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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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कला उचित होती है तब तक वृद्धि को नहीं जाती है और आदि से
प्रतिपदा तिथि है ।
इसके अनन्तर द्वितीय भाग की जो ज्योत्स्ना भगवान् हर के मस्तक
में है और जो स्थित है वह जावे और गयी हुई वह फिर आ जायेगी ।
आपके द्वारा दिन-दिन में अमृत पीने के योग्य होता है । हे सुरोत्तमो !
वह पूर्ण अन्त वाला द्वितीया आदि तिथियों से सदा ही चन्द्र स्वंय ही
उत्पन्न होगा क्योंकि वहाँ पर ज्योत्स्ना का योग होता है उसी के उसी
से उसकी समुत्पत्ति होगी । जिस प्रकार से दिन-दिन में भाग क्षण को
प्राप्त होते हैं वे अनुचित चन्द्र की वृद्धि को प्राप्त होते हैं । हे सुरो !
शुक्ल पक्ष में भी प्रतिदिन वृद्धि को प्राप्त हुआ करते हैं । सूर्य के बिम्ब
से तेज का भाग पुनः ही समागत होगा । जिस प्रकार से कृष्णपक्ष में
उसी भाँति भाग के क्रम को प्राप्त होगा । भगवान् शम्भु के मस्तक में
संस्थित चन्द्रमा से ज्योत्स्ना प्रति दिन पुनः आयेगी । सूर्य के बिम्ब से
तेजोभाग स्वयं ही अमृत की वर्षा करता है । इसी प्रकार से शुक्ल पक्ष
में चन्द्रमा की वृद्धि होगी । दोनों पक्षों में जो शुक्लत्व और कृष्णत्व के
नाम हैं वे चन्द्रमा के क्षय और वृद्धि से ही हुआ करते हैं । जब चन्द्र
वृद्धि को प्राप्त होता है तो उसे कृष्ण पक्ष पुकारा जाया करता है ।
जितने काल के द्वारा जो भाग क्षयं और वृद्धि को प्राप्त होगा उतने ही
काल को अभिव्यक्त करके वह तिथि फिर स्थित रहेगी ।
चिरकाल में वृद्धि अथवा क्षय शीघ्रता से वृद्धि अथवा क्षय को
द्रुत से अर्थात् शीघ्रता से तिथियों का सदा क्षय होता है और चिरकाल
से तिथियों में प्रवेश में वृद्धि होती है । हव्य और कव्य चन्द्रदेव के बिना
सम्भव नहीं होगा । इस कारण से उसकी वृद्धि के लिए हे देवताओं !
आप लोग चन्द्रदेव की रक्षा करें । 100 अनुमास से कला शेष चन्द्रदेव
का आस्वादन करना चाहिए । अमावस्या के अपराध काल में तो वह
पितृगणों के साथ रोहिणी के मन्दिर में रहता है । उसके ही आस्वादन
से प्रतिदिन कला की वृद्धि हुआ करती है । उस कव्य से पितृगण भी
परामृप्ति को प्राप्त होंगे । मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इसके अनन्तर सभी