कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextश्रीकालिका पुराण १३३
सोलह कलायें हैं उनमें एक भगवान् शम्भु के मस्तक में रहा करती है ।
शेष कलाओं के सित और असित अर्थात् शुक्ल और कृष्ण ये दोनों
पक्ष उदय और क्षय वाले ही होते हैं । यह सब मैंने आपको बतला दिया
है । जिस प्रकार से भी चन्द्रमा का विभाग किया गया है, जिस रीति
से ब्रह्मा के द्वारा उस श्रेष्ठ पर्वत में चन्द्रमा समागत हुआ था । जिस
कारण से यज्ञ भाग के स्थित होने पर विभु को देवों का अन्न किया
था । जिस तरह से कव्य के स्थित होने पर भी पितृगण का अन्न
तिथियों का क्षय और वृद्धि होता है । इस परम पुण्यतम आख्यान को
जो भी कोई मनुष्य एक बार भी श्रवण कर लिया करता है उसके कुल
में राजयक्ष्मा का महारोग कभी भी किसी को नहीं रहा करता है और
न होता ही है । जो भी कोई मनुष्य राजयक्ष्मा से पराभूत है और विधाता
के वचन का श्रवण कर लेता है तो उसका यक्ष्मा विनष्ट हो जाया
करता है । यह आख्यान परमाधिक स्वस्ति अर्थात् कल्याण का स्थान है,
पुण्यमय है और शुभ तथा गुह्य से भी अधिक गोपनीय है । जो भी कोई
एकचित्त होकर इसको सुनता है वह महान् पुण्य का भागी होता है ।
◎ मार्कण्डेय महर्षि ने कहा--जहाँ पर सब महागिरि के शिखर पर
देवों की सभा हुई थी वहाँ पर विधाता के वचन से सीता नाम वाली
देव नदी समुत्पन्न हुई थी । जिस समय मनोहर सीता के जल से स्तवन
कराकर उन सब देवगणों ने ब्रह्मा के वाक्य से चन्द्र का पान कर गये
थे उस समय में सीता नदी का जल चन्द्रमा के स्नान के योग से वह
अमृत होकर उस वृहल्लोहित संज्ञा वाले में निपातित हो गया था । उस
समय में उसका जल बढ़ गया था और उस सरोवर में वह नहीं समाया
था । उसको ब्रह्माजी ने स्वयं ही देखा था कि वह विशेष बढ़ा हुआ
जल अमृत था । उसके देखने से उस जल से एक अत्युत्तम कन्या
समुत्थित हुई थी । उस कन्या का नाम चन्द्रभागा था जिसको कि
विधाता ने स्वयं ही रखा था । ब्रह्माजी की सहमति से सागर ने उसको
अपनी भार्या बनाने के लिए ग्रहण कर लिया था । उसी के द्वारा
अधिष्ठित जल को निशावर्ति ने गदा के अग्रभाग से भेदन करके