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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 188 of 442

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Page 188

१९० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
अधिक बलवान थे। श्वान, वाराह, उष्ट्र के रूप वाले, प्लव, गोमायु
और गौ के मुख से संयुत, रीछ, मातंग, मार्जार और शिशुमार के
स्वरूप वाले कुछ सिंह और व्याघ्र के मुख वाले और कुछ सर्प और
भूकक के समान मुख वाले थे, हंस की सी ग्रीवा से युक्त हय के समान
वाले तथा दूसरे महिष के समान आकृति वाले थे।
दूसरे मनुष्य के समान आकार वाले थे और फिर मृग तथा मेघ के
सदृश मुख से समन्वित थे। कुछ केवल कबन्ध ही थे जिनके मुख नहीं
थे। कुछ बिना हाथों वाले और कुछ बहुत हाथों से युक्त थे। उनके
कुछ शरभ के सदृश आकारवाले थे और दूसरे कृकलास के जैसे मुख
से संयुत थे। कुछ मत्स्य के सदृश मुख से युक्त थे और कुछ ग्राह के
से मुख वाले थे, कुछ बहुत छोटे, कुछ बहुत बड़े बल वाले तथा कुछ
कृश थे। कुछ ऐसे थे जिनके चार पैर थे, कुछ आठ पैरों से युक्त और
कुछ तीन एवं दो पैरों वाले थे। कुछ एक ही पैर वाले थे और कुछ
बहुत अधिक हाथों से संयुक्त थे। कुछ यक्ष तथा किंपुरुषों के समान
थे। कुछ पशुओं के समान आकार वाले थे तो कुछ पंखों से संयुत थे।
कुछ लम्बे उदर वाले थे तो कुछ महान उदर से संयुक्त थे। कुछ ऐसे
थे जिनके उदर दीर्घ थे तथा स्थूल केशों से समन्वित एवं कुछ बहुत
कानों वाले तथा कुछ बिना ही कानों वाले थे। कुछ उनमें ऐसे थे
जिनके स्थूल अधर थे तो कुछ बिना ही कानों वाले थे। कुछ उनमें ऐसे
थे जिनके स्थूल अधर थे तो कुछ दीर्घ दाँतों से समन्वित थे और दूसरे
बड़ी लम्बीदाढ़ी मूँदों वाले थे। हे विप्रो! सभी ओर चौदह भुवनों में जो
प्राणधारी थे वे उनके रूप की समानता को प्राप्त हुए थे। इस भुवन
में कोई भी जन्तु अथवा स्थावर या जंगम नहीं था जिनके समान रूप
से भगवान् शंकर के गण उत्पन्न न हुए हों। वे सब भिन्दिपाल, खग,
परिघ और तोमरों से समन्वित थे।
शकुल, आस और गदाओं से, पाशों से खट्वांग से, त्रिशूलों से,
कपालों से, शक्तियों से, दोत्रों से, क्षुणियों से, ईषाग्रों से, यष्टियों से,
त्रिकण्टकों से, पाशों से, परशुओं से, बाणों से और कोणदण्डों से