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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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ൠ श्रीकालिका पुराण ൠ १८९
स्मरण किया था। उनके द्वारा स्मरण किए हुए वाराह ने सखा वाराह
के हित में भगवान् नृसिंह समागत हुए थे। उस अवसर पर आए हुए
उन भगवान् नृसिंह का वीक्षण करके उनके कामों को अपने ही तेज में
ले लिया था। वाराहों के साथ शरभ ने देखा था कि वह तेज सबके
तुल्य विष्णु भगवान् के अन्दर प्रवेश कर गया था। तेज से रहित
भगवान् नृसिंह का ज्ञान प्राप्त करके वाराह ने निःश्वासों के समूह को
छोड़ा था अर्थात् वे बहुत कुछ निःश्वास लेने लग गये थे। फिर तो
बहुत से वाराह समुद्भूत हो गये थे जिनका बहुत बड़ा आकार था और
अद्भुत एवं तीक्ष्ण दाढ़ों वाले थे। वे वाराह शरभगिरीश मायाधारी
और भय रहित होते हुए पीड़ित करने वाले थे। उस समय में भी नृसिंह
भगवान् के साथ युद्ध किया था और बहुत अधिक गिरीश का मर्दन
किया था। एक क्षण में तो पक्षियों के समान स्वरूप वाले थे और क्षण
में गौएं, तुरंग और मनुष्य हो जाते थे। एक ही क्षण में नृसिंह वाराह
के रूप वाले थे और वे किसी क्षण में गोमायु (शृंगाल) और
वैकृतिक अर्थात् बिगड़े हुए हो जाते थे। उस युद्ध में वाराहों में अनेक
भाँति के महाभयंकर स्वरूप वितन्यमान किए थे।
उस अवसर पर भर्ग को उनके द्वारा निपीडित देखकर उन गिरिश
के समीप में भगवान् माधव आ गये थे। भगवान् विष्णु ने अपने कर
कमल से गिरीश का स्पर्श किया था और फिर उसने अपना तेज पुनः
उनमें निर्धारित कर दिया। इसके अनन्तर प्रभाविष्णु भगवान् विष्णु के
कर से स्पर्श होते हुए ही वह अत्यधिक प्रसन्न हृष्ट और बलवान हो
गये थे। इसके अनन्तर शरभ में बहुत ऊँचा, बलवान और दृढ़नाद
(गर्जन की ध्वनि) किया था जिससे ये चौदह भुवन भर गए थे अर्थात्
चौदह भुवनों में फैलकर पहुँच गया था। इस रीति से नाद करने वाले
उसके मुख से जो भी सीकर अर्थात् जल के कण निकले थे उनसे
महान शरीरों से धारण करने वाले तथा विशाल ओज से समन्वित
समुत्पन्न हो गये। जिस प्रकार से वाराह के निःश्वास से नाना रूपों को
धारण करने वाले गुण हुए थे। ये वैसे ही वाराह थे प्रत्युत उनसे भी