(५) पद्मा की कथा २८८ (६) शुक और पद्मा की वार्ता २६४, (७)
विष्णु पूजन विधि ३०१ । ॥ २ ॥
(१) कल्कि का सिंहल गमन ३०८, (२) कल्कि-पद्मा मिलन,
३१६ (३) कल्कि पद्मा विवाह (४) अनन्त मुनि का उपाख्यान ३२६
(५) अनन्त का माया वर्णन ३३६, (३) सभल नारी का दिव्य रूप ३४७,
(७) बौद्धो से सग्राम ३५४ । ॥ ३ ॥
(१) स्त्रियो का युद्धार्थ आगमन, ३६३, (२) कुथोदरी का हनन
३७०, (३) मरु और देवापि का आगमन ३७६, (४) चन्द्र वश कथन
३६४, (५) सत्युग का आगमन ४०१, (६) धर्म से कल्कि का सवाद
४०५, (७) कोक-विकोक से युद्ध ४१३, (८) भल्लाट नगर पर आक्र-
मण ४२०, शशिध्वज-कल्कि सग्राम ४२८, (१०) शशिध्वज की पुत्री से
विवाह (११) शशिध्वज को पूर्व जन्म कथा ४३६, (१२) भक्ति-तत्व
वर्णन ४४८, (१३) मणि चोरी की कथा ४५४, (१४) शशिध्वज का
वन गमन ४६१, (१५) माया स्तव ४६८ (१३) कल्कि का यज्ञानुष्ठान
४७२, (१७) देवयानी शर्मिष्ठा की कथा ४८१, (१८) कल्कि का वन
विहार ४८६, (१६) कल्कि का वैकुण्ठ गमन ४६४, (२०) गगाजी की
स्तुति ५०६, (२१) कल्कि पुराण का उपमहार ५०१,

कल्किपुराण
प्रथम अंश
प्रथम-अध्याय
सेन्द्रा देवगणा मुनीश्वरजना लोकाः सपांलाः सदा ।
स्व स्व कर्म सुसिद्धये प्रतिदिन भक्त्या भजन्त्युत्तमाः ।
तं विघ्नेशमनन्तमच्युतमजं सर्वज्ञसर्वाश्रयं ।
वन्दे वैदिकतान्त्रिकादिविविधैः शास्त्रैः पुरोध्वन्दितम्॥१॥
नारायणं नमस्कृत्य नरञ्चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीञ्चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥ २ ॥
यद्दोर्दण्डकरालसर्पकवलज्वालाज्वलद्विग्रहाः
नेतुः सत्करवालदण्डदलिता भूपाःक्षितिक्षोभकाः ।
शश्वत् सैन्धववाहनो द्विजजनिः कल्किः परात्मा हरिः
पायात्सत्ययुगादिकृत्स भगवान्धर्मप्रवृत्तिप्रियः ॥ ३ ॥
इति सूतवचः श्रुत्वा नैमिषारण्यवासिनः ।
शौनकाद्या महाभागाः पप्रच्छुस्तं कथामिमाम् ॥ ४ ॥
हे सूत! सर्वधर्मज्ञ ! लोमहर्षणपुत्रक ! ।
त्रिकालज्ञ ! पुराणज्ञ ! वद भागवतीं कथास् ॥ ५ ॥
क कलिः ? कुत्र वा जातो जगतामीश्वरं प्रभुः ।
कथ वा नित्य धर्म्मस्य विनाश कलिना कृतः ? ॥ ६ ॥
इति तेषा वचः श्रुत्वा सूतो ध्यात्वा हरिं प्रभुम् ।
सहर्षपुलकोद्भिन्न सर्वाङ्गः प्राह तान्मुनीन् ॥ ७ ॥

( २५८ )
प्राचीन काल मे वैदिक तान्त्रिक आदि विविध शास्त्रो के द्वारा
आराधित इन्द्र सहित देवता, मुनीश्वर और लोकपालो द्वारा स्वकार्य-
सिद्धि के लिए भक्तिपूर्वक सतत उपासित, विघ्नेश, अनन्य, अच्युत,
अजन्मा, सर्वज्ञ एव सर्वाश्रय स्वरूप भगवान् विष्णु का वन्दन करता
हूँ ॥१॥ नर, नारायण कहे जाने वाले नरोत्तम को एव भगवती सरस्वती
को नमस्कार करके उनकी जय बोलता हूँ ॥२॥
जिनके भयकर भुज भुजग के विष ज्वाल मे पडकर अपने घोर
अत्याचारो से भूमडल की शान्ति भग करने वाले राजागण भस्म हो
जायगे और जिनके भयकर खड्ग की तीक्ष्ण धार से राजाओ के देह
मर्दित होगे, वे ब्राह्मण वश मे उत्पन्न होकर, युग-युग मे अवतार धारण
करने वाले भगवान् श्री हरि कल्क रूप मे रक्षा करे ॥३॥
सूतजी के यह वचन सुन कर नैमिषारण्य निवासी शौनकादि महा-
भागो मे उनसे पूछा ॥४॥ हे सूतजी ! हे सर्व धर्मो के ज्ञाता, हे लोम-
हर्षरण-पुत्र ? हे त्रिकालज्ञ ? हे पुराणो के भली प्रकार जानने वाले ?
