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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १२३
बुद्धिमान दक्ष ने सोम के द्वारा चन्द्रदेव की स्तुति करके और बहुत
अधिकासूनृत वचनों से सम्भाषण करके अपनी पुत्रियों के लिए
अनुरोध किया था। तब महात्मा के द्वारा अनुरुद्ध होकर चन्द्र ने उन
सब में समान ही प्रवृत्त होने की प्रतिज्ञा की थी। चन्द्रदेव ने उन सबमें
समान भाव रखने की बात स्वीकार करने पर वह मुनि श्रेष्ठ दक्ष भी
अपने निवास स्थान को चला गया था। उस मुनि श्रेष्ठ दक्ष प्रजापति
के चले जाने पर चन्द्र ने उनमें विषमभाव का त्याग नहीं किया था और
वे फिर निरन्तर क्रोधित होकर अपने पिता के समीप में गई थीं।
इसके अनन्तर पुनः दक्ष ने दूसरी सुताओं के विषय में अनुरोध
किया था और समान व्यवहार रखने की प्रतिज्ञा कराकर उसने यह
वचन कहा था कि हे चन्द्र! यदि आप समान व्यवहार नहीं करेंगे और
आप यदि इन सब ही में अनुराग न करेंगे तो मैं आपको शाप दे दूँगा।
इस कारण से जो समुचित हो वही आप व्यवहार सभी के प्रति करिए।
इसके उपरान्त दक्ष के चले जाने पर उस चन्द्र ने समान बर्ताव नहीं
किया तो पुनः दक्ष के समीप में जाकर क्रोध के साथ कहने लगीं। वह
चन्द्रदेव आपके कथित वचनों का सत्कार नहीं करते हैं और वे हम
सबमें प्रवृत्त नहीं होते हैं अर्थात् हम सबका सेवन अभी भी नहीं किया
करते हैं। अतएव अब हम सब तपश्चर्या करेंगी और आपके ही समीप
में स्थित रहा करेंगी। अपनी उन पुत्रियों के इस वचन का श्रवण करके
महामुनि दक्ष परम क्रोधित हो गये थे और फिर चन्द्रदेव के क्षय करने
के लिए शाप देने को उत्सुक हो गये थे। हे महामुने! शाप देने के लिए
उद्यत मन वाले और महान कुपित हुए उन दक्ष प्रजापति की नासिका
के अग्रभाग से क्षय नाम वाला एक महान रोग निकल पड़ा था। उस
महारोग को चन्द्रदेव के लिए प्रेरित कर दिया गया था जो कि मुनिवर
दक्ष के ही द्वारा भेजा गया था। वह महारोग चन्द्रदेव के देह में प्रवेश
कर गया था और उसने चन्द्र को क्षयित कर दिया था।
चन्द्रमा के क्षीण हो जाने पर महात्मा की ज्योत्स्ना ( चाँदनी ) भी
क्षय को प्राप्त हो गयी थी। ज्योत्सना के क्षीण हो जाने पर समस्त