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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 138 of 442

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൵ श्रीकालिका पुराण ൵ १३९
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आप पर परमात्मा हैं, हे हरे! आप विविध विद्या हैं, आप
शब्दब्रह्म और विचार के पर से भी पर हैं। जिस जगत् के पति का
न तो आदि है, न मध्य और अन्त ही होता है उन देव का मैं किस
प्रकार से स्तवन करूँ जो देव वाणी, मन के गोचर से भी बाहिर अर्थात्
पर हैं, जिनके स्वरूपों का ब्रह्मा आदि देवगण तथा तप के भी धनवाले
मुनिगण भी विवरण नहीं किया करते हैं उनके रूप मेरे द्वारा किस
प्रकार से वर्णन करने योग्य हो सकते हैं ? उन निर्गुण प्रभु के गुण मुझ
स्त्री जाति वाली के द्वारा कैसे जानने के योग्य हो सकते हैं ? जिनके
स्वरूप को इन्दु आदि सुर और असुर भी नहीं जानते हैं। हे जगत् के
नाथ! आपके लिए नमस्कार है। हे तप से परिपूर्ण! आपके लिए
नमस्कार है। हे भगवान्, आप प्रसन्न हो गए आपके लिए बारम्बार
नमस्कार है। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर उसका शरीर
वल्कल और अजिन (मृगचर्म) से संवृत था तथा बहुत ही क्षीण और
मस्तक पर पवित्र जटा-जूटों में राजित था अर्थात् परम शोभित था।
मादिनी में सर्जित कमल के सदृश मुख को देखकर भगवान हरि कृपा
से समावष्टि होकर उस सन्ध्या से यह बोले ।
श्री भगवान ने कहा-हे भद्रे! आपकी इस परम दारुण तपश्चर्या
से मैं अधिक प्रसन्न हो गया हूँ। हे शुभ प्रज्ञा वाली! मुझे आपकी स्तुति
से अधिक प्रसन्नता हुई है। अब आप मुझसे वरदान जो भी अभीष्ट
उसे प्राप्त कर लो। जिस वर से उनका मनोगत कार्य हो मैं उसको कर
दूँगा, तुम्हारा कल्याण होवे, मैं तुम्हारे इन व्रतों में परम हर्षित हो गया
हूँ। सन्ध्या ने कहा-हे देव! यदि आप मुझ पर परम प्रसन्न हैं और मेरी
इस तपश्चर्या से आपको आह्लाद हुआ है तो अब मैंने प्रथम बार व्रत
किया है उसी को आप करने की कृपा कीजिए। हे देवेश्वर! उत्पन्न मात्र
ही प्राणी इस नभस्तल में क्रम से ही सकाम न होवें, वे सम्भव होवें।
मैं तीनों लोकों में परम पतिव्रता प्रथित हो जाऊँगी जैसे कोई दूसरी न
होवे। मैंने यह एक बार व्रत किया है। काम वासना से संयुत मेरी दृष्टि
कहीं पर भी न गिरेगी। हे जगत् के स्वामिन्! पति को छोड़ कर कहीं