कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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मानने वाले और नीचो की संगति करने वाले हुए ॥२७॥
विवादकलहक्षुब्धाः केशवेशविभूषणाः ।
कलौ कुलीना धनिनः पूज्या वार्द्धुषिका द्विजाः ॥ २८ ॥
सन्यासिनो गृहासक्ता गृहस्थास्त्वविवेकिनः ।
गुरुनिन्दापरा धर्मध्वजिनः साधुवञ्चकाः ॥ २६ ॥
प्रतिग्रहरता शूद्राः परस्वहरणादरः ।
द्वयो स्वीकारमुद्वाहः शठे मैत्री वदान्यता ॥ ३० ॥
प्रतिदाने क्षमाशक्तौ विरक्तिकरणक्षमे ।
वाचालत्वञ्च पाण्डित्ये यशोऽर्थे धर्मसेवनम् ॥ ३१ ॥
धनाढ्यत्वञ्च साधुत्वे दूरे नीरे च तीर्थता ।
सूत्रमात्रेण विप्रत्व दण्डमात्रेण मस्करी ॥ ३२ ॥
विवाद-कलह से क्षुब्ध रहने वाले, केश विन्यास में आसक्त, धन-
वान, ब्याज से जीविका चलाने वाले एवं कुलीन कहलाने वाले यह
ब्राह्मण ही कलिकाल मे पूजनीय हुए ॥२८॥ सन्यासी गृहस्थ-धर्म
परायण हो गए, गृहस्थो मे विवेचन शक्ति का अभाव होगया, शिष्य
गुरु निन्दक और धर्मध्वजी साधु वंचक होंगए ॥२६॥ शूद्र दान लेने और
पर-सम्पत्ति के हरण करने वाले हुए, स्त्री-पुरुष की सहमति ही विवाह
हुआ, मित्र शठ हुए, प्रतिदान ही दानशीलता होगया, न्यायाधीश दण्ड
देने मे असमर्थ होकर क्षमाशील होगए, दुर्बल के प्रति उदासीनता होने
लगी, अधिक बोलने वाले ही पडित कहे जाने लगे तथा यश की कामना
से ही लोग धर्म का सेवन करने लगे ॥३०-३१॥ धनवान ही साधु पुरुष
माने जाने लगे, दूर का लाया हुआ जल ही तीर्थ का जल होगया, यज्ञो-
पवीत मे ही ब्राह्मणत्व निहित होगया और दण्ड धारण सन्यासी का
लक्षण रह गया ॥३२॥
अल्पशस्या वसुमती नदीतीरेऽवरोपिता ।
स्त्रियो वेश्यालापसुखाः स्वपुंसा व्यक्तमानसाः ॥ ३३ ॥
परान्नलोलुपा विप्राश्चण्डालगृहयाजकाः ।