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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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४२६ श्रीकालिका पुराण
बताऊँ। जिसकी योनि के शिलाबल से आयोग से लौह आदि धातुयें
सुवर्ण हो जाया करती हैं। जो मानव इसके मण्डल में स्नान करके और
एक बार भी प्रदक्षिणा करता है वह परम निर्वाण को प्राप्त किया
करता है ।
मातृका न्यास वर्णन
श्री भगवान् ने कहा-हे वेताल भैरव! अब तुम मातृका न्यास का
श्रवण करो जिसके द्वारा मनुष्य भी किए जाने से देवत्व को प्राप्त कर
लिया करता है । वाग् और ब्रह्माणी प्रमुख हैं जिनमें ऐसी देवियाँ
मातृका पर कीर्तित की गयी हैं उनके प्रयोग किए हुए मन्त्र और सब
व्यञ्जन तथा स्वरों को जो चन्द्र बिन्दु से समन्वित हैं सभी कामनाओं
के प्रदान करने वाले हैं । मातृका मन्त्रों का ऋषि ब्रह्मा ही कहे गए हैं ।
इनका छन्द गायत्री कहा गया है और इनका देवता सरस्वती देवी हैं ।
शरीर बुद्धि मुख्य में और सब कामार्थ साधन में विनियोग सनुदृष्ट
किया गया है जो मन्त्रों की न्यूनता के पूरण करने में होता है । अकार
के समकादि वेग है जो प्रथम कहा गया है । वहाँ पर स्थित चन्द्र बिन्दु
से संयुक्त उन अक्षरों से बाहर आकर का उसी भाँति उच्चारण करके
तथा अंगुष्ठों से नमः, इसको कह करके सबसे प्रथम अंगुष्ठों से मातृका
मन्त्र का न्यास करना चाहिए ।
वे सब चन्द्र बिन्दुओं से युक्त सब ओर से ही करने चाहिए । ह्रस्व
इकार से और दीर्घ ईकारान्त्य ‘क’ वर्ग से पूर्व की ही भाँति जिसमें
स्वाहा अन्त में हो भली भाँति तर्जनियों में निवास करना चाहिए ।
एकार जिसके आदि में हो ऐसा वर्ग को और ऐकारान्त से हुम् को
अनामिकाओं के जोड़े में हे भैरव! नियत रूप से वहाँ पर न्यास करें ।
ओंकार जिसके आदि में हो ऐसे पवर्ग को और अशेष को ओंकार
वाला तथा वौषट् अन्त में लगाकर कार्य की सिद्धि के लिए कनिष्ठका
में न्यास करना चाहिए । अकार जिसके आदि में हो ऐसे यकारादि वर्ग
से और ‘क्ष’ के अन्त वाले से तथा ‘अ’ ‘इ’ अन्त वाले बल को