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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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के साथ रमण करने लगा गये थे जो कि परमसुन्दर स्वरूप वाली पृथ्वी
थी। वह उस उत्तम पर्वत में बहुत लम्बे समय तक रमण करते हुए वह
लोकेशपौत्री और परमाधिक कामुक तोष को प्राप्त नहीं हुए थे अर्थात्
रमण करने पर भी उनको संतोष नहीं हुआ था। पौत्री के स्वरूप वाली
पृथ्वी के साथ रमण किए जाने वाले से तीन पुत्र समुत्पन्न हुए थे। हे
द्विजोत्तमो! आप अब उनके नामों को भी श्रवण करिए। वे सुवृत्त,
कनक और घोर नामों वाले थे जो कि सभी महान बल से समन्वित थे।
वे शिशु ही सुवर्ण के मेरु पर्वत के पृष्ठ पर व प्रस्तर में, गह्वरों में और
सरोवरों में परस्पर में संसक्त हुए रमण करते थे।
हे द्विजो! वह वाराह उन पुत्रों से परिवृत्त अपनी भार्या के साथ
रमण करने वाले थे और उस समय में उन्होंने शरीर के त्याग करने का
कुछ भी ध्यान नहीं किया था। किसी समय में महान बलवान् वह
कर्दमों के अन्तर में शिशुओं के साथ संश्लिष्ट होकर भार्या के साथ
कर्दम क्रीड़ा किया करता था। कीच के लेप से संयुत मधु पिंगल वराह
शोभित हुए थे। जिस प्रकार से सन्ध्या का मेघ जल का क्षरण किया
करता है उसी भाँति वह भी जल का क्षरण करने वाले थे। वह पुत्रों
के सहित और पृथ्वी भार्या के साथ परम प्रीत और वह मध्य में निम्न
हो गये थे। सुवृत्त ने और घोर तथा कनक ने सुवर्ण के व प्रपोत्र पातों
से विदारित कर दिया था। मेरु पर्वत के पृष्ठ भाग पर सुरों के द्वारा
जो भी सुवर्ण द्वारा रचित हुए थे उसके पुत्रों ने यत्नपूर्वक उनको भग्न
कर दिया था।
मानस आदि तो देवों के सरोवर थे उस समय में उसके पुत्रों ने
अर्थात् शिशुओं के पौत्र धात्रों से सब ओर आविल अर्थात् यतिन कर
दिए थे। वनिता के स्वरूप वाली पृथ्वी ने पौत्रिण से रमण किया था
और स्थावर रूप से सुदृढ़ सुख को प्राप्त किया करती हैं। सुवृत्त आदि
के द्वारा सभी ओर सागरों का अवगाहन करके पत्रौद्य्यों के द्वारा विकीर्ण
रत्न वाले सब ही आकुलकृत हो गये थे। उस समय में इधर-उधर
क्रीड़ा करने वाले पौत्री शिशुओं के द्वारा वहाँ पर जगतों को तथा