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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 134 of 442

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १३५
प्रज्वलित अग्नि के ही समान थे। वे उस समय ऐसे ही प्रतीत हो रहे
थे मानो शरीरधारी ब्रह्मचर्य के ही सदृश हों। उन जटाधारी को बहुत
ही आदर के साथ प्रणिपात करके इसके पश्चात् उस संध्या ने उन
तपोधन से कहा था।
वशिष्ठजी द्वारा सन्ध्या को दीक्षा देना
सन्ध्या बोली-जिस प्रयोजन की सिद्धि के लिए मैं इस शैल पर
समागत हुई थी वह मेरा कार्य सिद्ध हो गया है। हे द्विजोत्तम! हे विभो!
आपके दर्शन मात्र से ही वह कार्य पूर्ण हो जायेगा। हे ब्रह्मन्! मैं
तपश्चर्या करने के लिए ही इस निर्जन पर्वत पर आई थी। मैं ब्रह्माजी
के मन से समुत्पन्न हुई हूँ और मैं लोक में सन्ध्या इस नाम से प्रसिद्ध
हूँ। यदि आपको कुछ गोपनीययुक्त होता हो तो आप मुझको उपदेश
दीजिए। यही मेरा परम गुह्य चिकीर्षित है और दूसरा कुछ भी नहीं है।
तपस्या के भाव का ज्ञान न प्राप्त करके ही मैंने इस तपोवन का उपाश्रय
ग्रहण किया है। मैं चिन्ता से परिशुष्क हो रही हूँ और मेरा मन सदा
ही काँपता रहता है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ठ
जी ने उस संध्या के वचन को सुनकर उन स्वयं ही सम्पूर्ण तत्त्व के
ज्ञाता मुनि ने उससे अन्य कुछ भी नहीं पूछा था। इसके अनन्तर उस
समय वशिष्ठ मुनि ने उस नियत आत्मा वाली और तप के लिए अत्यन्त
उद्यम धारण करने वाली उसको शिष्य-गुरु के ही समान वशिष्ठ ने
मन्त्र दीक्षा दी थी।
वशिष्ठ मुनि ने कहा-जो महान् तेज परम है, जो परम महान् तप
है, जो परम समाराधना करने के योग्य है उन भगवान विष्णु को ही
अपने मन में धारण करिए। जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन परम
पुरुषार्थों का एक ही आदि कारण है उन जगतों के आद्य पुरुषोत्तम प्रभु
का यजन करो। जो भगवान विष्णु शंख, चक्र, गदा और पद्म को
धारण करने वाले हैं और उनके लोचन कमलों के ही समान परम
सुन्दर हैं उनका वर्ण शुद्ध स्फटिक के तुल्य है और कहीं पर उनकी