अब आप भगवान् की कथा को विस्तृत रूप से कहिये ॥५॥ कलि कौन
है ? वह कहाँ उत्पन्न हुआ ? वह किस प्रकार पृथिवी का अधीश्वर
बन गया ? तथा उसने नित्यधर्म को किस प्रकार विनष्ट कर दिया ?
यह सब हमारे प्रति कहिये ॥६॥ महर्षियो के यह वचन सुनकर सूतजी
ने भगवान् श्री हरि का ध्यान किया और फिर पुलकित अग होकर
कहने लगे ॥७॥
शृणुध्वमिदमाख्यानं भविष्य परमाद्भुतम् ।
कथि ब्रह्मणा पूर्वं नारदाय विपृच्छते ॥ ८ ॥
नारद प्राह मुनये व्यासायामिततेजसे ।
सव्यासो निजपुत्राय ब्रह्मराताय धीमते ॥ ६ ॥
स चाभिमन्युपुत्राय विष्णुराताय ससदि ।

( २३६ )
प्राह भागवतान्धर्मानष्टादशसहस्रकान् ॥ १० ॥
तदा नृपे लय प्राप्ते सप्ताहे प्रश्नशेषितम् ।
मार्कण्डेयादिभिः पृष्टः प्राह पुण्याश्रमे शुकः ॥ ११ ॥
तत्राह तदनुज्ञातः श्रुतवानस्मि या कथा ।
भविष्या कथयामीह पुण्या भागवती शुभा ॥ १२ ॥
सूतजी बोले--हे मुनीश्वरो ! प्राचीन समय की बात है—इस
परम अद्भुत उपाख्यान कोपूछने पर ब्रह्माजी ने नारदजी से जो कहा था,
वही मे आपके प्रति कहता हूँ ॥८॥ फिर नारद जी ने इसका वर्णन
व्यासजी से किया, जिसे व्यासजी ने अपने मेधावी पुत्र ब्रह्मरात को
सुनाया ॥६॥ ब्रह्मरात ने उसे अभिमन्यु-पुत्र विष्णुरात के प्रति अठारह
सहस्र श्लोको मे सभा मडप के मध्य मे सुनाया ॥१०॥ उस समय प्रश्न
होते-होते राजा विष्णुरात ने एक सप्ताह मे शेष प्रश्नो को पूर्ण कर
लिया और लय को प्राप्त हो गये । उसी कथा के शेष अंश अर्थात्
संक्षिप्त रूप को शुकदेवजी ने मार्कण्डेय प्रभृति मुनियो के प्रश्न करने पर
कहा ॥११॥ भगवान् श्री शुकदेवजी द्वारा वर्णित उसी सक्षिप्त पुण्यमय,
भागवत उपाख्यान को, जो भविष्य मे घटित होने वाला है, आपसे
कहता हूँ ॥१२॥
ताः शृणुध्वम्महाभागा समाहित धियोऽनिशम् ।
गते कृष्णे स्वनिलय प्रादुर्भूतो यथा कलिः ॥ १३ ॥
प्रलयान्ते जगत्स्रष्टा ब्रह्मा लोकपितामह ।
ससर्ज घोर मलिन पृष्ठदेशात स्वपातकम् ॥१४॥
स चाधर्म इति ख्यातस्तस्य वंशानुकीर्त्तनात ।
श्रवणात्स्मरणाल्लोक सर्वपापै प्रमुच्यते ॥ १५ ॥
अधर्मस्य प्रियारम्या मिथ्या मार्जारलोचना ।
तस्य पुत्रोऽसितेजस्वी दम्भः परमकोपनः ॥ १६ ॥

( २६० )
स मायाया भगिन्यान्तु लोभः पुत्रञ्च कन्यकाम् ।
निकृति जनयामास तयो क्रोध सुतोऽभवत् ॥ १७ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण के अपने लोक को पधारने के पश्चात् जिस प्रकार
