कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
About this granth
The Kalika Purana (कालिका पुराण) is a Shakta upapurana closely tied to Kamarupa in Assam and the shrine of Kamakhya. It glorifies the Goddess as Kalika, Mahamaya and Yoganidra, tells the story of Sati and the origin of the Shakti pithas, and gives detailed rules of worship, which makes it important for students of Tantra and Shakta practice.
Its contents list the glory of the Purana and of Kali, her form and descent, the coming of spring, hymns to Yoganidra and Kali, the words of Madana, Hari's entreaty to Shiva, the proposal of marriage to Sati, the unity of the three gods, the calming of Hara's anger, the story of Mount Kshipra and the river Kshipra, the curse on the Moon, Vasishtha's initiation of Sandhya and his marriage to Arundhati, primal creation, the origin of the Varaha sacrifice and the Kapila incarnation. Later sections describe the falling of Sati's body, the Kamarupa pitha, the testing of Gauri, the Mahamaya rite, the Shakradhvaja festival, the Kamakhya kavacha and matrika nyasa.
This edition is a Hindi translation published by Kalyan Mandir, Prayag. Its 442 pages serve devotees of the Goddess and readers of Shakta Puranic literature.
൰०४ श्रीकालिका पुराण ൰०४ ४१७
देवगणों के लिए समर्पित किया करता है वह मनुष्य घोर नरक में प्राप्त
हुआ करता है । धूप को कभी आसन पर तथा घट पर वितरण नहीं
करना चाहिए । जैसा-जैसा भी कोई आधार बनाकर ही उनको
विनवेदित करना चाहिए । रक्त विद्रुम, शाल, सुरथ, सुरल, सन्तानक,
नमेरु, काला गुरु से समन्वित, जाती से संयुक्त धूप कामेश्वरी को प्रिय
हुआ करता है ।
हे पुत्र! उसी भाँति यह त्रिपुण्या को तथा नित्य ही मातृकाओं को
और समस्त पीठदेवों को और रुद्र आदि को भी प्रिय हुआ करता है ।
धूप हमने आपको बता दिया है ।
अब नेत्रों के अञ्जन के विषय में आप श्रवण करिए जिसके द्वारा
कामाख्या देवी त्रिपुरा देवी वैष्णवी देवी परम प्रसन्न हुआ करती हैं ।
अञ्जन छः प्रकार के हुआ करते हैं उनके नाम ये हैं-सौवीर, यामुन,
तुत्य, मयूरयामुन, दूर्विका, मेघनील, ये छः होते हैं । ये घिसे हुए ग्रहण
करने के योग्य होते हैं । चाहे शिला पर घिसे हुए हों या किसी उत्तम
धातु पर घृष्ट किए गए हों । हे पुत्र! यह सभी देवों के लिए समर्पित
करे और सभी देवियों की सेवा में निवेदित करना चाहिए । धृत और
तैल आदि के योग्य से ताम्र आदि पर दीपक की अग्नि के द्वारा जो
अञ्जन बनाया जाता है वही दर्विका कहा गया है । यदि सबका अभाव
हो तो देवियों की सेवा में इस दाह से समुत्पन्न अञ्जन को ही समर्पित
करना चाहिए । महामाया देवी, जगत् की धात्री कामाख्या देवी तथा
त्रिपुरा देवी इन उपर्युक्त छः प्रकार के अञ्जनों से जब ये निवेदित किए
गए हों तो सदा ही महान तोष को प्राप्त हुआ करती है अर्थात् उनको
परमाधिक प्रसन्नता इनको हुआ करती है । महामाया के लिए प्रस्तुत इस
उत्तम अंजन को विधवा नारी को कभी अपने उपयोग में नहीं लेनी
चाहिए । इसका तात्पर्य यही है कि विधवा नारी के द्वारा यह अंजन
नहीं बनाया जाना चाहिए ।
वैष्णवी देवी कभी भी विधवा नारी के द्वारा तैयार किया अञ्जन
स्वीकार नहीं करती हैं । साधना करने वाले को चाहिए कि मिट्टी के
४१८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
पात्र में विहित अञ्जन को निवेदित करने से पूजा के फल की भी
प्राप्ति कभी नहीं हुआ करती है । ऐसा अञ्जन नहीं देना चाहिए क्योंकि
जब इस अञ्जन को देवी स्वीकार ही नहीं किया करती है तो वह पूजा
अधूरी होकर निष्फल हो जाया करती है । धूप और नेत्र अञ्जन इन
दोनों का ही देवगणों के लिए भक्ति की भावना द्वारा मनुष्य को
समर्पण करना चाहिए । इस प्रकार से हमने आप दोनों के समक्ष धूप
और नेत्र अंजन इन दोनों को बता दिया है । अब एकाग्र मन वाले
होकर महादेवी के लिए जो भी नैवेद्य समर्पित करना चाहिए उसके
विषय में श्रवण करिए ।
प्रदक्षिणा और प्रणाम निर्णय
श्री भगवान् ने कहा-दक्षिण हाथ को प्रसारित करके फिर स्वयं
नग्न शिर वाला हो और दाहिने पार्श्व को दर्शित करता हुआ एक बार
अथवा तीन बार वेष्टित करें । इसके करने से देवी को प्रीति हुआ
करती है । और जो एक सौ आठ बार देवी की प्रदक्षिणा किया करता
है वह पुरुष अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त करके पीछे अन्त समय
में मोक्ष की प्राप्ति का लाभ किया करता है । जो मन से भी भक्ति की
भावना से देवी के लिए प्रदक्षिणा (परिक्रमा) दिया करता है वह इस
प्रदक्षिणा के ही पुण्य-प्रभाव से ही यमराज गृह में अर्थात् समय पुरी
में जाकर नरकों को कभी नहीं देखा करता है । नमस्कार भी काया से
होने वाला, वाणी के द्वारा समुत्पन्न हुआ और मन से किया हुआ तीन
