कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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सरोवर का अवलोकन कर रहे थे । बारम्बार ब्रह्मा और हरि के द्वारा
प्रेष्यमाण यह ध्यान करने के लिए मन को स्थिर करके दृढ़ आत्मा वाले
हुए थे। आत्मा के द्वारा आत्मा को आत्मा में ही विशेष रूप देखने के
लिए कामदेव को शमन करने वाले शिव के ध्यान के द्वारा परम यत्न
किया था। दुहिण प्रभृति ने ध्यान प्रविष्ट चित्त वाले उनको देखकर
यतमानस होते हुए हर में प्रवेश की हुई माया नाम वाली का स्तवन
किया था। माया मोहित हुए शिव बहुत ही अधिक सती के शोक से
व्याकुल हैं और वह उसी के लिए विलाप किया करते हैं उसमें मोह
के हेतु जगत्प्रभु की स्तुति करके शम्भु में कर देंगे। जब तब सती पुनः
शरीर का ग्रहण करके शिव की भामिनी होवे तब तक यह विगत शोक
वाले होकर निष्फल का ध्यान करें। ब्रह्मा आदि देवगण यही मन से
चिन्तन करके महामाया योगनिद्रा देवी की स्तुति करने का सभारम्भ
उन्होंने कर दिया था।
देवों ने कहा-उस श्री शक्ति पावनी पुष्टि और परम निष्कला का
जो महान् अव्यक्त रूप वाली है हम लोग महतीभक्ति की भावना से
स्तुति करते हैं। वह परम शिवा है, शिव अर्थात् कल्याण के करने
वाली हैं शुद्धा, स्थूला, सूक्ष्मा, परावरा, अन्तर्विद्या, अविद्या नाम
वाली, प्रीति और एकाग्र योगिनी हैं। आप ही मेधा हैं, आप ही धृति
हैं, ह्रीं हैं और आप एक सबके गोचरा हैं, आप ही दीधिति हैं, सूर्य
में गति हैं और सुप्रपञ्च के प्रकार करने वाली हैं। जो ब्रह्मांड संस्थान
है, जो जगत् के बीजों में जगत् है जो ब्रह्मा से आदि लेकर स्तम्ब के
अन्त पर्यन्त आप्यायित किया करती हैं। जो समस्त जगतों का प्राणभूत
सदागति और देवों का आधार है वह नभ भी आपका ही एक अंशभूत
हैं। इस प्रकार से जो तेज है वह सर्वत्र ही भली भाँति जायेगा वह
आपका रूप जगत् के बीच है और जो प्रायः दिखाई दिया करता है।
जो ब्रह्मलोक पाताल और सदा अन्तरात्मगता है वह आप वियत्
(आकाश) के मध्य में और बाहिर और ब्रह्माण्ड के सभी ओर है।
जो अचल चल चक्र से यांत्रित प्रपंच को उत्पन्न करने वाली है। आप