कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context१२८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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(जुकाम-सर्दी) श्वास और कास से समन्वित होता हुआ भी मैथुन को
समाचरण किया करता है और श्लेष्मा (कफ) का उसी प्रकार वाला
हुआ करता है उसमें ही आपका प्रवेश होना चाहिए। जो कृष्णनाम
वाली मृत्यु की पुत्री है और आपके गुणों के ही तुल्य है वही आपकी
भार्या होवेगी जो निरन्तर ही आपका अनुगमन किया करेगी। आपका
कर्म भी यही है कि जो क्षीणता करें उसी को आप अपना विषय बना
लेवें। अब आप बहुत ही शीघ्र चले जाइए और आप चन्द्र से विमुख
हो जाइए। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस रीति से विधाता के द्वारा विदा
किया गया महान रोग राजयक्ष्मा समस्त देवगणों के देखते हुए ही
अन्तर्धान को प्राप्त हो गया था। उस महान रोग के अर्न्तधान हो जाने
पर लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने चन्द्रमा को पन्द्रह कलाओं के द्वारा
समृद्धिपूर्ण कर दिया था। फिर ब्रह्माजी ने सुता से पूत और क्षीरोद से
धौत उसके द्वारा तथा ज्योत्स्ना के सहित कलाओं के चूर्णों से पूर्व की
ही भांति चन्द्रदेव को कर दिया था। जिस समय में सोलह कलाओं से
परिपूर्ण चन्द्र पूर्व की ही भाँति शोभित था उस समय में समस्त देवगण
उसके दर्शन से बहुत अधिक प्रसन्न हुए थे। इसके अनन्तर उस पूर्ण
चन्द्र ने पितामह के लिए प्रणिपात किया था। अत्यन्त हर्षित न होते हुए
सुरों ने सभा के मध्य में संस्थित होते हुए यह वचन कहा था।
सोमदेव ने कहा-हे ब्रह्माजी! मेरे शरीर में पूर्व की ही भाँति
श्यामलता नहीं है और न तो वैसा पराक्रम ही है और न वैसा उत्साह
ही है। मेरे अंग की सन्धियाँ निषीदित हैं। मैं पहली की ही भाँति
चेष्टायें करने के लिए सुनरा अर्थात् अपने आप ही उत्साहित नहीं होता
हूँ। हे लोककृत! मैं निरन्तर चेष्टा से हीन होता हुआ किस कारण से
रहता हूँ? ब्रह्माजी ने कहा-हे सोम! यक्ष्मा के द्वारा ग्रस्त आपकी जो
अंग की सन्धियाँ हो गई हैं वे पूर्व में विकीर्ण हो गई हैं और अब वह
पूर्णता को प्राप्त नहीं है। अब इस समय में मैंने आपसे देह का चूर्ण
निकाल दिया है। राजयक्ष्मा के शरीर से अमृत की ज्योत्सना शीघ्र ही
निकाल दी है। उनके प्रक्षालन की विधि में जो लव के रूप में जल