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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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१५० श्रीकालिका पुराण
अरुन्धती ने देखा था । फिर उसके केवल अवलोकन करते ही कामदेव
की वासना अधिक बढ़ गई थी । हे प्रजापते! वे दोनों ही परस्पर स्पृह
करने वाले हुये थे । वे दोनों ही ने बड़े धीरज से बहुत ही दुःखित होकर
काम की वासना का स्तम्भन किया था । वे दोनों ही अन्य मनस्क होकर
अथवा उदास होते हुए परम लज्जित होकर अपने-अपने स्थान को चले
गये थे ।
हे सुरश्रेष्ठ! ऐसा हो जाने पर जो भी कुछ समुचित होवे उस समय
में यही आप कीजिए । भविष्य काल की भलाई में लोकों की
हितकामना से वही आप करें जो उचित हो । समस्त जगतों के गुरु
ब्रह्माजी ने यह उसके वचनों को श्रवण करके आगे होने वाले कर्म की
प्रवृत्ति का दिव्य ज्ञान के द्वारा दर्शन किया था अर्थात् समझ लिया था
कि भविष्य में क्या होने वाला है । उस अवसर पर लोक पितामह ने
इसका स्वागत ही किया था क्योंकि उन दोनों के दाम्पत्य भाव का
समय यह उपस्थित हो गया था । इसीलिए लोकों के हित के लिए
उसकी प्रवृत्ति के लिए अवश्य ही जाऊँगा । ऐसा मन के द्वारा निश्चय
करके सावित्री के साथ ब्रह्माजी ने गमन किया था और वे मानव गिरि
के प्रस्थ पर गये थे जहाँ पर कि उन दोनों का दर्शन हो जावे । पितामह
के वहाँ चले जाने पर शिव समस्त सुरगुणों सहित नन्दी प्रभृति गणों
के साथ वृषभध्वज वहाँ पर आ गये थे । भगवान वासुदेव भी ब्रह्माजी
के द्वारा परिचिन्तित होकर वहाँ पर आ गये थे जो कि जगत् के साथ
वह भी भक्ति की भावना से शंख, चक्र, गदा के धारण करने वाले
थे । जहाँ पर ब्रह्मा और शिव स्थित थे वे भी वहाँ पर स्वयं ही आ
गये थे । इसके अनन्तर जगतों के स्वामी ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर इन तीनों
ने मेधातिथि के समीप में देवर्षि नारदजी को दूत बनाकर भेजा था ।
उन्होंने नारदजी ने कहा-हे नारद! आप शीघ्र ही चन्द्रभागा नामक
पर्वत पर चले जाइए । वहाँ पर उस पर्वत की उपत्यका में परम श्रेष्ठ
मुनि मेधातिथि विराजमान हैं । आप उनको हमारे वचन से यथाकाम
स्वयं ही हमारे पास ले आइए । आप स्वयं ही मेधातिथि को साथ में