कलि की उत्पत्ति हुई, उस सब को कहता हूँ, आप लोग समाहित चित्त
सुने ॥१३॥ जब प्रलयकाल व्यतीत हो गया तब ससार-स्रष्टा, लोक-
पितामह ब्रह्माजी ने अपनी पीठ से घोर मलीन पातक को उत्पन्न
किया ॥१४॥ उसी पातक का नाम अधर्म हुआ, उस अधर्म के वंश का
श्रवण, स्मरण एव रहस्य जानने से प्राणीमात्र सब पापो से मुक्त
हो सकते है ॥१५॥ उस अधर्म की पत्नी बिल्ली जैसे नेत्र वाली, अत्यन्त
रम्या हुई, जिसका नाम मिथ्या हुआ । फिर अधर्म के सयोग से अति
तेजस्वी, महाक्रोधी एक पुत्र हुआ, जिसका नाम दभ था ॥१६॥ अधर्म
और मिथ्या ने माया नाम की एक कन्या भी उत्पन्न की । दंभ और
माया के सयोग से लोभ नामक पुत्र और निकृति नाम की कन्या हुई ।
लोभ और निकृति के सयोग से क्रोध नामक पुत्र हुआ ॥१७॥
सहिंसाया भगिन्यान्तु जनयामास त कलिम् ।
वामहस्त धृतोपस्थ तैलाभ्यक्ताञ्जनप्रभम् ॥ १८ ॥
काकोदर करालास्यं लोलजिह्वं भयानकम् ।
पूतिगन्ध द्यूतमद्यस्त्री सुवर्णकृताश्रयम् ॥ १६ ॥
भगिन्यान्तु दुरुक्त्या स भय पुत्रञ्च कन्यकाम् ।
मृत्यु स जनयामास तयोश्च निरयोऽभवत् ॥ २० ॥
यातनाया भगिन्यान्तु लेभे पुत्रायुतायुतम् ।
इत्थ कलिकुले जाता बहवो धर्मनिन्दका ॥ २१ ॥
यज्ञाध्ययनदानादिवेदतन्त्रविनाशका ।
आधिव्याधिजराग्नानिदुःखशोकभयाश्रया. ॥ २२ ॥
क्रोध की सयोनि हिंसा हुई । उन दोनो के सयोग से ससार को नष्ट
वाले कलि की उत्पत्ति हुई । इस वाम कर मे उपस्थ धारण करने
वाले कलि की देह कान्ति काजल के समान काली हुई ॥१८॥ काकोदर,
कराल, चंचल जिह्वा वाले, भयानक दुर्गन्ध युक्त शरीरधारी इस कलि

( २६१ )
ने द्यूत, मद्य, स्त्री और स्वर्ण मे निवास किया ॥१९॥ कलि की सगर्भा
दुरुक्ति हुई । उन दोनो ने भयानक नामक पुत्र और मृत्यु नाम की कन्या
उत्पन्न की । मृत्यु ने उसके द्वारा निरय नामक पुत्र को उत्पन्न
किया ॥२०॥ निरय की सगर्भा यातना हुई । इन दोनो के सयोग से
हजारो पुत्र उत्पन्न हुए । इस प्रकार कलि के कुल मे बहुतेरे धर्म-निन्दको
की प्रतारणा हुई ॥२१॥ यह सभी आधि व्याधि बुढापा, ग्लानि दुख
शोक और भय के आश्रय को प्राप्त होकर यज्ञ, अध्ययन, दानादि एव
वैदिक तथा तांत्रिक कर्मों का नाश करने वाले हुए ॥२२॥
कलिराजानुगाश्चेरूर्यूथशो लोकनाशकाः ।
बभूवुः कालविभ्रष्टाः क्षणिकाः कामुका नराः ॥ २३ ॥
दम्भाचारदुराचारास्तातमातृविहिंसकाः ।
वेदहीना द्विजा दीनाः शूद्रसेवापराः सदा ॥ २४ ॥
कुतर्कवादबहुला धर्मविक्रयिणोऽधमाः ।
वेदविक्रयिणो व्रात्या रसविक्रयिणस्तथा ॥ २५ ॥
