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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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का त्याग वह्नि में कर दो । हे सन्ध्ये ! जब आप इस परम दारुण पर्वत
में तपश्चर्या कर रही हो उस तप को करते हुए चारों युग व्यतीत हो
गयें हैं तथा कृतयुग के व्यतीत होने पर त्रेता के प्रथम भाग में दक्ष की
कन्या उत्पन्न हुई थी । उस प्रजापति दक्ष ने सत्ताईस अपनी कन्याओं को
चन्द्रदेव के लिए दे दिया था ।
उन कन्याओं के लिए जिस समय में क्रोधयुक्त दक्ष के द्वारा
चन्द्रदेव को शाप दिया गया था उस समय में आपके समीप में सभी
देवगण समागत हुए थे । हे सन्ध्ये ! उसके द्वारा ब्रह्मा के साथ देवगण
नहीं देखे गये थे क्योंकि आपने मुझमें ही अपना मन लगा रखा था ।
अतः आप भी उनके द्वारा नहीं देखी गई थीं । चन्द्रदेव को दिए हुए
शाप को छुटकारे के लिए जिस प्रकार से विधाता ने चन्द्रभाग नदी की
रचना की थी उसी समय में यहाँ पर मेधातिथि उपस्थित हो गया था ।
तप से उसके समान कोई भी अन्य नहीं है और न अब तक कोई हुआ
ही है तथा भविष्य में ही कोई ऐसा तपस्वी नहीं होगा । उस मेधातिथि
ने महान् विधि वाला ज्योतिष्टोम नामक यज्ञ का आरम्भ किया था ।
वहाँ पर जो वह्नि प्रज्वलित है उसी में अपने शरीर का त्याग करो । हे
तपस्विनी ! यह मैंने तुम्हारे की कार्य के सम्पादन करने के लिए स्थापित
किया है । हे महाभागे ! आप वह करिए और उस महामुनि के यज्ञ में
गमन करिए ।
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा--भगवान् नारायण ने स्वयं ही अपने कर
के अग्रभाग से इसके अनन्तर सन्ध्या का स्पर्श किया था । इसके
पश्चात् एक ही क्षण में उसका शरीर पुरोडाश से परिपूर्ण हो गया था ।
इस प्रकार से करके जगत् के स्वामी वहाँ पर अन्तर्धान हो गये थे और
वह सन्ध्या उस सत्र में गई थी जहाँ पर मेधातिथि मुनिवर विद्यमान थे ।
उसके अनन्तर भगवान विष्णु के प्रसाद से किसी के भी द्वारा उपलक्षित
होती होई सन्ध्या देवी ने मेधातिथि मुनि के लिए उपदेश दिया था ।
उसी तपश्चर्या के उपदेश को मन में करने उस समय सन्ध्या ने पतित्व
के रूप से ब्रह्मचारी ब्राह्मण का वरण रखा था । उस महायज्ञ में समिद्ध