कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १९१
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महान भीषण थे। सभी महान बल वाले और जटा और चन्द्रकाल से
युक्त थे। कुछ मार्ग के रूप से, वाहन से और भूषणों तुल्य जटा,
अर्धचन्द्र और शुभ्रांशु और शुभ्रशीर्ष वाले महा बलवान थे। उनमें कुछ
अर्धनारीश्वर थे और कुछ ऐसे ही थे जैसे रुद्रदेव ही होंवे। कुछ तो
अपने सुन्दर रूप से तथा मोहने वाले स्वरूप से कामदेव के तुल्य थे
जो वनिताओं के समुदाय के साथ रति करने में समुत्सुक थे। सभी
आकाश में चरण करने वाले थे और सभी स्वतन्त्रता से गमन करने
वाले थे। उनमें कुछ नीलकमल के सदृश श्याम वर्ण वाले थे तो कुछ
शुक्ल और लोहित थे। कुछ रक्त, पीत तथा विचित्र वर्ण से संयुत
और दूसरे हरि एवं कपिल थे। कुछ आधे पीत, आधे रक्त, आधे भाग
में नील और दूसरे धवल थे।
कुछ कृष्ण और पीत वर्ण से युक्त थे तथा कपितय अर्द्धकृष्ण
और शुक्ल वर्ण से रञ्जित थे। एक ही वर्ण वाले, कतिपय दो वर्णों
से संयुत तथा दूसरे तीन वर्णों से समन्वित थे। कुछ चार पाँच और छः
वर्णों से युक्त थे और हे द्विजो! कुछ दश गुणों वाले थे। सभी गज
वादन करने वाले थे जिनमें कुछ डिण्डिम, पट्टह, शंख, भेरी,
आनक, सकहल, गोमुख, मण्डूक, झर्झर, झर्झरी, समर्द्दल, वीणा,
तन्त्री, पञ्चतन्त्री, शकर और दर्दर, कुण्ड, सतालकर तलिकाओं को
वादन करते हुए सभी गण बार-बार हँसने वाले थे। वे सब वाराह की
ओर मुख वाले होते हुए स्थित हो गये थे। उन सबसे वृषभध्वज
भगवान शरभ ने कहा। इन वाराह के गणों का विहनन कर दो। ये
निश्चय ही अपने क्रूर कर्मों द्वारा, क्रूर दृष्टि से, क्रूर युद्धों के द्वारा
क्रूर होकर महान बल वाले थे। इसके अनन्तर वे सब गण अनेक
आकार वाले और नाना श्रेष्ठ आयुधों से समन्वित थे। उन क्रूर
दिखलाई देने वालों ने वाराह के गणों के साथ युद्ध किया था।
ये सभी आकाश में सञ्चरण करने वाले थे उन्होंने जल से पूर्ण
तीनों जगतों का परित्याग करके दोनों पक्ष के गण आकाश में ही युद्ध
कर रहे थे। इसके पश्चात भगवान हर के प्रमथों ने वाराह के गणों को