मांसविक्रयिणः क्रूराः शिश्नोदरपरायणाः ।
परदाररता मत्ता वर्णसङ्करकारकाः ॥ २६ ॥
ह्रस्वाकाराः पापसाराः शठा मठनिवासिनः ।
षोडशाब्दायुषः श्यालबान्धवा नीचसङ्गमा ॥ २७ ॥
लोकचरण का नाश करने वाले, कलिराज के अनुचर यूथों ने
चंचल, क्षण-भंगुर और कामुक मनुष्य-देह धारण किये ॥२३॥ यह घोर
दम्भी, दुराचारी, मातृ-पितृ-हिंसक अनुचरगण ब्राह्मण कुल मे जन्म
लेकर भी वेद-विहीन, दरिद्री और शूद्रो के सेवा-परायण हुए ॥२४॥
कुतर्कवाद की बहुलता से युक्त, धर्म, वेद, रस, मांस आदि के विक्रय
मे तत्पर, सस्कार-विहीन, शिश्नोदर-परायण, परदार-परायण, उन्मत्त
एव वर्णशङ्कर सन्तानो के उत्पन्न करनेवाले हुए ॥२५-२६॥ यह नाटे
आकार के, पापी, शठ, मठो मे निवास करने वाले, सोलह वर्ष की
परम आयु वाले, यह कलि के सेवकगण साले को भाई के समान

( २६० )
मानने वाले और नीचो की संगति करने वाले हुए ॥२७॥
विवादकलहक्षुब्धाः केशवेशविभूषणाः ।
कलौ कुलीना धनिनः पूज्या वार्द्धुषिका द्विजाः ॥ २८ ॥
सन्यासिनो गृहासक्ता गृहस्थास्त्वविवेकिनः ।
गुरुनिन्दापरा धर्मध्वजिनः साधुवञ्चकाः ॥ २६ ॥
प्रतिग्रहरता शूद्राः परस्वहरणादरः ।
द्वयो स्वीकारमुद्वाहः शठे मैत्री वदान्यता ॥ ३० ॥
प्रतिदाने क्षमाशक्तौ विरक्तिकरणक्षमे ।
वाचालत्वञ्च पाण्डित्ये यशोऽर्थे धर्मसेवनम् ॥ ३१ ॥
धनाढ्यत्वञ्च साधुत्वे दूरे नीरे च तीर्थता ।
सूत्रमात्रेण विप्रत्व दण्डमात्रेण मस्करी ॥ ३२ ॥
विवाद-कलह से क्षुब्ध रहने वाले, केश विन्यास में आसक्त, धन-
वान, ब्याज से जीविका चलाने वाले एवं कुलीन कहलाने वाले यह
ब्राह्मण ही कलिकाल मे पूजनीय हुए ॥२८॥ सन्यासी गृहस्थ-धर्म
परायण हो गए, गृहस्थो मे विवेचन शक्ति का अभाव होगया, शिष्य
गुरु निन्दक और धर्मध्वजी साधु वंचक होंगए ॥२६॥ शूद्र दान लेने और
पर-सम्पत्ति के हरण करने वाले हुए, स्त्री-पुरुष की सहमति ही विवाह
हुआ, मित्र शठ हुए, प्रतिदान ही दानशीलता होगया, न्यायाधीश दण्ड
देने मे असमर्थ होकर क्षमाशील होगए, दुर्बल के प्रति उदासीनता होने
लगी, अधिक बोलने वाले ही पडित कहे जाने लगे तथा यश की कामना
से ही लोग धर्म का सेवन करने लगे ॥३०-३१॥ धनवान ही साधु पुरुष
माने जाने लगे, दूर का लाया हुआ जल ही तीर्थ का जल होगया, यज्ञो-
पवीत मे ही ब्राह्मणत्व निहित होगया और दण्ड धारण सन्यासी का
लक्षण रह गया ॥३२॥
अल्पशस्या वसुमती नदीतीरेऽवरोपिता ।
स्त्रियो वेश्यालापसुखाः स्वपुंसा व्यक्तमानसाः ॥ ३३ ॥
