कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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आप धर्म के चाहने वालों के लिए धर्म हैं और जो निर्वाण पद
के चाहने वाले हैं आप ही मोक्ष हैं, आप कामुक हैं, आप ही अर्थ हैं
और आप ही सदा गति धार्मिक हैं। आपके मुख से ब्राह्मण समुत्पन्न
हुए हैं और आपकी बाहुओं से क्षत्रियों ने जन्म ग्रहण किया था, आपके
ऊरुओं से वैश्यों की उत्पत्ति हुई है तथा आपके चरणों से शूद्र निकले
हैं अर्थात् आप ही के भिन्न-भिन्न अंगों से चारों वर्णों का समुत्पादन
हुआ है। हे विभो! सूर्यदेव आपके नेत्रों से समुत्पन्न हुए हैं तथा चन्द्रमा
आपके मन से जायमान हुआ है। आपके काम से वायु की उत्पत्ति हुई
है तथा दूसरे दश प्राण भी आप ही से हुए हैं। वायु के प्राण अपान
आदि दश स्वरूप होते हैं। ऊपर की ओर जो स्वर्ग आदि भुवन हैं
वे सब आपके मस्तक से ही उत्पन्न हुए हैं। आपकी नाभि से आकाश
ने जन्म लिया है तथा आपके पाद तल से पृथ्वी समुद्भव हुई है।
आपके कानों से सब दिशायें उत्पन्न हुई हैं आपके जठर (उदर) से यह
सम्पूर्ण जगत प्रादुर्भूत हुआ है। आप ही माया के स्वरूप से निश्चय
ही जगत को सम्मोहित किया करते हैं। आप गुणों से रहित होते हुए
भी गुण गण से समन्वित हैं आप परम शुद्ध, एक और पर से भी पर
हैं। आप उत्पत्ति और स्थिति से रहित हैं और आप अच्युत अर्थात्
क्षीण न होने वाले गुणों से अधिक हैं। हे जगत के स्वामिन! आप ही
आदित्यों के द्वारा, वसुओं के द्वारा, देवों के, सतियों के, पक्षों के
मरुद्गणों के द्वारा मुनियों के द्वारा और मुमुक्षुओं के द्वारा चिन्तन किये
जाया करते हैं अर्थात् सभी के चिन्तन करने का विषय केवल आप ही
होते हैं।
विशेष विज्ञानवाले विगत भोग से संयुत मुनिगण चित्त (ज्ञान)
और आनन्द से परिपूर्ण आप को ही समझते अर्थात जानते हैं। आप
ही इस संसार रूपी वृक्ष के बीज हैं, जल हैं, स्थान हैं और फल हैं।
आप पद्मा से पद्माकर विभात होते हैं। आप वरदान, खड्ग, चक्र,
कमल और धनुष के धारण करने वाले हैं। आप ही नित्य तार्क्ष्य
प्रतिभाव होते हैं। जिस प्रकार से स्वर्णाचल पर जल से समन्वित शब्द