कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
Page 163 of 442
Read in contextൠൡ श्रीकालिका पुराण ൠൡ १६५
आदि सृष्टि का वर्णन
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-यह काल नाम वाला स्वयं देव ही है जो
सृजन, पालन और संहार करने वाला है। उसके किसी भाग से सृजन
और प्रलय अविच्छिन्न है। लय भाग के व्यतीत हो जाने पर सृजन करने
की इच्छा समुत्पन्न हुई थी और ज्ञान के स्वरूप वाले उस समय परब्रह्म
विभु को ही सृजन की इच्छा उत्पन्न हुई थी। इसके अनन्तर उसके द्वारा
प्रकृति स्वयं ही भली भाँति धृति के द्वारा संक्षोभित हुई थी।' वह
संक्षुब्ध होकर त्रिगुण के स्वरूप वाली (सत्व, रज, तम ये तीन गुण
हैं) वह प्रकृति सभी कार्य करने के लिए हुई थी। जिस प्रकार से
सन्निधि मात्र से ही गन्ध क्षोभ के लिए हुआ करती है उसी भाँति लोकों
के कर्ता होने से यह परमेश्वर मन का होता है। हे ब्राह्मण वह भी क्षोभ
के करने वाला है और वही क्षोभ करने के योग्य होता है। वह संकोच
और विकास के प्रधान होने पर भी स्थित है। परमेश्वर प्रभु को पुराण
पुरुष अपनी केवल इच्छा के करने ही से सृष्टि की रचना करने के
लिए कारण हुआ करता है। इसके अनन्तर उन जगतों के स्वामी ने
फिर भी संक्षोभ किया था। फिर गुणों के अर्थात् सत्व, रज और तम
इन गुणों के सामान्य होने से जो कि क्षेत्र के ज्ञाता में अधिष्ठित थे उस
स्वर्ग अर्थात् सृजन के काल में गुणों के व्यञ्जन की उत्पत्ति हो गई थी।
ईश्वर की इच्छा से समीचीन प्रधान तत्व से प्रथम ही अद्भुत
महतत्व प्रधान को समावृत किया था। प्रधान के द्वारा आवृत्त उस
महतत्व से अहंकार उत्पन्न हुआ था। यह अहंकार वैकारिक, तैजस
और तामस भूतादि था। सबसे आगे अर्थात् पहले तो अहंकार समुत्पन्न
हुआ था। वह तीन प्रकार का था वह सनातन भूतादि का और इन्द्रियों
का हेतु था। उस महत् ने अर्थात् महतत्व ने उत्पन्न होते ही अहंकार को
समावृत्त कर लिया था। उस समावृत्त अहंकार से पाँच तन्मात्राएँ
समुत्पन्न हुई थीं। सबसे पहले शब्द तन्मात्रा और फिर रसतन्मात्रा एवं
पाँचवीं गन्ध तन्मात्रा क्रम से ही समुत्पन्न हुई थीं। उन सभी तन्मात्राओं
में प्रत्येक तन्मात्रा को अहंकार ने समावृत्त कर लिया था। फिर उन