कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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कर लिया था। रूप तन्मात्रा के ग्रहण किये जाने पर सम्पूर्ण तेज
विनष्ट हो गये थे और अनादित वायु प्रबल हो गया था। इसके अनन्तर
वायु महान शब्द वाले को प्राप्त करके अग्नि की भाँति प्रज्वलित होते
हुए रुद्रदेव संक्षुब्ध हो गये थे और उस समय में आकाश को गया था।
उससे संक्षुब्ध आकाश की वायु ने ग्रहण कर लिया था। उसके
अन्दररूप की तन्मात्रा को लेकर फिर वायु भी नष्ट हो गया था। वायु
के नष्ट हो जाने पर यह रुद्रदेव उस समय ब्रह्मा के शरीर में प्रवेश कर
गये थे। उस अवसर पर ब्रह्मशरीर आकुल, निराधार और निराकुल
हो गया था फिर शंख, चक्र और गदा के धारण करने वाले भगवान
विष्णु के शरीर में उसने प्रवेश किया था। इसके उपरान्त महान् तेजस्वी
भगवान कृष्ण ने अपना पञ्च भौतिक शरीर जो अच्युत और शंख, चक्र
तथा गदा धारण करने वाला था सबसे सार का आदान करके अपनी
शक्ति के द्वारा शीघ्र ही त्याग दिया था। जो बिना आधार वाला तथा
आकार से रहित, निःसत्त और निरवह था। जो आनन्द से परिपूर्ण, अद्वैत,
द्वैत से हीन और बिना विशेषण वाला था उसका त्याग कर दिया था।
जो न तो स्थूल और न सूक्ष्म ही है जिसका ज्ञान नित्य एवं
निरञ्जन है। वह एक ही परब्रह्म है जो सभी ओर से अपने द्वारा ही
प्रकाश वाला है। जो न तो दिन है और न रात्रि ही है। न आकाश है
और पृथ्वी है। वह तप भी नहीं था और अन्य ज्योति भी नहीं था।
श्रोत्रादि और बुद्धि आदि से उपलब्ध एक प्राधानिक ब्रह्म है। उस
समय में पुमान् था। इस प्रकार से जब तक यह सृष्टि स्थित थी तब
तक ही सृष्टि का बलाबल था। एक ही परतत्व था फिर उससे सृष्टि
प्रवृत्त होती है। क्योंकि सभी तन्मात्राओं का संचय प्रकृति में संस्थित
था जो प्राकृत लय था उसके अहंकार और महत्तत्व गत हो गये थे।
जो अतीत प्रलय वाला अव्यक्त था वह भी प्रकृति में संस्थित था इसी
कारण से प्रत्येक यह संज्ञा प्राकृत संज्ञा वाला है और ऐसा कहा जाया
करता है। हे विप्रो ! यह प्राकृत नाम वाला महान लय आपको बतला
दिया है। मेरे द्वारा पुनः इस आदि सृष्टि का आप लोग श्रवण कीजिए।