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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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Page 160

१६२ ൵ श्रीकालिका पुराण ൵
कर लेंगे। शुष्क वृक्ष, तृण, गण, प्राणी तथा पर्वत चूर्ण होकर दिव्य
सौ वर्ष में विकीर्ण हो जायेंगे। फिर बारह सूर्यों की बहुत ही अधिक
प्रबल किरणें हुई और जगत के भोग्य से उपबृंहित द्वादश आदित्य हुए
थे। द्यौ और मेदिनी उष्णता को प्राप्त हो गये थे। इसके उपरान्त सम्पूर्ण
स्थावर और जंगम के विनष्ट जाने पर आदित्य की किरण से रुद्ररूपी
देव जनार्दन उन्नत हो पाताल नदी को प्राप्त हो गये थे।
सात पाताल के संस्थानों को नाग, गन्धर्व और राक्षसों को, देवों
को, ऋषियों को और शेष को नर शूल के धारण करने वाले ने हनन
कर दिया था। इसी प्रकार से स्वर्ग में, पाताल में, पृथ्वी में और सागरों
में जो भी प्राणधारी जीव थे उन प्रभु जनार्दन ने उन सबको मार दिया
था। इसके पश्चात मुख से महावायु का रुद्रदेव ने स्वयं सृजन किया
था। वह अव्याहत गति वाला वायु दृढ़ता से संसार के तीनों भुवन के
गर्भ में गमन करने वाला सौ वर्ष तक भ्रमण करता हुआ जो भी कुछ
था उस सबको तुला राशि के ही समान उसको उत्साहित कर दिया था।
सभी ओर जगत में रहने वाले सम्पूर्ण को समुत्साहित करके वेग में
अत्यधिक वह वायु बारह आदित्यों में प्रवेश कर गया था। उनके
मण्डल में प्रवेश करके उनके तेज के साथ वायु गुरुदेव के द्वारा
प्रतियोजित होते हुए महान मेघों का उसने समारम्भ कर दिया था। फिर
प्रेरित हुए वे मेघ जो उस वेग वाले वायु के द्वारा ही प्रेरित किये गये
थे अतिरौद्र के द्वारा मेघों ने स्थल को घेर लिया था।
सम्वर्त नाम वाले महामेघ जो भिन्न अञ्जन के समूह के समान थे।
उनमें कुछ तो धूम्र वर्ण वाले थे, कुछ शुक्ल और कुछ चित्र विचित्र
वर्ण वाले महाभीषण थे। कुछ मेघ पर्वत के तुल्य आकार से युक्त थे,
कुछ नाम के समान प्रजा के समन्वित थे, कुछ बड़े विशाल प्रासाद के
समान थे और कुछ क्रौंच के वर्ण वाले महान भीषण थे। वे महामेघ
गर्जन करते हुए सौ वर्ष से भी अधिक समय तक महान शब्द करने
वाले वे मेघ तीनों लोकों का प्लावन करते हुए वर्षा करते थे। इसके
अनन्तर स्तम्भ (खम्भा) के प्रमाण वाले धाराओं के पास से खूब दृढ़