परान्नलोलुपा विप्राश्चण्डालगृहयाजकाः ।

( २६३ )
स्त्रियो वैधव्यहीनाश्च स्वच्छन्दाचरणप्रिया. ॥ ३४॥
चित्रवृष्टिकरा मेघा मन्दशस्या च मेदिनी ।
प्रजाभक्षा नृपा लोका. करपीडाप्रपीडिताः ॥ ३५ ॥
स्कन्धे भार करे पुत्रं कृत्वा क्षुब्धाः प्रजाजन. ।
गिरिदुर्गं वन घोरमाश्रयिष्यन्ति दुर्भगा. ॥ ३६ ॥
मधुमासैर्मूलफलैराहारै प्राण धारिण ।
एव तु प्रथमे पादे कले कृष्णविनिन्दका. ॥ ३७ ॥
पृथिवी अल्पशस्या होगयी, नदियाँ अन्यान्य स्थानो मे बहने वाली हुई,
नारियाँ वेश्यालय मे सुख मानने लगीं और भार्याओं का पति मे अनुराग
नही रहा ॥३३॥ पराये अन्न की कामना वाले ब्राह्मण शूद्रो के यहाँ
यजन करने लगे, विधवाओ ने वैधव्य का आचरण त्याग दिया और
स्वच्छन्द आचरणवाली होगई ॥३४॥ मेघ,खण्ड-वृष्टि वाले हुए, पृथिवी
मन्दशस्या हुई, राजागण प्रजा-भक्षक होगये, जिससे प्रजा करों के भार
से उत्पीडित हो उठी ॥ ३५ ॥ अत्यन्त क्षुब्ध हुए प्रजाजन कन्धे पर
बोझओर हाथ में पुत्र लेकर दुर्गम पर्वत और घोर वनो में जाकर आश्रय
खोजने लगे ॥ ३६ ॥ मधु,मास मूल और फल का भोजन ही प्राण
धारणा का सहारा बन गया । कलि के प्रथम पाद मे ही मनुष्यगण श्री
कृष्ण-निन्दक हो गये ॥ ३७ ॥
द्वितीये तन्नामहीनास्तृतीये वर्णसङ्कर. ।
एकवर्णाश्चतुर्थे च विस्मृत,च्युतसत्क्रियाः ॥ ३८ ॥
निःस्वाध्या-स्वधा-स्वाहा-वौषडोंकार-वर्जिता. ।
देवा सर्वे निराहारा. ब्रह्माण शरण ययु ॥ ३६ ॥
धरित्रीमग्रत कृत्वा क्षीणां दीनां मनस्विनीम् ।
ददृशुर्ब्रह्मणौ लोक वेदध्वनिनादितम् ॥ ४० ॥
यज्ञधूमै समाकीर्णं मुनिवर्यै निषेवितम् ।
सुवर्ण वेदिकामध्ये दक्षिणावर्त्त मुज्ज्वलम् ॥ ४१ ॥
र्वृत्ति यूपाइङ्कितोद्यान-वन-पुष्प-फलान्वितम् ।

( २६४ )
सरोभिः सारसैर्हंसैराहूयन्त मिवातिथिम् ॥ ४२
कलि के द्वितीय पाद में लोग श्रीकृष्ण नाम को भी भूल गए,
तीसरे पाद में वर्ण संकर उत्पन्न हुए और चौथे पाद में तो जाति-पाँति
ही कुछ न रही, लोग सत्कर्म और ईश्वर को भी भूल गये ॥ ३८ ॥
स्वाध्याय, स्वधा, स्वाहा, वषट्कार और ओंकारादि का लोप हो गया
जिससे सभी देवता आहार न मिलने के कारण पीड़ित होकर ब्रह्माजी
की शरण में गये ॥ ३६ ॥ सभी क्षीणता को प्राप्त हुए दीन देवगण
चिन्तित पृथ्वी को आगे करके ब्रह्म-लोक को गये । वह लोक उन्हें
वेद-ध्वनि से गूँजता हुआ दिखाई दिया ॥ ४० ॥ वहाँ यज्ञ का धुआ
फैल रहा था, मुनिगण उपासना एव यज्ञ कर रहे थे, स्वर्ण-वेदी के