प्रकार का हुआ करता है । जो उसके ज्ञान रखने वालों के द्वारा उत्तम,
मध्यम और अधम तीन प्रकार का सुना गया है । इस नमस्कार करने
का भी उक्त तीनों श्रेणियों में करने का क्रम है । जो अपने दोनों हाथों
को और पैरों को फैलाकर भूमि में एक दण्ड की भाँति गिरकर अपने
घुटनों से भूमि में जाकर शिर से फिर भूमि गमन करके अर्थात् शिर
से भूमि का स्पर्श करके नमस्कार अपने आठों अंगों के सहित किया
जाता है वही उत्तम नमस्कार होता है । जो काया के ही द्वारा किया
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४९९
जाया करता है, इसी को कायिक कहा गया है । जो अपने घुटनों से
भूमि का स्पर्श करके और शिर से पृथ्वी का स्पर्श करके किया जाता
है वह नमस्कार मध्यम श्रेणी कायिक कहा गया है ।
जो अपने दोनों करों को जोड़ कर किसी प्रकार से अपने शिर में
ही लगाकर नमस्कार किया जाता है और जिसमें घुटनों और मस्तक को
भूमि में स्पर्श नहीं करके ही किया जाता है वह नमस्कार अधम कोटि
का कहा जाया करता है । ये तीन तरह के नमस्कार काया से किए जाने
वाले होते हैं तथा जो नमस्कार गद्य तथा पद्य के द्वारा घटित करके
किया जाता है और भक्ति की भावना से होता है वह वाचिक अर्थात्
वाणी के द्वारा किए जाने वाले उत्तम श्रेणी का नमस्कार किया जाया
करता है वह सदा ही वाणी के द्वारा किया हुआ मध्यम कोटि का
नमस्कार होता है और जो मनुष्य के वाक्य के ही द्वारा सदा नमस्कार
किया जाता है । हे पुत्रों! वह वाणी से ही किया हुआ अधम श्रेणी
वाला नमस्कार समझना चाहिए । मन के द्वारा भी किया हुआ नमस्कार
उत्तम, मध्यम और अधम ये तीन प्रकार का कहा गया है । जो मन को
पूर्णतया संलग्न करके किया जावे तथा आधे मन से केवल खाना पूरी
ही की जावे अथवा मन को इष्टवत न करके ही किया जाया करता
है ये तीन प्रकारों वाला अर्थात् उत्तम, मध्यम और अधम मानस
नमस्कार होता है । इन तीनों प्रकार के नमस्कारों में कायिक अर्थात्
शरीर के द्वारा किए जाने वाला नमस्कार ही उत्तम होता है । कायिक
नमस्कारों से ही देवगण नित्य परम प्रसन्न हुआ करते हैं । यह ही
नमस्कार जो दण्ड आदि के द्वारा प्रतिनामों से पूर्व में प्रतिपादित किया
गया है उसी को प्रणाम जान लेना चाहिए ।
◯ नैवेद्य अर्पण
नैवेद्य के द्वारा सभी कुछ होता है और नैवेद्य से अमृत होता है ।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चारों परम पुरुषार्थ नैवेद्यों में ही
प्रतिष्ठित रहा करते हैं । नैवेद्य नित्य ही समस्त यज्ञों से परिपूर्ण होता
है और यह नैवेद्य से देवों की तुष्टि के प्रदान करने वाला है । यह नैवेद्य
ज्ञान का देने वाला एवं सभी भोग्यों से परिपूर्ण हुआ करता है । जो
मनुष्य महादेवी के लिए मन के द्वारा भी नैवेद्य के समर्पित करने की
इच्छा किया करता है वह मानव भक्ति से युक्त होता हुआ दीर्घ आयु
वाला और सुखी हुआ करता है । जो मनुष्य सदा ही महामाया देवी की
भक्ति से अनेक प्रकार के नैवेद्यों के द्वारा अर्चना करूँगा, ऐसी चिन्ता
से आकुलित रहा करता है वह सभी मन की कामनाओं की प्राप्ति
करके अन्त में मेरे ही लोक में प्रतिष्ठित हुआ करता है । जो पुरुष मन
से भी देवी के लिए भक्तिभाव से प्रदक्षिणा देता है वह फिर यमराज
की पुरी में कभी भी नरकों को नहीं देखा करता है । नमस्कार का बड़ा
भारी महत्व होता है । इससे देव, मनुष्य, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पन्नग
प्रसन्न हुआ करते हैं । महती मति वाला पुरुष नमस्कार द्वारा चारों वर्गों
का लाभ प्राप्त किया करता है । सभी जगह सबकी सिद्धि के लिए
नमस्कार ही प्रशस्त किया करता है अर्थात् नमस्कार सबकी प्राप्ति के
लिए परम उत्तम साधन माना है ।
नमस्कार से लोकों पर मानव विजय प्राप्त किया करता है और
नमस्कार से आयु की भी वृद्धि होती है, नमन करने से मानव दीर्घ आयु
वाला होता है और नमस्कार से अविच्छिन्न सन्तति का लाभ प्राप्त
किया करता है जो कि सन्ततियों का क्रम कभी भी टूटता नहीं है ।
अतएव महादेवी के लिए नमस्कार करो और प्रदक्षिण होकर ही
नमस्कार करो । तात्पर्य यह है कि देवों को दक्षिण भाग में स्थित करके
ही नमस्कार करना चाहिए । जो निरन्तर नैवेद्य दीजिए-यह कहा करता
है और बार-बार बोलता है वह मानव भी अपने समस्त मनोरथों की
प्राप्ति किया करता है । इस तरह से आप दोनों को मैंने षोडश
(सोलह) उपचार जो अभ्यर्चन के हुआ करते हैं बता दिए हैं । अब
आप दोनों को क्या रुचिर है अर्थात् अब आप दोनों क्या पूछना पसन्द
करते हैं उसी को बता दूँगा ।
कामाख्या कवच माहात्म्य वर्णन
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४२१
कामाख्या कवच माहात्म्य वर्णन
आप दोनों श्रवण कीजिए मैं कामाख्या देवी के माहात्म्य का वर्णन
करूँगा । हे वेताल! हे भैरव! अंगों के सहित उस रहस्य से युक्त को
आप दोनों सुनिए । एक समय भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने वाहन
गरुड़ के द्वारा गमन करते हुए नीलपर्वत पर विराजमान कामाख्या देवी
