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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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१४६ श्रीकालिका पुराण
इसी रीति से वह देव उन दोनों के साथ सुरों के आलय में अर्थात्
स्वर्गलोक में विहार करती उसने दिव्यमान से अर्थात् वेदों की गणना के
हिसाब से सात परिवत्सर व्यतीत कर दिये थे। उन दोनों के साथ ये
बैठी हुई उस सती ने शीघ्र ही स्त्री धर्म को सम्पूर्णता से जान गयी थी
अर्थात् स्त्रियों का पूरा धर्म का ज्ञान उसने प्राप्त कर लिया था और वह
सावित्री तथा बहुला से भी अधिक ज्ञानवती हो गयी थी। इसके अनन्तर
उसको उस समय समुचित काल के सम्प्राप्त होने पर यौवन का उद्भेद
हो गया था अर्थात् यौवनावस्था के चिह्न प्रकट हो गये थे जिस प्रकार
से पद्मिनीयों की रुचि हुआ करती है। उद्भूत यौवन वाली उसे मानस
अचल में विहार करती हुई अकेली ही ने सुन्दर तेज वाले वशिष्ठ मुनि
को देखा था। उस सती ने उस समय में उस मुनि का अवलोकन करके
कामवासना की भावना से बालसूर्य के तुल्य प्रभा वाले सुन्दरतम रूप
ब्राह्मण की श्री से समन्वित इसकी इच्छा की थी अर्थात् उसे प्राप्त करने
की लालसा उसको हो गयी थी। इसके उपरान्त महान तेज वाले उन
वशिष्ठ मुनि ने भी उस परवर्णिनी का अवलोकन करके अद्भुत काम
वाला होते हुए उस अरुन्धती को देखा था। हे द्विज श्रेष्ठों! इस रीति
से परस्पर में एक दूसरे का अवलोकन करके महान काम की वृद्धि हो
गई थी। जिस तरह से किसी प्राकृत अर्थात् साधारण व्यक्ति को बिना
ही मर्यादा के कामदेव समुत्पन्न हो जाया करता है। तात्पर्य यह है कि
सामान्य की ही भाँति कामवासना उद्भूत हो गई थी।
इसके अनन्तर उस प्रकार उस मेधातिथि की पुत्री ने धीरज का
आलम्बन किया था और अपनी आत्मा को तथा मदन (कामदेव) से
प्रेरित मन को धारण किया था अर्थात् अपने आपको मन को संयत
रखा था। महान् तेजस्वी वशिष्ठ मुनि ने भी अपनी आत्मा में धैर्य
रखकर कामवासना से उन्मथित मन को स्तम्भित किया था। इसके
अनन्तर देवी अरुन्धती ने मुनि की सन्निधि का त्याग करके अपने
मनोरथ की बुराई करती हुई जहाँ पर सावित्री थी वहाँ पर ही वह चली
गई थी। वह महासती मानस दुःख की अधिकता से बाध्यमाना होती हुई