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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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൘൘ श्रीकालिका पुराण ൘൘ १४५
हे माता बहुले! यह मेरी महान् यज्ञ वाली पुत्री है। अब इसके उपदेश
करने का समय आ गया है। उसी के लिए मैं यहाँ पर समागत हुआ
हूँ। यह जगत् के सृजन करने वाले के द्वारा आज्ञा प्राप्त करने वाली
हुई है कि यह आपकी शिष्यता को प्राप्त करे अर्थात् आपकी शिष्य
हो जावे। इस कारण से यह मेरी पुत्री आपके समीप में लाई गई है।
जिस प्रकार से इसकी सुचरित्रता होवे उसी प्रकार से इस मेरी बालिका
को आप दोनों देवी बना देवें। हे माताओं! आप दोनों के लिए प्रणाम
अर्पित है। इसके उपरान्त उस समय में देवी सावित्री मन्द मुस्कराहट के
साथ बहुला के सहित उस मुनियों में श्रेष्ठ से कहा था और उस
बालिका से भी कहा था।
उन दोनों देवियों ने कहा-हे ब्राह्मण! भगवान विष्णु के प्रसाद से
आपकी पुत्री बहुत ही चरित्र वाली है। हे मुने! यह तो पहले ही ऐसी
सुयोग्य हुई है फिर इसको उपदेश देने से क्या लाभ है। तात्पर्य यही
है कि जो यह आपकी पुत्री पहले ही से परम योग्य है तो फिर इसको
उपदेश देने की कोई भी आवश्यकता नहीं है। किन्तु मैं और महासती
बहुला ब्रह्मवाक्य के होने से आपकी धैर्य वाली सुता को विनीत
बनायेंगी अर्थात् सदुपदेशों के द्वारा परम विनीत ऐसे ढंग से कर देंगी
के उसमें विशेष विलम्ब नहीं होगा। यह पहले ब्रह्माजी की पुत्री थी
आपके तपोबल के कारण से तथा भगवान विष्णु के प्रसाद से यह
अरुन्धती आपकी सुता हुई है। यह सती आपके कुल को पवित्र करती
है और उसकी वृद्धि की करेगी। यह लोकों को और देवों का कल्याण
ही करेगी। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर यह मेधातिथि मुनि
के द्वारा विदा होकर उसने अपनी पुत्री अरुन्धती को आश्वासन दिया था
और फिर उनको प्रणाम करके वह अपने आश्रम को चले गये थे। उस
मुनिवर के चले जाने पर अरुन्धती उन दोनों के साथ माताओं की ही
भाँति निडर पाली हुई थीं और उसने भी आनन्द प्राप्त किया था।
किसी समय में रात्रि में सावित्री के साथ वह रतिदेव के गृह को जाया
करती थी और किसी समय में बाहुल्य के साथ इन्द्रदेव के घर में जाती थी।