के समीप में प्राप्त हुए थे । उस परम श्रेष्ठ पर्वत पर पहुँचकर उनका
ज्ञान प्राप्त करके उन भगवान् शिव ने गरुड़ को गमन करने की गति
में 'चलो-चलो' इस प्रकार से प्रेरित किया था । समस्त जगतों को
समुत्पन्न करने वाली महामाया कामाख्या देवी ने उन भगवान् श्री विष्णु
को गरुड़ के साथ आते हुए जान कर आकाश में ही स्तम्भित कर दिया
था । वे गमन करने के लिए समुद्यत थे किन्तु महामाया की भी माया
से ऐसे मोहित हो गए थे कि न तो आगे गमन करने में और न वापिस
आगमन करने में समर्थ हुए और विद्ध की ही भाँति वहीं पर स्थित रह
गए थे । भगवान् गरुड़ध्वज गरुड़ को गमन करने में असमर्थ देखकर
बहुत क्रुद्ध हुए थे और उस श्रेष्ठ पर्वत को उत्साहित करने के लिए
समुद्यत हुए थे । इसके अनन्तर जगतों के स्वामी श्री विष्णु ने अपने
करों के द्वारा उस पर्वत को हिलाने में समर्थ नहीं हुए थे अर्थात् तनिक
भी न हिला सके थे ।
जिस समय में उस पर्वत को चालित करने की इच्छा और प्रयत्न
करते हुए केशव भगवान को देखा था तो महादेवी कामाख्या बहुत ही
क्रोधित हुई थीं और उस देवी ने सिद्धसूत्र के द्वारा भगवान् बैकुण्ठनाथ
को गरुड़ के साथ बाँध दिया था । उनको सिद्धसूत्र से बाँधकर ग्राहाग्र
क्षीर समुद्र में देवी ने वहीं से उनको प्रक्षिप्त कर दिया था और वे
संक्षेपण करने से तल में प्रपतित हो गए थे । सागर के तले में प्राप्त
हुए उन भगवान् केशव को फिर भी अपनी माया से मन्त्रित करके वहाँ
पर समाक्रान्त होकर सागर के तल में स्थित हुए उनको ग्रहण कर लिया
था । उन केशव प्रभु ने बड़ा भारी प्रयत्न किया था । सागर के तले से
ऊपर और महान् प्रयत्न करते हुए भी रहें कि पुन: उन्मज्जित हो जायेंगे
४२२ ൠ श्रीकालिका पुराण ൠ
हरि ने सब कुछ यत्न किया था कि उनके असार और प्रसार को उस
देव ने रोक दिया था । इसके अनन्तर वे प्रज्ञान से रहित हो गए तथा
असार प्रसार से अर्थात् हिलने से भी डुलने से भी शून्य हो गए थे और
गरुड़ के ही साथ से चिरकाल तक सागर के जल के तले में ही शीर्ण
रहे थे । सृजन करने के लिए जब उनकी बहुत खोज की तो उनको
सागर के तले में समवस्थित हुए हरि को पाया था और वे ऐसे विशीर्ण
हो रहे थे और कोई साधारण प्राणी होता है ।
सृजन करने वाले लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने गरुड़ के सहित
उनको प्राप्त करके उन्होंने अपने दोनों करों के द्वारा लाने की भी इच्छा
की थी । किन्तु लोकों के पितामह भी उनको उत्प्लावित करने करने के
समर्थ नहीं हुए थे और स्वयं भी देवी की माया से बुद्ध होकर विस्मय
करते हुए ही स्थित रह गए थे । फिर समस्त देवगण जिनमें इन्द्र सबके
नायक थे सबके सब खोज करते हुए बहुत अधिक समय में उन्होंने
सागर के दूषित जल के मध्य में उन दोनों को प्राप्त किया था और फिर
सब इन्द्र आदि देवों ने उनको से ऊपर लाने का बड़ा भारी प्रयत्न किया
था किन्तु वे भी ऐसा न कर सके थे । इसके अनन्तर वे सब देवगण
भी देवी की माया से अत्यधिक मोहित हो गए थे । जिस रीति से जल
के तले में भगवान् विष्णु और ब्रह्माजी स्थित थे उसी प्रकार से वे सब
भी वहीं पर संस्थित रह गए थे । उस समय में देवगुरु बृहस्पति भी
सबकी खोज करते हुए चले गए थे और हिमालय की शिखा पर
विराजमान महादेवी के समीप पहुँचे । देवों के द्वारा पूजित महादेवजी
ने देवों का सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे पूछा था तब बड़े आदर के साथ
देवगुरु ने उनको प्रणाम करके यथाविधि करके निवेदन किया था ।
देवगुरु ने कहा-हे महादेव! आप तो समस्त जगतों के धाम हैं तथा
जगत् के प्रशमन के कारणस्वरूप हैं । मैं इन्द्र आदि देवों की खोज
करता हुआ ही इस समय आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ । इस समय
ब्रह्माजी और विष्णु भगवान् न तो ब्रह्मा सदन में हैं और न स्वर्ग में ही
है । इनमें वे कहीं पर भी समवस्थित नहीं जाने जाते हैं । जैसे अन्य
समय या स्थान में हों ऐसा भी नहीं जाने जाते हैं। हे देव! आप तो देवों
के भी देव हैं। मेरे इस महान् संशय का छेदन कीजिए। इस माया में
कहाँ पर स्थित हैं, किस कारण से स्थित हो रहे हैं और ऐसे किस
प्रकार से वे अवस्थित हो रहे हैं। हे प्रभो! मैं अब आपके ही उपदेश
से उन सबके पीछे अनुगमन करूँगा। यदि आपके हृदय में दया हो तो
अब उन सबकी स्थित के विषय में मुझे बताइये। महादेवजी ने देवगुरु
के उन वचनों का श्रवण किया था और उनके उपदेश का भी ज्ञान
प्राप्त कर लिया था। फिर महादेव ने कहा था जो कि कर्म हुआ था
और जिस प्रकार से वे सब माया में बद्ध हुए थे, यह सभी कुछ बता
दिया था। महामाया महादेवी को भी अब ज्ञात करा दिया था इसी
कारण से उस देवी की माया में बद्ध हुए भगवान् विष्णु सागर के जल
में स्थित हैं। उसकी खोज करते हुए देवगण ब्रह्मा आदि सब फिर
माया से बद्ध हुए उनके ही समीप में अत्यन्त संयत होते हुए स्थित रहते हैं।
यदि आप भी उनकी खोज करते हुए वहाँ पर जाते हैं और मेरे
बिना अकेले ही वहाँ पर गमन करते हैं तो आप भी वहाँ पर उसी भाँति
