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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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ൡ श्रीकालिका पुराण ൡ १२७
अभियुक्त अमृंतों से परिपुष्ट उसको देखकर और क्षीण हुए चन्द्रमा को
देखकर उन्होंने स्वयं ही हाथों से उसका ग्रहण करके गिरि में बारम्बार
निष्पीडित किया था और उस राजयक्ष्मों के शरीर से उस अमृत को
गालित किया था। उस समय में जो शीघ्र ही अमृत जल में गलित किए
गये थे। लोकभृत ने क्षीरसागर के मध्य में एकान्त में प्रक्षिप्त कर दिया
था। जो पहले उसके उस अमृत से चन्द्र की कलाएं क्षीण हो गयी थीं
उनके चूर्णों को क्षीरोद सागर से लव से ग्रहण किया था। राजयक्ष्मा
के संसर्ग से एक कला मात्र ही शेष वाले इसकी क्षीण हुई पन्द्रह
कलाएं जो पूर्व में अमृत से परिपूर्ण थीं वे राज्यक्ष्मा के गर्भ में स्थित
थीं और पीड़ा से तृष्णीभूत थीं वे ज्योत्स्ना के अमृंतों से जो कलपापति
का निबद्ध शरीर था वह राजयक्ष्मा के गर्भ में स्थित तीन प्रकार का
हो गया था।
वह ज्योति से परिपूर्ण हो गया था और ज्योत्स्ना राजयक्ष्मा में लीन
हो गई थी और रोग के गर्भ में स्थित सम्पूर्ण सुधा द्रवीभूत हो गई थी।
जिस समय ब्रह्माजी ने राजयक्ष्मा के अन्तर से सुधा को निर्गलित किया
था उस समय समस्त ज्योत्स्ना सुधा की ज्योति उससे बहिर्गत हो गई
थी। उसी समय विधाता के द्वारा वह सम्पूर्ण क्षीरोद सागर में प्रक्षिप्त
कर दी गयी थी। उन देवों को उस पर्वत में परित्याग करके वह स्वयं
वहाँ से शीघ्र ही गमन कर गये थे। इसके उपरान्त कलापूर्ण अमृंतों का
जल से प्रक्षालित करके उन तीनों को ग्रहण करके शीघ्र ही ज्योत्स्ना
का भी प्रक्षालन करके उस गिरि पर समागत हो गए थे। उस समय
विधाता क्षीरोद से चन्द्रभाग पर्वत पर पहुँचकर देवों के मध्य में
ज्योत्स्ना कलाओं के चूर्ण में प्रवृष्टि हो गयी थी। ब्रह्माजी ने उन तीनों
को संस्थापित करके वे देवों के मध्य में संस्थित हो गए थे। उसके स्थान
आदि के विषय में निर्देश करते हुए उन्होंने राजयक्ष्मा से कहा था।
ब्रह्माजी ने कहा—हे राजयक्ष्मा ! जो सर्वदा ही रात दिन व सन्ध्या
के समय में वनिता में रत रहा करता है और उसमें सुरत को सेवन
किया करता है वहाँ पर ही आप निवास करेंगे। जो प्रतिश्याय