कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
Page 153 of 442
Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १५५
होते हुए तीनों लोकों में विचरण किया करते हैं । इसी रीति से मुनि
वशिष्ठ ने पहले अरुन्धती के साथ परिणय की गई थी । जो पुरुष इस
धर्म के साधन स्वरूप आख्यान को नित्य ही श्रवण किया करता है वह
सब प्रकार के कल्याणों से युक्त होकर चिरायु और धनवान हुआ
करता है ।
जो कोई स्त्री निरन्तर अरुन्धती की इस कथा को सुना करती है
वह इस लोक में पतिव्रता हो परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति किया करती
है । यह आख्यान परम कल्याण का गृह है और यह परम धर्म के प्रदान
करने वाला है । यह आख्यान सर्वदा कीर्ति, यश, पुण्य का विशेष
बढ़ाने वाला है । पुरुष के विवाह में, यात्रा में और श्राद्ध में जो श्रवण
करता है उनकी स्थिरता, पुंसवन, सिद्धि और पितृगण प्रीति हो जाया
करती है । यह सम्पूर्ण महात्मा वशिष्ठ का आख्यान आपको कह दिया
है जिस प्रकार अरुन्धती उनकी भार्या और परम पतिव्रता हुई थी । वह
जिसकी पुत्री होकर उत्पन्न हुई और जिस तरह से उसने अपना जन्म
ग्रहण किया था तथा जिस स्थान में उसका समुद्भव हुआ था और जिस
प्रकार से उसने ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर के वचन से अपने पति का
वरण किया था, यह सभी कुछ गुह्य से भी अत्यधिक गुह्य को मैंने
आपको वर्णन करके समझा दिया है । यह आख्यान पुण्य का दाता
पापों का हरण करने वाला और वायु तथा आरोग्य के बढ़ाने वाला है ।
यह बहुत वर्षों के पापों को क्षय करने वाला इतिहास है । इसको सभा
में द्विजों को कोई एक बार भी श्रवण करा देता है वह मनुष्य कलुषों
के समूह से हीन देह वाला हो जाता है और साथ में रहकर मुनिवरों
की सहचर्या को प्राप्त कर लेता है और मृत होने पर वह देवता ही हो
जाता है ।
[ सती का विभूति वर्णन ]
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा—इसके उपरान्त हिमालय पर्वत के प्रस्थ
पर क्षिप्र सरोवर के तट पर उपविष्ट हुए महादेवजी समीप में उस