बद्ध हो जायेंगे और फिर जहाँ से आने में समर्थ नहीं हो सकेंगे। इस
कारण से मैं ही वहाँ पर जाता हूँ जहाँ पर गरुड़ध्वज प्रभु स्थित हैं।
मैं ही ब्रह्मा और इन्द्र आदि उन सबका क्रम से मोचन करा दूँगा। इस
प्रकार से देवगुरु के साथ मिलकर वृषभध्वज ने कहा था और फिर
जहाँ पर देवों के समुदाय स्थित थे वहीं पर वे महेश्वर गए थे। वहाँ
पर जाकर महादेवजी ने भगवान् विष्णु और ब्रह्माजी से तथा अन्य सब
देवगणों से बातचीत करके पूछा था कि आप सब वहाँ पर किसलिए
स्थित हो रहे हैं। आप सब तो गमन और आगमन से रहित हो रहे हैं
तथा एक जड़ की भाँति ज्ञान से वर्जित हो रहे हैं आप सब ऐसे
किसलिए हो गए हैं ? हे देवगणों! यह सब मुझे बताइए। उन
महादेवजी के इस वचन का श्रवण करके केशव भगवान् ने धीरे से
ब्रह्मा आदि देवों के आगे उस समय में महादेवजी से यह कहा था।
श्री भगवान् ने कहा-नीलकूट के शिखर पर से ऊपर की ओर
४२४ श्रीकालिका पुराण
आकाश में गरुड़ के द्वारा गमन करते हुए मैंने महान् नीलगिरि को हाथ
से पकड़ लिया था और मैं उसको ऊपर उठाना चाहता था क्योंकि वह
गरुड़ की गति का कारण करने वाला था। वहाँ पर कामरूपों वाली
उस कामाख्या योगनिद्रा ने मुझको पकड़कर महासागर के जल में फेंक
दिया था। फिर मैं तल में पहुँच कर जो समुद्र का था अपने वाहन के
सहित गिर गया था। हे अन्धक के सूदन करने वाले! मैं यहाँ पर बहुत
अधिक समय से निवास कर रहा हूँ। मैं यहाँ पर ही इस महासागर के
जल में ही चिरकाल से ही रहता हूँ। हे महेश्वर! वह महामाया मेरे ऊपर
दया नहीं कर रही हैं और अभी तक भी मैं वैसा ही हो रहा हूँ। मेरे
ही लिए सभी ओर से ब्रह्मा आदिक अब समागत हुए थे। महादेवी ने
हठ से उन सबको भी माया के पाश से बद्ध कर दिया था। इस कारण
से आप हमारे ऊपर अनुग्रह कीजिए और अब मुझको शिवालय में ही
ले चलिए और हम लोग इस बन्धन की विशेष हिंसा से उस महादेवी
को प्रसन्न करेंगे। भगवान् हरि के उस वचन को सुनकर मैं करुणा से
युक्त हो गया था अर्थात् मुझे दया आ गई थी। फिर मैं परम प्रीति
से स्वयं ही ब्रह्माजी और भगवान् विष्णु से बोला था।
यह कामपूर्वा ईश्वर का एक सुमनोहर कवच है। उस कवच को
शरीर में बाँधकर और आप्लावित होकर पीछे मेरी और गमन करें। मैं
भी कवच बाँधे हुए हूँ। इस कारण से माया के द्वारा यहाँ पर मेरे संसर्ग
से ही बृहस्पति को निवृद्ध नहीं किया गया है। इस कारण से तुम लोग
मेरे वचन से उस कवच का श्रवण कर लीजिए। जिसके द्वारा सुख
के साथ भली-भाँति उपप्लुत होकर परमेश्वरी का दर्शन करेगा। ॐ
कामाख्या कवच के ऋषि बृहस्पति कहे गए हैं। उसकी देवी कामेश्वरी
देवी है तथा छन्द अनुष्टुप् होता है। उसका विनियोग सबकी सिद्धि में
होता है। हे देवताओं ! उसका आप श्रवण कीजिए। कण्ठ में महामाया
रक्षा करें फिर हृदय में कामेश्वरी रक्षा करें। कामाख्या जठर में रक्षा
करें और शारदा मुझको नाभि में रक्षा करें। त्रिपुरी दोनों पाश्र्वों में रक्षा
करे। मेदन में महामाया रक्षा करे। गुद में कामेश्वरी रक्षा करे और
൵ल श्रीकालिका पुराण ൵ल ४२५
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
कामाख्या मुझको दोनों ऊरुओं में रक्षित करे । दोनों घुटनों में शारदा
देवी रक्षा करें और दोनों जाँघों से रक्षा करें । दोनों पादों में ये महामाया
रक्षा करे और कामदा नित्य ही रक्षा करें । केश में कामेश्वरी रक्षा करे
तथा दोनों अंगों में मातंगी रक्षा करे । दाँतों के समुदाय में भैरवी रक्षा
करे तथा दोनों अंगों में मातंगी रक्षा करे । ललिता मेरी बाहुओं में रक्षा
करे और दोनों प्राणियों में वनवासिनी रक्षा करे । अंगुलियों में
विन्ध्यवासिनी देवी रक्षा करे और नखों की कोटियों में श्रीकामा रक्षा
करे । समस्त रोम कूपों में सदा गुप्तकामा परित्राण करें । पैरों की
अंगुलियों में तथा पार्ष्णिभाग में मेरी भुवनेश्वरी करे । जिह्वा में मेरी सेतु
रक्षा करे तथा कण्ठ के भीतर की रक्षा करे । वक्षस्थल के अन्दर में
लःरक्षा करे । बिन्दु के अन्दर से इन्दु रक्षा करे । समस्त नाड़ियों में
रक्षाकर और ईकार सभी सन्धियों में मेरी रक्षा करे स्नायुओं में मेरा
परित्राण चन्द्र करे तथा निरन्तर बिन्दु मज्जाओं में मेरी रक्षा करे ।
पूर्व दिशा में, आग्नेयी में, दक्षिण में, तथा नैर्ऋत में, वायव्य में,
ईशान में, कौवेर में, हर मन्दिर में प्रत्येक में उनको देवों ने तत्क्षण में
आरोहण कर-कर के पान किया था । स्नान किया था और पूर्व की
ही भाँति उन्होंने अतुल प्रीति को प्राप्त किया था । वे सब नीरोग होकर
अर्थात् परम स्वस्थ होते हुए वहाँ से गमन करे गए थे और परम विस्मय
से आकृष्ट चेतना वाले हो गए थे । वे सभी स्तवन करते हुए तथा
प्रस्तवन करते हुए गए थे जो कि कामाख्या देवी के योनि मण्डल की
स्तुति करते हुए ही वहाँ से गए । इसके अनन्तर देव गुरु को उन्होंने
प्रणाम किया था और मुझको भी अभिवादन किया था और मेरी स्तुति
की थी । फिर मैंने उनको विदा किया था और वे सब देवगण हर्ष से
विकसित लोचन वाले होते हुए स्वर्ग को चले गए थे । हे भैरव!
