कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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वह कवित्व को प्राप्त हो जाता है तथा जो भी कामों को मातृका मन्त्रों
से मन्त्रित करके निरन्तर ऐसा करता है । हे महाभाग! पूरक, कुम्भक,
रेचक से जल का पान करना है वह सभी कामनाओं को प्राप्त करके
पुत्र-पौत्र की समृद्धि वाला हो जाता है ।
वह लोक में महाकवि, बलवान् और सत्यविक्रम वाला तथा सर्वत्र
वल्लभ होकर अन्त में मोक्ष प्राप्त किया करता है । वह राजा, राजपुत्र
और भार्या को मातृका मन्त्र का पान से वश में कर लेता है । न्यास क्रम
में क्रम कहा गया है । यहाँ पर ही वर्ग क्रम कहा गया है । अक्षरों के
जल का पान करे । जो-जो मन्त्र देवों के, ऋषियों के, राक्षसों के हैं वे
सब मन्त्र मातृका तथा देवों से परिपूर्ण है । यह चतुर्वर्गप्रद मातृका मन्त्र
कहा जाता है । हे पुत्र! यह अद्भुत मातृका न्यास तुमको बता दिया है ।
मार्कण्डेय कथन
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-प्रजापति दक्ष की एक पुत्री नाम से
सुरभि हुई थी । वह गोओं की माता थी और वह महाभाग सभी लोकों
के उपकार करने वाली थी । प्रजापति कश्यप से उसके उदर से एक
तनया ने जन्म ग्रहण किया था । नाम से वह रोहिणी थी । वह शुभ्रा
और मनुष्यों के सम्पूर्ण कामनाओं का दोहन करने वाली थी । उसमें
अतीव तपोधन शुनःशेफ मुनि से जिसने जन्म प्राप्त किया था वह
समस्त सुलक्षणों से युक्त कामधेनु, इस नाम से प्रख्यात हुई थी । वह
सितमेघ के सदृश थी और चारों वेदों के चरणों वाली थी । वह अपने
चारों स्तनों के द्वारा धर्म, अर्थ और कामों के प्रसव करने वाली थी ।
सुवर्ण के समान शरीर वाली उस कामधेनु ने जो सती थी, बहुत काल
के होने पर निर्मिल और परम मनोहर यौवन को प्राप्त किया था । मेरु
पर्वत के पृष्ठ भाग पर सञ्चरण करती हुई, चारू स्वरूप वाली, सुन्दर
लक्षणों से समन्वित उसको बेताल ने देखा था और उसका सौन्दर्य
देखकर बेताल के हृदय में कामवासना समुत्पन्न हो गई थी ।
उस कामधेनु ने उस बेताल को कामुक जानकर पशु धर्म से स्वयं