Skip to content
SarvaKosh
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 161 of 442

Read in context
Page 161

𑁍 श्रीकालिका पुराण 𑁍 १६३
धारासार से जो कि बहुत ही महान थी तीनों भुवनों को पूरित कर दिया
था। आधुवस्थान को प्राप्त करके जल समूह के स्थित होने पर रुद्ररूपी
प्रभु जनार्दन ने अपने मुख से वायु का सृजन किया था। उस वायु के
ओघ से क्षित मेघ सौ वर्ष तक अव्याहत गति वाले वायु के द्वारा फिर
ध्वस्त हो गये थे। उन मेघों के विनिष्ट हो जाने पर फिर दया से सहित
रुद्रदेव ने ब्रह्मभुवन तक जानलोक आदि का विध्वंस कर दिया था।
समस्त भुवनों के विध्वस्त हो जाने पर और विशेष रूप से
ब्रह्मलोक के विध्वस्त होने पर गुरुदेव द्वादश अरुणों के समीप गये थे।
वे हरि महान वेग के साथ द्वादश आदित्यों के समीप में पहुँचे थे और
उनको ग्रसित कर लिया था फिर उन गर्भ में स्थित दिवाकरों के द्वारा
अत्यन्त प्रज्वलित हो गए थे। इसके उपरान्त कालान्तक के समान महान
बलवान रुद्रदेव ब्रह्माण्ड में प्राप्त हुए थे और वह सबको मुष्टिपेष चूर्ण
कर दिया था। ब्रह्माण्ड चूर्ण करते हुए उन्होंने पृथिवी को भी चूर्णित
कर दिया था। उन हरि ने योग के बल से समस्त जलों को धारण कर
लिया था। जो जल पूर्व में सब और ब्रह्माण्ड से बाहर स्थित था
अथवा जो अभ्यन्तर में रहने वाला जल था वह सब एक-रूपता को
प्राप्त हो गया था। सब ओर सर्वव्यापी जनों के एकीभूत हो जाने पर
ब्रह्माण्ड के खण्डों में पूर्णोध वह नौका की ही भाँति प्लवन करते हुए
थे। इसके अनन्तर पृथ्‍वी का सार गन्ध तन्मात्रक से क्रम से जल ने
ग्रहण कर लिया था और सम्पूर्ण पृथ्‍वी विनष्ट हो गई थी।
फिर उन रुद्रदेव ने गर्भ में स्थित तेजों को अपने शरीर से निकाल
दिया था। पुनः भीषण रूप से वे पुञ्जीभूत हो गये थे। उन तेजों ने छोर
तक स्थित सबको ग्रहण कर लिया था और भीतर, बाहर ब्रह्माण्ड से
जो तेज था तथा अन्य से गया हुआ था उस सबको ग्रहण किया था!
जगत में रहने वाले सम्पूर्ण तेज का ग्रहण करके एक ही स्थान के
जलते हुए ने रौद्र ब्रह्माण्ड के खण्डों को जल में त्रिदोष कर दिया था।
ब्रह्माण्ड के चूर्णों का दाह करके वे तेज उज्ज्वलित हो गये थे फिर
जलों से जो उनकी रस तन्मात्रा थी जो कि सारभूत थी उसका ग्रहण