कामाख्या देवी का ऐसा ही महात्म्य है और देवी का कवच भी इसी
तरह का है जो कहा गया है । अब हे पुत्र! तत्त्व कों प्राप्त करके अपने
अभीष्ट के अनुसार विनियोग करके द्वारा उनकी प्राप्ति करके सुखी
होओ । यह कामाख्या का माहात्म्य है । अब अन्य मैं क्या तुमको
मातृका न्यास वर्णन
४२६ श्रीकालिका पुराण
बताऊँ। जिसकी योनि के शिलाबल से आयोग से लौह आदि धातुयें
सुवर्ण हो जाया करती हैं। जो मानव इसके मण्डल में स्नान करके और
एक बार भी प्रदक्षिणा करता है वह परम निर्वाण को प्राप्त किया
करता है ।
मातृका न्यास वर्णन
श्री भगवान् ने कहा-हे वेताल भैरव! अब तुम मातृका न्यास का
श्रवण करो जिसके द्वारा मनुष्य भी किए जाने से देवत्व को प्राप्त कर
लिया करता है । वाग् और ब्रह्माणी प्रमुख हैं जिनमें ऐसी देवियाँ
मातृका पर कीर्तित की गयी हैं उनके प्रयोग किए हुए मन्त्र और सब
व्यञ्जन तथा स्वरों को जो चन्द्र बिन्दु से समन्वित हैं सभी कामनाओं
के प्रदान करने वाले हैं । मातृका मन्त्रों का ऋषि ब्रह्मा ही कहे गए हैं ।
इनका छन्द गायत्री कहा गया है और इनका देवता सरस्वती देवी हैं ।
शरीर बुद्धि मुख्य में और सब कामार्थ साधन में विनियोग सनुदृष्ट
किया गया है जो मन्त्रों की न्यूनता के पूरण करने में होता है । अकार
के समकादि वेग है जो प्रथम कहा गया है । वहाँ पर स्थित चन्द्र बिन्दु
से संयुक्त उन अक्षरों से बाहर आकर का उसी भाँति उच्चारण करके
तथा अंगुष्ठों से नमः, इसको कह करके सबसे प्रथम अंगुष्ठों से मातृका
मन्त्र का न्यास करना चाहिए ।
वे सब चन्द्र बिन्दुओं से युक्त सब ओर से ही करने चाहिए । ह्रस्व
इकार से और दीर्घ ईकारान्त्य ‘क’ वर्ग से पूर्व की ही भाँति जिसमें
स्वाहा अन्त में हो भली भाँति तर्जनियों में निवास करना चाहिए ।
एकार जिसके आदि में हो ऐसा वर्ग को और ऐकारान्त से हुम् को
अनामिकाओं के जोड़े में हे भैरव! नियत रूप से वहाँ पर न्यास करें ।
ओंकार जिसके आदि में हो ऐसे पवर्ग को और अशेष को ओंकार
वाला तथा वौषट् अन्त में लगाकर कार्य की सिद्धि के लिए कनिष्ठका
में न्यास करना चाहिए । अकार जिसके आदि में हो ऐसे यकारादि वर्ग
से और ‘क्ष’ के अन्त वाले से तथा ‘अ’ ‘इ’ अन्त वाले बल को
प्राणियों के पृष्ठों में न्यास करे । शेष भाग में वषट्कार अस्त्र न्यास
करना चाहिए । हृदय आदि छः अंगों में पूर्व की ही भाँति क्रम से न्यास
करे । अंगुष्ठ जिनके आदि में हो ऐसे उक्त वर्गों से क्रम से उसी प्रकार
छहों से करे ।
फिर उसी प्रकार से पाद, जानु, सक्थि, गुह्य और दोनों पाश्र्वों
तथा वस्ती में पूर्व की ही भाँति अक्षरों के द्वारा क्रम से मन्त्रों का न्यास
करना चाहिए । दोनों बाहुओं में, दोनों हाथों में, कटि में, नाभि में,
जठर में, दोनों स्तनों में उसी प्रकार छहों के द्वारा विन्यास का समाचरण
करे । मुख में, चिबुक में गण्ड में, दोनों कानों में, ललाट में, दोनों
आँखों में, कक्ष में, षड्वर्गों में पूर्व की ही भाँति न्यास करना चाहिए ।
रोक कूप में, ब्रह्मरन्ध्र में, गुदा में, दोनों जंघाओं में, नखों में, दोनों
हाथों में और पादों में उसी क्रम से पूर्व की ही भाँति समाचरण करना
चाहिए । इस रीति से जो श्रेष्ठ मनुष्य मातृकाओं का न्यास करता है वह
समस्त यज्ञ पूजाओं में पूत (पवित्र) और योग्य हो जाया करता है ।
इससे परम श्रेष्ठ मन्त्र कहीं पर भी विद्यमान नहीं है । जो सब कामनाओं
का देने वाला, पुण्यमय और चारों वर्गों का प्रदान करने वाला है ।
वाग्देवता का हृदय में ध्यान करके और सब अक्षरों की मूर्तियों का
ध्यान करके तीन बार क्रम युक्त मातृका मन्त्रों से अभिमन्त्रित कर जल
का पान करे ।
वह वाग्मी, पण्डित, श्रीमान् और श्रेष्ठ कवि हो तो जाता है । बुद्ध
पुरुष को चाहिए कि पूर्व में चन्द्र बिन्दु से युक्त स्वरों को पढ़े । इसके
पीछे केवल समस्त व्यञ्जनों को पढ़ना चाहिए । अकार से आदि लेकर
क्षकार के अन्त तक को पूरक श्वासों से पढ़े । जल करतल में लेकर
अक्षरों की संख्या को पढ़कर उस जल को अभिमन्त्रित करके प्रथम
पूरकों के द्वारा पान करे । द्वितीय को कुम्भकों से तथा तृतीय को
रेचकों से करे । इस प्रकार से करके विचक्षण पुरुष जल को पीकर,
वह दृढ़ अंगों वाला, पण्डित और पुत्र-पौत्रों से समन्वित हो जाता है ।
मातृका मन्त्रों से मन्त्रित करके जल को तीनों सन्ध्याओं में पीना चाहिए ।
४२८ 𑁍 श्रीकालिका पुराण 𑁍
वह कवित्व को प्राप्त हो जाता है तथा जो भी कामों को मातृका मन्त्रों
से मन्त्रित करके निरन्तर ऐसा करता है । हे महाभाग! पूरक, कुम्भक,
रेचक से जल का पान करना है वह सभी कामनाओं को प्राप्त करके
पुत्र-पौत्र की समृद्धि वाला हो जाता है ।
वह लोक में महाकवि, बलवान् और सत्यविक्रम वाला तथा सर्वत्र
वल्लभ होकर अन्त में मोक्ष प्राप्त किया करता है । वह राजा, राजपुत्र
और भार्या को मातृका मन्त्र का पान से वश में कर लेता है । न्यास क्रम
में क्रम कहा गया है । यहाँ पर ही वर्ग क्रम कहा गया है । अक्षरों के
जल का पान करे । जो-जो मन्त्र देवों के, ऋषियों के, राक्षसों के हैं वे
सब मन्त्र मातृका तथा देवों से परिपूर्ण है । यह चतुर्वर्गप्रद मातृका मन्त्र
कहा जाता है । हे पुत्र! यह अद्भुत मातृका न्यास तुमको बता दिया है ।
मार्कण्डेय कथन
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-प्रजापति दक्ष की एक पुत्री नाम से
