कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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पर मेरी सकाम दृष्टि नहीं होवे । यह भी मेरा परम सुकृत होगा । जो
कोई भी पुरुष कामवासना से युक्त होकर मुझे देखे उसका पुरुषत्व
विनाश को प्राप्त हो जावेगा और वह क्लीव अर्थात् नपुंसक हो जावेगा ।
श्री भगवान् ने कहा-प्रथम तो शैशव भाव हुआ करता है और
दूसरा कौमार नाम वाला भाव होता है, तीसरा यौवन का भाव है और
चतुर्थ वार्द्धक भाव होता है। तीसरे भाव अर्थात् यौवन के भाव को
सम्प्राप्त हो जाने पर जो एक शरीरधारी अवस्था का भाग है मनुष्य
उसमें ही कामवासना से समन्वित हुआ करते हैं। कहीं-कहीं पर द्वितीय
भाव के अन्त में भी हो जाते हैं। मैंने आपके तप से जगत् में मर्यादा
स्थापित कर दी है कि उत्पन्न होते ही शरीर धारी सकाम नहीं होंगे और
आप तो लोक में उस प्रकार का भाव प्राप्त करेंगी कि तीनों लोकों में
अन्य किसी का भी ऐसा भाव नहीं होगा। जो भी कोई बिना आपके
पाणिग्रहण करने के किए हुए कामवासना से युक्त होकर आपको
देखेगा वह तुरंत ही क्लीवता अर्थात् नपुंसकता को प्राप्त करके अतीव
दुर्बलता को पा लेगा। आपका पति तो बहुत बड़े भाग्य वाला होगा जो
सुन्दर रूप लावण्य से और तप से समन्वित होगा। वह आपके ही साथ
रहकर सात कल्पों के अन्त पर्यन्त जीवन के धारण करने वाला होगा।
ये जो भी वरदान आपने मुझसे प्रार्थित किए थे व सब मैंने पूर्ण कर
दिये हैं और अन्य भी मैं आपको बतलाऊँगा जो कि पूर्व में आपके मन
में स्थित था।
आपने पूर्व में ही अग्नि में अपने शरीर के परित्याग करने की
प्रतिज्ञा की थी वह प्रतिज्ञा बारह वर्ष तक होने वाले मुनिवर मेधातिथि
के यज्ञ में की थी। हुत से प्रज्जवलित अग्नि में शीघ्र ही आप गमन
करें। उस पर्वत की उपत्यका में चन्द्रभागा नदी के तट पर तापसों के
आश्रम में मेधातिथि महायज्ञ कर रहे हैं वहाँ पर जाकर स्वयं छत्र होती
हुई जिसको मुनियों ने भी नहीं देखा है, मेरे प्रसाद से वह्नि से जलकर
आप उसकी पुत्री होंगी। जो भी अपने मन के द्वारा अपने पति होने की
थी वह जो भी कोई हो उसको अपने मन में धारण करके अपने शरीर