कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context१२२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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है तो वह कभी भी इनके आगे स्थिति वाला नहीं हुआ करता है। वह
किसी समय में भी देवों के समाज में अथवा आप के समीप में उपस्थित
नहीं हुआ करता है।
वह किसी समय भी रोहिणी का त्याग करके वहीं पर भी गमन
नहीं किया करता है। यदि कोई भी अन्य नहीं होता है तभी चन्द्र बाहर
जाया करता है। वह चन्द्र समस्त कलाओं से हीन केवल एक ही कला
वाला रह गया है अर्थात् केवल एक ही कला उसमें शेष रह गई हैं।
हे लोकों के ईश! यही सर्वत्र लोक में कर्म का विपर्यय प्रवृत्त हो रहा
है। तात्पर्य यही है कि सभी कर्म विपरीत हो रहे हैं। यह ऐसा है उसको
देखकर हम सब कान्दिशीक हो रहे हैं अर्थात् किस ओर जावें, ऐसे
कर्त्तव्यविमूढ़ होकर हम सब आपकी ही शरणागति में प्राप्त हुए हैं।
जब तक पाताल लोक से उठकर काल कञ्जरादि असुर हे लोकेश्वर!
हमको बाधा पहुँचाते हैं तब तक आप भय से हमारी रक्षा कीजिए। यह
जगतों का अतिक्रम किस कारण से हो गया है यह हम नहीं जानते हैं।
इस विप्लव का क्या कारण है यह भी हम नहीं जानते हैं। मार्कण्डेय
मुनि ने कहा-दिव्यदर्शी पितामह ब्रह्माजी ने देवों के इस वचन का
श्रवण करके एक क्षण पर्यन्त ध्यान करते हुए सुरोत्तम से कहा-ब्रह्माजी
ने कहा हे देवताओं! जिस कारण यह लोकों का विप्लव हो रहा है
उसका आप श्रवण करिए। देव सोम ने दाक्षायणी सत्ताईस संख्यावाली
अश्विनी आदि का श्रेष्ठ वधू के रूप में भार्या बनाने के लिए उनके
साथ परिणय किया था।
उस सोम ने उस सबके साथ परिणय करके वह चन्द्र केवल
रोहिणी में ही निरन्तर अनुराग से प्रवृत्त हुआ था और अन्य सब में यह
अनुराग नहीं किया था। वे सब अश्विनी आदि कन्यायें ज्वर से
प्रपीड़ित थीं। वे छब्बीस वर आरोहण वाली कन्यायें पिता के समीप
में आ गयी थीं। जिस प्रकार से निशानाथ अनुराग से रोहिणी में प्रवृत्त
होता रहता है उस भाँति उन सबका सेवन नहीं किया करता है। यह
सब उस प्रजापति दक्ष से निवेदन कर दिया था। इसके अनन्तर महा