सुरभि हुई थी । वह गोओं की माता थी और वह महाभाग सभी लोकों
के उपकार करने वाली थी । प्रजापति कश्यप से उसके उदर से एक
तनया ने जन्म ग्रहण किया था । नाम से वह रोहिणी थी । वह शुभ्रा
और मनुष्यों के सम्पूर्ण कामनाओं का दोहन करने वाली थी । उसमें
अतीव तपोधन शुनःशेफ मुनि से जिसने जन्म प्राप्त किया था वह
समस्त सुलक्षणों से युक्त कामधेनु, इस नाम से प्रख्यात हुई थी । वह
सितमेघ के सदृश थी और चारों वेदों के चरणों वाली थी । वह अपने
चारों स्तनों के द्वारा धर्म, अर्थ और कामों के प्रसव करने वाली थी ।
सुवर्ण के समान शरीर वाली उस कामधेनु ने जो सती थी, बहुत काल
के होने पर निर्मिल और परम मनोहर यौवन को प्राप्त किया था । मेरु
पर्वत के पृष्ठ भाग पर सञ्चरण करती हुई, चारू स्वरूप वाली, सुन्दर
लक्षणों से समन्वित उसको बेताल ने देखा था और उसका सौन्दर्य
देखकर बेताल के हृदय में कामवासना समुत्पन्न हो गई थी ।
उस कामधेनु ने उस बेताल को कामुक जानकर पशु धर्म से स्वयं
६०८३ श्रीकालिका पुराण ६०८३ ४२९
ही उस चन्द्रशेखर के पुत्र का सेवन किया था। उस भगवान् शंकर के
पुत्र ने उस कामधेनु में परम आनन्द की प्राप्ति की थी और उसने भी
उससे आनन्द को प्राप्त करके बहुत ही हर्षित हुई थी। उन दोनों में सुरत
क्रीड़ा में प्रवृत्त हो जाने पर गर्भ स्थित हो गया था। जब प्रसव काल
मै प्राप्त हुआ तो उस समय में उसने महावृष को प्रसूत किया था। वह
थोड़े ही समय में सुमहान् वृषभ हो गया था। उसके बहुत बड़ा ककुद
था और सुन्दर सींगों से वह युक्त था। उत्क्षेपण करके विचलित दोनों
कानों वाला था और बहुत लम्बी उसकी पूँछ थी। वह ककुद् से, सीगों
से और कानों से सितअभ्र के ही समान था। विचलन करते हुए उस
शृंगों से सिताचल की ही भाँति देवों के द्वारा वह देखा गया था। बेताल
ने उसका नाम शृंग, यही रखा था। यह शृंग बहुत ज्ञानवान् था और
उसने ईश्वर की समाराधना की थी। वह भगवान् शम्भु भी उस पर
परम तुष्ट हो गए थे और उसने अभीष्ट वरदान दिया था।
भगवान् हर ने उसे वृषभ शरीर वाला बनाकर अपना वाहन बना
लिया था। वह बल वाला और चिरायु था तथा पृथ्वी के धारण करने
में समर्थ था। शृंग महान् तेज वाला था और वह प्रभु का केतु भी हो
गया था क्योंकि शृंग होकर वह महान् आत्मा वाले भगवान् शंकर का
प्यारा हो गया था। अतएव शृंग, इस ख्याति को प्राप्त हो गया था।
वह शृंग महादेव के ध्यान में समासक्त हो जाने पर कभी-कभी वरुण
के गृह में गमन किया करता था। वहाँ पर भी सुरभि की जो पुत्रियाँ
थी वे रूप और यौवन से सम्पन्न थी। ये उनके साथ खूबसूरत रूप
धारण करके उनका सेवन किया करता था। वरुण के गृह में सभी
लक्षणों से युक्त सुता उत्पन्न हुई थी। जो बहुत थीं इनकी सूति-प्रसूतियों
से यह जगत् व्याप्त हो रहा है और उनसे यज्ञ प्रवृत्त हुआ करता है।
आज्य से देव सन्तुष्ट हुआ करते हैं और आज्य में ही यज्ञ प्रतिष्ठित होते
हैं। यह सम्पूर्ण स्थावर और जंगम अर्थात् चर अचर जगत् यज्ञाधान
होता है।
वह आज्य गौओं के अधीन है, इससे सभी कुछ गौ में ही स्थित
४३० ६०३ श्रीकालिका पुराण ६०३
रहा करता है । हे द्विजोत्तमोँ! यह सम्पूर्ण विश्व गौओं के ही अधीन रहा
करता है । वे सब गौएँ बेताल के वंश में ही होने वाली हैं और सदा
सबकी प्रिय होती हैं । जो महात्मा बेताल के इस चरित्र का नित्य श्रवण
किया करता है और इनके वंशों से जन्म को सुनता है वह सब सुखी
और बलवान् हुआ करता है । उस पुरुष की न तो गौयें नष्ट होती हैं
और न कभी वैभव ही विनष्ट हुआ करता है । उस पुरुष की न तो गौयें
नष्ट होती हैं और न कभी वैभव ही विनष्ट हुआ करते हैं । उस पुरुष
को भूत पिशाच आदि भी कभी नहीं देखा करते हैं । बेताल स्वयं ही
उनकी निरन्तर रक्षा किया करता है । हे विप्रो! यह मैंने आपको बता
दिया है जिस तरह से बेताल और भैरव! दोनों ने जन्म लिया था और
पुत्रों को जन्म ग्रहण कराया था । अब तो आपके सभी संशय विच्छन्न
हो गये होंगे । जिस तरह से कालिका देवी ने शंकर को मोहित किया
था और जैसे शरीर के अर्ध में उत्पन्न हुई थी और भगवान् शुम्भ ने
जैसे-जैसे किया था, यह सब कह दिया है । जो मनुष्य कालिका के
लिए आपको नमस्कार है, ऐसा स्वयं कहता है उस पुरुष के हाथ में
ही मुक्ति तो स्थित रहा करती है और तीनों का अर्थात् धर्म, अर्थ काम
का वर्ग मुक्ति के ही वश में रहने वाला इनका अनुगामी हुआ करता है ।
इस रीति से परम पुण्यमय कालिका नाम वाला पुराण आपको
वर्णित करके सुना दिया है । जो मन्त्रों से परिपूर्ण हैं, शुद्ध ज्ञान को देने
वाला, कामनाओं का दाता परम श्रेष्ठ है । हे द्विजगणों! यह लोक में
और वेदों में भी परम गोपनीय है । इसके लिए देवगन्धर्व और सिद्ध
आदि सभी सदा स्पृहा किया करते हैं । इस पर उत्तम कालिका नामक
पुराणामृत को महात्मा वसिष्ठ ने मुझसे ही सुना था और अध्ययन
किया था । यह कामरूप सुरालय में भी इसी कारण से गुप्त है ।
हे महर्षिगणों! उसको इस समय में प्रकट करके ही भली भाँति
आख्यात किया है । आप लोग भी इसको नहीं देवें यह सर्वदा लोकों
में गोपन करने योग्य है । जो शठ हो, चञ्चल चित्त वाला हो, नास्तिक
हो, अविजित आत्मा वाला हो, भक्ति और श्रद्धा से रहित हो उसको
ൠ श्रीकालिका पुराण ൠ ४३१
इसे कभी भी नहीं देना चाहिए । जो एक बार भी इस कालिका पुराण
