कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context१३४ श्रीकालिका पुराण
पश्चिम पार्श्व में उस गिरि के प्रति समवाहित कर दिया था।
उसके अमृत जल का भेदन करके वृहल्लोहित नाम वाला सरोवर
कर दिया था और वह चन्द्रभाग नदी तो सागर को गमन करने वाली
थी। उस समय सागर ने भी महानदी चन्द्रभाग भार्या को उस जल के
प्रवाह से उसको अपने भवन में ले गया था। इसी रीति से उसमें
चन्द्रभागा नाम वाली नदी समुत्पन्न हुई थी। वह चन्द्रभागा महान शैल
में अपने गुणों के द्वारा सदा गंगा के ही समान थी। नदियां और सब
पर्वत स्वभाव से ही दो रूपों वाले सदा हुआ करते हैं। नदियों का रूप
तो उनका जल ही होता है तथा शरीर दूसरा ही हुआ करता है। पर्वतों
का रूप को स्थावर ही होता है। इसी प्रकार से जल तथा उस समय
में नदी और पर्वत का स्थावर होता है। उनका काम तो अन्तर में वास
किया करता है और निरन्तर उत्पन्न नहीं होता है।
पर्वत का शरीर तो स्थावर के द्वारा ही आप्यायित होता है। उसी
भाँति नदियों का शरीर जल के द्वारा ही सदा आप्यापित हुआ करता
है। नदियों का तथा पर्वतों का रूप कामरूपी होता है। भगवान् विष्णु
ने यत्नपूर्वक पहले जगत् की स्थिति के लिए ही कल्पित किया था।
हे सुरगणों! जल की हानि होने पर निरन्तर ही नदियों को महान् दुःख
हुआ करता है और विकीर्ण हो जाने पर स्थावर गिरि के शरीर में
उत्पन्न होता है। उस पर्वत पर जो कि चन्द्रभाग नाम वाला था
बृहल्लोहित के तट पर गमन करने वाली सन्ध्या का अवलोकन किया
था और वशिष्ठ मुनि ने उस समय में बड़े ही आदरपूर्वक उससे पूछा
था। वशिष्ठ जी ने कहा-हे भद्रे! आप इस निर्जन महान् गिरि पर
किस प्रयोजन के लिए आयी हैं। हे गौरि! आप किसकी पुत्री हैं? और
आपका क्या चिकीर्षित है अर्थात् क्या करने की इच्छा रखती हैं। यदि
आपकी कोई भी गोपनीय बात न हो तो मैं यही सुनना चाहता हूँ।
आपका मुख तो चन्द्रमा के समान परमाधिक सुन्दर है किन्तु इस समय
में वह निःश्री सा क्यों हो रहा है? उन महात्मा वशिष्ठ मुनि के इस
वचन का श्रवण करके उन महात्मा का अवलोकन किया था जो