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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 150 of 442

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Page 150

लाकर शीघ्र ही यहाँ पर आ जाइए। ब्रह्मा आदि के वचन का श्रवण
करके नारदजी शीघ्र ही चले गये थे और सब कार्य की सिद्धि के लिए
वे मेधातिथि को वहाँ पर लाने के लिए प्रस्थान कर गए थे। उन देवर्षि
ने मेधातिथि से सम्भाषण करके देवों के वचनों से मेधातिथि को अपने
साथ लाकर मानस पर्वत पर चले गये थे। वहाँ मानस पर्वत पर समस्त
देवगण इन्द्र के सहित और सब तपोधन, मुनिगण, साध्य, विद्याधर,
दक्ष और गन्धर्व भी वहाँ पर समागत हो गये थे। सब देव और समस्त
देवियों और जो देवों के अनुचर थे तथा जो अन्य जन्तुगण थे वे सभी
मानस के प्रस्थ को समायात हो गये थे। इसके पश्चात् देवों के समाज
के सम्पन्न हो जाने पर कमलासन ने मेधातिथि मुनि से अतिदेश करते
हुए यह वचन कहा था।
ब्रह्माजी ने कहा- हे मेधातिथे ! आप अपनी सुचारित व्रत वाली
पुत्री अरुन्धती को इस देवों के समाज में ब्रह्मविधि से दे दीजिए। मैंने
इन दोनों का वर वधू होना पहले ही सृजित कर दिया है। भगवान हरि
ने भी इस परम समुचित कर्म के विषय में आज्ञा प्रदान कर दी थी।
ऐसा समाचरण करने पर आपके कुल में बड़ा भारी यश होगा और
इससे समस्त प्राणियों की भलाई भी होगी। अतएव शीघ्र ही दे दीजिए
और इस कार्य में विलम्ब नहीं कीजिए। फिर ब्रह्माजी ने इस वचन का
श्रवण करके वह मुनि बहुत ही अधिक प्रसन्न हुए थे और उन्होंने कहा
था- 'ऐसा ही होगा' फिर उसने समस्त देवों को प्रणाम किया था। उस
मुनि के वचन का श्रवण करके वह अपनी पुत्री अरुन्धती को ले आये
थे। ध्यान में स्थित वशिष्ठ मुनि के समीप में देवों के साथ चले गये
थे। देवों के द्वारा पतिव्रत मुनि ने वशिष्ठ जी के समीप में पहुँचकर जो
मुनि ब्रह्मश्री से देदीप्यमान थे और प्रज्जवलित अग्नि के ही समान
कान्ति वाले थे। उनके पृथक-पृथक उस मानस पर्वत की कन्दरा में
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में बुद्धि को धारणा किये हुए समासीन मुनि
का दर्शन किया था। वहाँ पर अरुन्धती के पिता के ओजस्वियों में
परमश्रेष्ठ, उदितवान सूर्य के समान, नियत आत्मा वाले वशिष्ठ मुनि