कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context१२६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-इस प्रकार से उसके वचन का श्रवण
करके उस समय में प्रजापति के उन सुरगणों से हृदय के शल्य का
उद्धार करते हुए बोले। दक्ष प्रजापति ने कहा-जो मेरा वचन निशानाथ
चन्द्र में शाप का व्यसन कर प्रवृत्त हुआ है उसको किसी भी निदान के
द्वारा मैं मिथ्याभूत करने का उत्साह नहीं करता हूँ। किन्तु मेरा वचन
एकान्त रूप से जिससे वृथा न होवे और चन्द्र भी बढ़ता रहे, जिससे
वही उपाय देखिए। उसमें भी एक उपाय है कि जो चन्द्रमा मास के
आधे भाग में क्षय और वृद्धि को प्राप्त होकर भार्याओं से समान बर्ताव
करे। उस प्रजापति को प्रसन्न करके उसके उस वचन का श्रवण करके
समस्त देवगण वहाँ पर गये थे जहाँ पर चन्द्रमा रहता है। हे द्विजो! दक्ष
मुनि के द्वारा इस प्रकार से वचन के कहने पर इसके अनन्तर उस समय
में भार्याओं के सहित चन्द्रमा का समाधान करके वे परम प्रसन्न सुरश्रेष्ठ
ब्रह्माजी के भवन में गये थे। हे महाभागो! वहाँ पर पहुँचकर जैसा दक्ष
प्रजापति ने कहा था वह सभी परमात्मा ब्रह्माजी से उन्होंने कह दिया था।
उस समय में ब्रह्माजी देवों के मुख से दक्ष प्रजापति के वचन का
श्रवण करके वे फिर सब सुरों के साथ चन्द्रभाग नामक पर्वत पर जो
कि एक महान् पर्वत था वहाँ चले गये थे। वहाँ पर सुरों के श्रेष्ठ ने
जाकर प्रजाओं के हित की कामना से वृहल्लोहित पुष्य में चन्द्रदेव को
स्थापित कर दिया था। उस सरोवर में स्नान करने वाले जन्तु को
निरोगता हो जाया करती है। बृहल्लोहित नाम वाले सरोवर में स्नान
करने से प्राणी चिरायु अर्थात् बड़ी उम्र वाला हो जाया करता है। वहाँ
पर स्नान किए हुए चन्द्र के शरीर से उसी क्षण में रोग निकल गया था
जिसका नाम राज्यक्ष्मा था जैसा कि पूर्व रूप कहा गया है। राज्यक्ष्मा
भी निकलकर जगत् के पति ब्रह्माजी को प्रणाम करके उससे बोला था
कि मैं क्या करूँगा और कहाँ पर जाऊँगा। क्योंकि आप इस सम्पूर्ण
जगत् के सृजन करने वाले हैं अतएव हे लोकेश! मेरा सनातन
कृत्य-स्थान और पत्नी को मेरे ही अनुरूप निर्देश कीजिए।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर चन्द्रमा के शरीर में स्थित