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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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नदियों को और कल्प द्रुमों को भग्न कर दिया था। जगत के भरण
करने वाले वाराह ने स्वयं ही जगत् की पीड़ा को जानते हुए भी सुतों
के स्नेह से उनका निवारण नहीं किया था। सुवृत्त कनक और घोर जब
दिव्यलोक में आगमन करते हैं उस अवसर पर देवों का समुदाय
परमभीत होकर दशों दिशाओं में भाग जाया करते हैं। इस प्रकार से
अपने पुत्रों के तथा भार्या के साथ जो यज्ञ पौत्री था वह क्रीड़ा करता
हुआ भी किसी भी समय में कोई तुष्टि के प्राप्त करने वाले नहीं हुए
थे अर्थात् उनको सन्तोष नहीं हुआ था। नित्य-नित्य ही उनकी कामवासना
बढ़ती ही जाती है और ऐसा प्रदिष्ट हो गये थे कि वह अपने शरीर का
त्याग करने की इच्छा नहीं किया करते हैं।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर सब देवगणों ने देव
योनियों के साथ और रुद्रदेव के सहित मिलकर भली-भाँति जगत के
हित के लिए सलाह ही थी। फिर मुनियों के साथ शक्र (इन्द्र) आदि
उन सबने निश्चय करके शरण्य, विभु, अज भगवान नारायण की
शरणागति में गये थे। उन गोविन्द, वासुदेव जगत के स्वामी के समीप
में पहुँचकर सब देवों को प्रणाम किया था और फिर भगवान
गरुड़ध्वज का स्तवन किया था। देवों ने कहा-हे देवेश्वर! हे देव! हे
जगत के कारण को करने वाले! हे काल के रूप वाले! हे प्रधान और
पुरुष के स्वरूप वाले! हे भगवान्! आपकी सेवा में हमारा सबका
प्रणिपात समर्पित है। हे स्थूल और सूक्ष्म! हे जगत व्याप्त रहने वाले!
हे परेश! हे पुरुषोत्तम! आप ही समस्त प्राणियों के कर्ता हैं अर्थात्
सबका सृजन आप ही के द्वारा हुआ करता है और वही सबका पालन
करने वाले रक्षक हैं तथा आप ही सबका विनाश करने वाले हैं। आप
अपनी माया के स्वरूप के द्वारा इस जगत को सम्मोहित किया करते
हैं। जो भी कुछ हो गया है, जो इस समय में हो रहा है और जो
भविष्य में होनेवाला है। हे परमेश! वह सब स्थावर हो या जंगम हो
आप ही हैं। आप अर्थ के अर्थियों के अर्थ हैं तथा आप जो भी काम
के इच्छुक हैं उनके काम हैं।