का पाठ करता है वह सभी कामनाओं को प्राप्त करके अमृतत्व अर्थात्
देवत्व को प्राप्त किया करता है । जिससे मन्दिर में यह लिखा हुआ
उत्तम पुराण सदा स्थित रहता है, हे द्विजो! उसको कभी विघ्न नहीं
होता जो पुराण सदा स्थित रहता है, हे द्विजो! उसको कभी विघ्न नहीं
होता । जो प्रतिदिन इसका गोपनीय अध्ययन करता है जे कि यह परम
तन्त्र है । हे द्विज श्रेष्ठों! उसने यहाँ पर ही सम्पूर्ण वेदों क अध्ययन
कर लिया है । इस कारण से इससे अधिक अन्य कुछ भी नहीं है ।
विलक्षण पुरुष इसके अध्ययन से कृतकृत्य हो जाता है ।
इसके अध्ययन तथा श्रवण करने वाला पुरुष परम सुखी तथा
लोक में बलवान् और दीर्घ आयु वाली भी हो जाता है । जो निरन्तर
लोक का पालन करता है और अन्त में विनाश करने वाला है । यह
सम्पूर्ण भ्रम या अभ्रम से युक्त है मेरा ही स्वरूप है, अतएव उसके
लिए नमस्कार है । योगियों के हृदय में जिसका प्रपञ्च प्रधान पुरुष है,
जो पुराणों के अधिपति भगबान् विष्णु और वह भगवान् शिव आप
सबके ऊपर प्रसन्न हों । जो उग्र हेतु है, पुराण पुरुष है, जो शाश्वत तथा
सनातन रूप ईश्वर है, जो पुराणों का करने वाला और वेदों तथा
पुराणों के द्वारा जानने के योग्य है उस पुराण शेष के लिए मैं स्तवन
करता हूँ और अभिवादन करता हूँ । जो इस प्रकार से समस्त जगत् का
विशेष रूप से स्मरण किया करती है, जो मधुरिपु को भी मोह कर देने
वाली हैं, जिसका स्वरूप रमा है और शिवा के स्वरूप से जो भगवान्
शंकर का रमण कराया करती है माया आपके विभव को और शुभों
को वितरित करे ।
॥ श्रीकालिका पुराण समाप्त ॥
४३२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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काली का अर्थ तत्त्व
काली का शाब्दिक अर्थ है-कालः
अर्थात् 'शिवः तस्य पत्नि काली ।'
अथवा 'काली' शिव की पत्नी का नाम है ।
ये काली (भगवती) आदि और अन्त रहित अजन्मा और पूरे चराचर
विश्व की स्वामिनी है । ये काल को उत्पन्न करने वाली तथा स्वयं उसे भी
खा जाने वाली है । साकार-उपासकों और साधकों की सुविधा के लिए तन्त्र
आदि शास्त्रों में इन्हीं का निराकार काली के गुण, ध्यान तथा स्वरूप आदि
का वर्णन है ।
पौराणिक काली (मार्कण्डेय पुराण या दुर्गा सप्तशती में वर्णित) जो
अम्बिका के ललाट से उत्पन्न हुई वह इन आद्या काली से भिन्न हैं । वे श्री
दुर्गा जी के स्वरूपों से एक स्वरूप हैं ।
ॐ 卐 ॐ
काली साधना मन्त्र
क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं दक्षिण कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।
दक्षिण कालिका का यह बाईस अक्षर का मन्त्र सब मन्त्रों में प्रधान माना
गया है । इस मन्त्र के वर्णों का अर्थ इस प्रकार है-
जलरूपी 'ककार' मोक्ष को प्रदान करने वाला है तथा अग्नि रूप 'रेफ'
सर्वतेजोमयी है । 'क्रीं क्रीं क्रीं- ये तीनों बीज सृष्टि, स्थिति एवं लय को
करने वाले हैं ।' 'बिन्दु' निष्कल ब्रह्मरूप है, अतः कैवल्य फल को देने
वाला है । हूं हूं- ये दोनों बीज शब्दज्ञान को देने वाले हैं । ह्रीं ह्रीं- ये
दोनों बीज सृष्टि, स्थिति एवं लय को करने वाले हैं। 'दक्षिण कालिके'-इस
सम्बोधन से देवी का सामीप्य प्राप्त होता है तथा 'स्वाहा'-यह मन्त्र संसार
का मातृ स्वरूप है तथा समस्त पापों को क्षय करने वाला है ।
ॐ 卐 ॐ
௵ श्रीकालिका पुराण ௵ ४३३
काली साधना मन्त्र
भद्रकाली-मन्त्र
अब भद्रकाली के मन्त्र का वर्णन किया जाता है । वह इस प्रकार है-
क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं भद्रकाल्यै क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।
यह बीस वर्ण वाला भद्रकाली का मन्त्र साधक को चतुर्वर्ग फल प्रदान
करता है ।
卐 ॐ 卐
श्मशान काली-मन्त्र
इस श्मशान काली के मन्त्र का वर्णन किया जाता है । वह इस प्रकार
है-
क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं श्मशान काली क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।
इस इक्कीस अक्षर के मन्त्र से श्मशान काली की पूजा करनी चाहिए ।
यह भी चतुर्वर्गदायक है ।
卐 ॐ 卐
महाकाली-मन्त्र
अब महाकाली के मन्त्र का वर्णन किया जाता है । वह इस प्रकार है-
क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं महाकाली क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।
इस बीस अक्षर के मन्त्र द्वारा महाकाली का पूजन करना चाहिए । यह
भी चतुर्वर्गफलदायक है ।
卐 ॐ 卐
काली गायत्री मन्त्र
ॐ कालिकायै विद्महे श्मशानवासिन्यै धीमहि तन्नो घोरे प्रचोदयात् ।
४३४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
पूजन विधि-इन देवियों में पूजन में यह विशेषता है कि यन्त्र के भूपुर
में इन्द्रादि दिक्पाल तथा वज्रादि अस्त्रं, भूपुर के चतुर्द्वार में विष्णु, शिव, सूर्य
और गणेश; भूगृह में लोकपाल, बाह्य में देवी के अस्त्र तथा भूपुर के चारों
ओर पूर्वादि क्रम से विष्णु, शिव, सूर्य और गणेश का पूजन करना चाहिए ।
इसी प्रकार यन्त्र में ही गुह्यकाली, भद्रकाली, श्मशान काली-इन चारों
देवियों का पूजन करना चाहिए । इनका यन्त्र सम्बन्धी कोई भेद नहीं है ।
सबके यन्त्र एक समान हैं । इनके यन्त्र का स्वरूप नीचे बताया गया है ।
यन्त्र का स्वरूप-उक्त चारों देवियों में यन्त्र को अंकित करने की
विधि यह है कि पहले त्रिकोण, फिर षट्कोण तथा नवकोण अंकित करके
