कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
Page 143 of 442
Read in context१४४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
हजार) वाजपेय यज्ञ के पुण्य को प्राप्त किया करता है। चन्द्रभागा के
जल में स्नान करके बाल्य लीला से क्रीड़ा करती हुई पिता के समीप
में उसके तट पर किसी समय में उस अरुन्धती को आकाश मार्ग से
जाते हुए ब्रह्माजी ने अरुन्धती को उस काल में उपदेश में देखा। इसके
उपरान्त उस समय में मुनियों के द्वारा परिपूजित जो कि मेधातिथि आदि
थे ब्रह्माजी ने उस महामुनि से समुचित कहा था।
ब्रह्माजी ने कहा-हे महामुनि! यह अरुन्धती के उपदेश का काल
है। इस कारण इसको सती स्त्रियों के मध्य में सन्निधि वाली करो।
बहुला सावित्री और सावित्री के समीप में आप पुत्री को स्थापित
करिये। हे महामुने! आपकी पुत्री उन दोनों का संसर्ग प्राप्त करके महान्
गुण गण और ऐश्वर्य से संयुत शीघ्र ही हो जायेगी। परमात्मा ब्रह्माजी
ने वचन का श्रवण करके मेधातिथि से उस समय में ऐसा ही होगा, यह
मुनिश्रेष्ठ ने कहा था। इसके अनन्तर सुर श्रेष्ठ के चले जाने पर
मेधातिथि मुनि अपनी पुत्री को लेकर उसी क्षण में सूर्य भवन के प्रति
गमन किया था। वहाँ पर सूर्य मण्डल के मध्य में विराजमान सावित्री
को देखा था। जो कि पद्म के आसन पर संस्थित थी और वह देवी
अक्षों की माला को धारण करने वाली एवं सितवर्ण वाली थी। रवि
के मण्डल से निकलकर उस मुनि के द्वारा वह देखी गई थी। वह
बहुला शीघ्र ही मानस पर्वत के प्रस्थ पर चली गयी थी। वहाँ पर
प्रतिदिन सावित्री, गायत्री तथा बहुला, सरस्वती और द्रुपदा के पाँचों
मानस अनल पर थी।
वहाँ पर लोकों की हितकामना से परस्पर में धर्माख्याओं के द्वारा
साध्वी कथाओं को कहकर फिर अपने-अपने स्थान को चली जाया
करती थी। तप ही जिसका धन था। हे माता! आप तो समस्त लोकों
की माता हैं मैं आपको पृथक-पृथक प्रणाम समर्पित करता हूँ। उस
तपोधन ऋषि ने उन सबसे परम मधुर वचन कहा था और वह उन
सबको एक ही स्थान में सम्मिलित हुई का दर्शन करके बहुत ही
भयभीत और विस्मित हुआ था। मेधातिथि ने कहा-हे माता सावित्री!