कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १७९
के शरीर को त्याग दीजिए। यह जगत से परिपूर्ण, जगत् के रूप वाले
और जगत के कारणों का भी कारण है। हे विभो! आपके वाराह के
शरीर को धारण करने में अन्य कौन समर्थ हो सकता है ? विशेष रूप
से आपके द्वारा ही यह सकाम पृथ्वी जल में घर्षित हुई है। यह स्त्री
के रूप वाली ने आपके तेजों से दारुण गर्भ को धारण किया था। हे
जगतपते! रजस्वला इसमें समर्थ होती हुई जिसने गर्भ को धारण किया
था। उससे जो समय होने वाला है यह भी दुर्यश का आदान करेगा।
यह असुरों के भाव को प्राप्त करते ही देवों और गन्धर्वों की हिंसा
करने वाला होगा। यह लोकेश ने मुझसे दक्ष की सन्निधि में कहा था।
मालिन के साथ रति से समुत्पन्न यह आपका अनिष्ट करने वाला दुष्ट
है। हे लोकेश! इस वाराह के कामुक स्वरूप का आप त्याग कर
दीजिए। आप ही लोकों के भावन करने वाले हैं और सृष्टि, स्थिति
और संहार के करने वाले हैं। हे महाबलवान आप लोकों के हित के
सम्पादन करने के लिए इस शरीर को त्याग करके पुनः समय के
सम्प्राप्त होने पर अन्य काम को पौत्र करेंगे। मार्कण्डेय महर्षि ने
कहा-महान् आत्मा वाले भगवान् शंकर के इस वचन का श्रवण करके
वाराह की मूर्ति को धारण करने वाले भगवान ने महादेव जी से कहा।
श्री भगवान ने कहा-हे परमेश्वर! जैसा आप कर रहे हैं उस वचन का
मैं पूर्णतया पालन करूँगा और इस यज्ञ वाराह के शरीर का मैं त्याग
कर दूँगा। उसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है। समय के प्राप्त हो जाने
पर फिर अन्य उत्तम वाराह के रूप को धारण करूँगा जो अत्यन्त
दुराधर्ष है और लोकों के पावन करने के लिए हैं।
इतना कहकर महान कार्य वाले वे वहाँ पर ही अन्तर्धान हो गए
थे जो इस जगत के गुरु हैं और इस जगत के सृजन करने वाले हैं जो
जगत् के धाता हैं और जगत् के स्वामी हैं। उन देव के अन्तर्धान हो
जाने पर देवों के देव महेश्वर प्रभु देवगणों के तथा अपने गणों के साथ
ही अपने स्थान को गमन कर गये थे। भगवान वाराह भी लोकालोक
नामक पर्वत पर स्वयं चले गये थे और वहाँ पर वे अपनी पत्नी वाराही