उसके बाहर तीन वृत्त तथा केशर सहित अष्टदल पद्म अंकित करे । फिर
तीन भूपुर वाला एक चुरस्त्रद्वार संयुक्त योनि मण्डल का स्वरूप अंकित
करना चाहिए । यह 'त्रिपञ्चार यन्त्र' सब यन्त्रों से प्रसिद्ध हैं ।
卐 ॐ 卐
गुह्य काली के मन्त्र
अब 'गुह्यकाली' के मन्त्र तथा पूजा-प्रणाली का वर्णन किया जाता है ।
यह महाविद्या त्रिभुवन में अत्यन्त दुर्लभ तथा धर्मार्थ काम मोक्ष को देने
वाली, महापापों को नष्ट करने वाली, समस्त सिद्धियों की प्रदाता, सनातनी
तथा भोग को देने वाली प्रसिद्ध है ।
क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं गुह्ये कालिके क्रीं क्रीं क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।
नाम-भेद से यह मन्त्र गुह्यकाली तथा दक्षिणा काली दोनों की ही
आराधना में प्रयुक्त होता है । यह मन्त्र समस्त सिद्धियों को देने वाला है ।
गुह्यकाली के अन्य मन्त्र इस प्रकार हैं-
क्रीं हूं ह्रीं गुह्य कालिके क्रीं हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।
इस षोडशाक्षर मन्त्र द्वारा आराधना करने पर साधक को चतुर्वर्ग की
प्राप्ति होती है ।
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४३५
क्रीं हूं ह्रीं गुह्ये कालिके हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।
यह चतुर्दशाक्षर मन्त्र सब तन्त्रों में गुप्त है । इस मन्त्र में 'गुह्ये' के स्थान
पर 'दक्षिणे' पद जोड़ने से पंचदशाक्षरी दक्षिण कालिका का मन्त्र होता है ।
यथा-
क्रीं हूं ह्रीं दक्षिणे कालिके हूं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।
गुह्यकाली का चतुर्दशाक्षर मन्त्र इस प्रकार है-
हूं ह्रीं गुह्ये कालिके क्रीं क्रीं हूं ह्रीं ह्रीं स्वाहा ।
गुह्य काली का नवाक्षर मन्त्र इस प्रकार है-
क्रीं गुह्ये कालिके क्रीं स्वाहा ।
इसी मन्त्र में 'गुह्ये' के स्थान पर दक्षिणे शब्द जोड़ने पर दक्षिणा
कालिका का दशाक्षर मन्त्र बनता है । यथा-
क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं स्वाहा ।
इस सब मन्त्रों की साधना में दक्षिण कालिका की पूजा-पद्धति में लिखे
नियमानुसार न्यासादि करके पूजा तथा बलि करनी चाहिए । इसके बलिदान
में यह विशेषता है कि पूर्व नियमानुसार बलि उत्सर्ग करके निम्नलिखित मन्त्र
द्वारा बलि को निवेदित करना चाहिए ।
ऐं ह्रीं ऐह्येहि जगन्मातर्जगतां जननि गृहण बलिं सिद्धिं देहि देहि
शत्रु क्षयं कुरु कुरु हूं हूं ह्रीं ह्रीं फट् ॐ कालिकायै नमः फट् स्वाहा ।
यदि गुह्यकाली के लिए बलि निवेदित करनी हो तो इस मन्त्र का
उच्चारण करना चाहिए-
ऐह्येहि गुह्य कालिके मम बलिं गृह् गृह् मम शत्रुन नाशय नाशय
खादय स्फुर स्फुर छिन्धि छिन्धि सिद्धिं देहि हूं फट् स्वाहा ।
आसन का मन्त्र भी अन्य प्रकार से है । यथा-
ॐ सदाशिव महाप्रेताय गुह्य कल्पासनाय नमः ।
यहाँ पृष्ठ पर मुद्रित पाठ का लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
४३६ ൠ श्रीकालिका पुराणे ൠ
श्रीकाली क्षमापराधस्तोत्रम्
प्राग्देहस्थो यदाऽहं तव चरणयुंग नाशितो नार्च्चितोऽहं ।
तेनाद्या कीर्त्तिवर्गैर्जठरजदहने वर्द्ध्यमानो बलिष्ठैः ॥
क्षिप्त्वा जन्मान्तरान्नः पुनरिह भविता क्वाश्रयः क्वापि सेवा ।
क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥
बाल्ये बालाभिलाषैर्जडित-जडमतिर्बाललीलाप्रसक्तो ।
न त्वां जानामि मातः कलिकलुषहरां भोगमोक्षप्रदात्रीम् ॥
नाचारो नैव पूजा न च यजनकथा न स्मृतिर्नैव सेवा ।
क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥
प्राप्तोऽहं यौवनञ्चेद्विषधरसदृशैरिन्द्रियैर्दष्टगात्रो ।
नष्टप्रज्ञः परस्त्रीपरधनहरणे सर्व्वदा साभिलाषः ॥
त्वत्पादाम्भोजयुग्मं क्षणमपि मनसा न स्मृतोऽहं कदापि ।
क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥
प्रौढो भिक्षाभिलाषी सुतदुहितुकलत्रार्थमन्नादिचेष्टाः ।
क्व प्राप्स्ये कुत्र यामीत्यनुदिनमनिशञ्चिन्तया मग्नदेहः ॥
नो ते ध्यानं न चास्था न च भजनविधिर्नामसंकीर्त्तनं वा ।
क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥
वृद्धत्वे बुद्धिहीनः कृशविवशतनुश्श्वासकासातिसारैः ।
कर्म्मानर्होऽक्षिहीनः प्रगलितदशनः क्षुत्पिासाभिभूतः ॥
पश्चात्तापेन दग्धो मरणमनुदिनन्ध्येयमात्रन्नचान्यत् ।
क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥
कृत्वा स्नानं दिनादौ क्वचिदपि सलिलं नो कृतं नैव पुष्पं ।
ते नैवेद्यादिकञ्च क्वचिदपि न कृतं नापि भावो न भक्तिः ॥
न न्यासो नैव पूजा न च गुण कथनं नापि चाऽर्च्चा कृता ते ।
क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥
जानामि त्वां न चाहं भवभयहरणीं सर्व्वसिद्धिप्रदात्रीं ।
नित्यानन्दोदयाढ्यान्त्रितयगुणमयीं नित्यशुद्धोदयाढ्याम् ॥
मिथ्या कर्म्माभिलाषैरनुदिनमभितः पीडितो दुःखसङ्घैः ।
क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥
कालाभ्रां श्यामलाङ्गीं विगलितचिकुरां खड्गमुण्डाभिरामां ।
त्रास्त्राणेष्टदात्रीम् कुणपगणशिरो मालिनीं दीर्घनेत्राम् ॥
संसारस्यैकसारं भवजननहरां भावितो भावनाभिः ।
क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटितवदने कामरूपे कराले ॥
ब्रह्माविष्णुस्तथेशः परिणमति सदा त्वत्पदाम्भोजयुग्मम् ।
भाग्याभावान्न चाहम्भवजननि भवतपादयुग्मं भजामि ॥