मध्य दक्षिणाग्नि प्रज्वलित थी, उद्यान वन-पुष्पों और फलो से परिपूर्ण
थे, सरोवर में सारस और हंसों के मधुर स्वर ऐसे लग रहे थे, मानों
अतिथियों का स्वागत कर रहे हों ॥ ४१-४२ ॥
वायु लोललताजालकुसुमालिकुलाकुलैः ।
प्रणताह्वान-सत्कार-मधुरालापवीक्षणै ॥ ४३ ॥
तद्ब्रह्मसदनं देवाः सेश्वराः क्लिन्नमानसाः ।
विविशुस्तदनुज्ञाता निजकार्य निवेदितुम् ॥ ४४ ॥
त्रिभुवनजक सदासनस्थ सनक-सनन्दन-सनातनेडवसिद्धैः
परिसेवित पादकमल ब्रह्माण देवता नेमुः ॥ ४५ ॥
चंचल पवन लता-जालो को झकोर रहा था, अलि अवलि कलियों
का रस-पान करते गूँज रहे थे, मानों यह सभी प्रणाम, आह्वान,
सत्कार आदि के लिए मधुर वाणी का प्रयोग कर रहे हों ॥ ४३ ॥
अपने स्वामी इन्द्र के सहित खेद युक्त मन वाले सब देवता ब्रह्माजी की
आज्ञा प्राप्त करके अपना दुःख निवेदन करने के लिए ब्रह्म-सदन में
प्रविष्ट हुए ॥ ४४ ॥ वहाँ जाकर सनक, सनन्दन और सनातन से अपने
चरण-कमलों की सेवा कराते हुए एवं श्रेष्ठ आसन पर आसीन ब्रह्मा-
जी को उन देवताओं ने नमस्कार किया ॥ ४५ ॥

द्वितीय अध्याय
उपविष्टास्ततो देवा ब्रह्मणो वचनात्पुरः ।
कलेर्दोषाद्धर्महानि कथयामासुरादरात् ॥ १ ॥
देवाना तद्वच श्रुत्वा ब्रह्मा तानाह दुःखितान् ।
प्रसादयित्वा तं विष्णु साधयिष्याम्यभीप्सितम् ॥ २ ॥
इति देवै परिवृत। गत्वा गोलोकवासिनम् ।
स्तुत्वा प्राह पुरो ब्रह्मा देवाना हृदयेप्सितम् ॥ ३ ॥
सूतजी बोले—हे मुनीश्वरो ! वहाँ जाकर वे सभी देवता
ब्रह्माजी की आज्ञा से उनके समक्ष बैठ गये । फिर उन्होने कलि के
दोषो से जो धर्म की हानि हुई थी, उसका सम्पूर्ण वृत्तान्त निवेदन
किया ।। १ ।। दुःखित हृदय वाले देवताओ के वचन सुनकर ब्रह्माजी
बोले—मै भगवान् विष्णु की आराधना करके तुम्हारा सब मनोरथ
सिद्ध करता हूँ ॥२॥ यह कर ब्रह्माजी ने देवताओ को साथ लिया और
गोलोक निवासी भगवान् श्री हरि की सेवा मे जा पहुँचे । वहाँ उन्होने
स्तुति की और फिर देवताओ की कामना निवेदन की ॥३॥
तच्छ्रुत्वा पुण्डरीकाक्षो ब्रह्माणमिदमब्रवीत् ॥
शम्भले विष्णुयशसो गृहे प्रादुर्भावाम्यहम् ।
सुमत्योमातरि विभो ! पत्न्यां त्वन्निदेशतः ॥ ४ ॥
चतुर्भिर्भ्रातृभिर्देव ! करिष्यामि कलिकक्षयम् ।
भवन्तो बान्धवा देवाः स्वांशेनावतरिष्यथ ॥ ५ ॥
इय मम प्रिया लक्ष्मी सिंहले संभविष्यति ।
बृहद्रथस्य भूपस्य कौमुद्या कमलेक्षणा ।
भार्यया मम भार्ये० ज्ञानाम्नी जनिष्यति ॥ ६ ॥