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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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१३२ ६०(२ श्रीकालिका पुराण ५०(३
सुरगण जैसा भी विधाता ने कहा था वैसा ही उन्होंने चन्द्र की क्षय और
वृद्धि के लिए लोक हित के स्वरूप चन्द्रमा के अर्धभाग को देवों
सहित विधिपूर्वक अत्यन्त क्षुधित होकर शिर से ग्रहण किया था। जो
तेज परनित्य अज, अव्यय और अक्षय है उस स्वरूप वाली ही चन्द्रमा
की कला है जो प्राप्त हो गई थी।
जिस समय योगी की आनन्दज, अजर और पर ज्योति प्रवेश
किया करती है उस समय में उनका चिन्तन लीनता को प्राप्त हो
जायेगा। महादेव के मस्तक में विराजमान सुधा निधि के होने पर चित्त
की लीनता में चन्द्र के द्वारा मुक्ति हो जाया करती है। इस प्रकार से
यह वैदिकी श्रुति है। महादेव जी ने इसका ज्ञान प्राप्त करके क्षय और
वृद्धि के अनिवाकृत चन्द्र को लोकों के हित के लिए शिर के द्वारा
ग्रहण किया था। चन्द्रमा की ज्योत्स्ना के समायोजन से औषधियाँ वृद्धि
को प्राप्त हुआ करती हैं। सब औषधियों के प्रवृद्ध होने पर ही अध्वरों
की प्रवृत्ति हुआ करती है। अध्वरों के प्रवृत्त हो जाने पर देवगण
अपने-अपने भागों का परिग्रहण किया करते हैं और पितृगण बहुत से
कव्यों को ग्रहण करते हैं। अमृत ब्रह्माजी ने देवगणों के लिए बहुत
पुरातन सृजा था अब देवता लोग हव्यभाग से हीन हुये जो भी हैं वे
उसके द्वारा ही तृप्ति का लाभ किया करते हैं। यज्ञ के आयातित भी
वह ज्योत्स्नाओं से निश्चय ही वृद्धि को प्राप्त होता है और वह यज्ञों
की ज्योत्स्ना के विनाशभूत अन्यथा क्षीण हो जाया करता है।
अतएव यज्ञ के अमृत का कारण भी चन्द्रमा ही स्वयं होता है
अतएव दक्ष प्रजापति के शाप से रक्षा के लिए चिकीर्षित होता है।
आज भी कृष्णपक्ष में सुरगणों के द्वारा चन्द्र का पान किया जाया
करता है। तेज तो सूर्य देव को चला जाता है और चन्द्र का अर्धभाग
तथा उसकी ज्योत्सना भगवान् शम्भुदेव के समीप में चले जाया करते
हैं और फिर शुक्ल पक्ष में शेष कला उदित हुआ करती है। ज्योत्सना
का दूसरा भाग और द्वितीय तेज का भाग और अन्य भी शिव के
मस्तक में संस्थित चन्द्रमा से और क्रम से सूर्य के बिम्ब से चन्द्र की