कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ १२१
इच्छानुसार गमन करने वाले बनाकर और अपने विषय में विन्यस्त
करके आज से आप लोगों को परम दुःखित कैसे देख रहा हूँ ? जो भी
कुछ आप लोगों के दुःख का बीज अर्थात् हेतु होवे अथवा जो भी कोई
आप लोगों को बाधा पहुंचाता होवे वह सभी आप लोग पूर्ण रूप से
मुझे बतलाइए और यही समझ लीजिए कि वह आपका कार्य सिद्ध हो
ही गया है अर्थात् उसका मैं निवारण करके आपको सुख सम्पन्न ही
बना दूँगा, इनमें कुछ भी संशय न समझें। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके
अनन्तर वृद्ध श्रवा, जीव और लोकों का भरण करने वाले कृष्णवर्मा
ने उन ब्रह्माजी से देवों के दुःख का कारण बतलाया था।
देवों ने कहा-हे जगत् की रचना करने वाले! आपके समीप में
जिस कार्य के सम्पादन के लिए हम लोग समागत हुए हैं उनका आप
श्रवण कीजिए जो कि हम लोगों के दुःख का बीज है और जिसके होने
से हम सब लोग म्लानश्री वाले हो रहे हैं। हे पितामह! कहीं पर भी
लोक में यज्ञ सम्प्रवर्तित नहीं हो रहे हैं अर्थात् कोई भी किसी जगह पर
लोक में यज्ञ नहीं कर रहे हैं। समस्त प्रजा इस समय निरातंक और
निराधार होकर क्षय को प्राप्त हो रही है। भूमण्डल में न तो कोई दान
देता हैं और न कोई धर्म सम्बन्धी कर्म करता है, न तप है अर्थात् कोई
भी तपस्या भी नहीं कर रहा है। मेघ लोक में वर्षा नहीं करते हैं, समस्त
पृथ्वी क्षीण जल वाली हो गयी थी। सभी औषधियाँ क्षीण हो गयी हैं
शस्य भी क्षय को प्राप्त है और लोक सभी समाकुल हैं। विप्रगण
दस्युओं के द्वारा पीड़ित होते हुए वेदों के बाद में नियत नहीं हो रहे हैं।
अन्न की विकलता को प्राप्त करके बहुत-सी प्रजा मर रही है। यज्ञ
भोगों के क्षीण हो जाने पर हम सभी लोग भोगने के योग्य पदार्थों से
हीन हो रहे हैं। हम बहुत ही दुर्बल हो गए हैं और हमारी कान्ति नष्ट
हो गई है। हम कहीं पर भी शान्ति की प्राप्ति नहीं कर रहे हैं। चन्द्रदेव
तो रोहिणी के ही मन्दिर में सदा वक्रगति से चिरकाल पर्यन्त स्थित रहा
करते हैं और वृष राशि के वह क्षीण होकर ज्योत्सना (चाँदनी) से हीन
रहते हैं। देवी के द्वारा जिस समय में भी चन्द्र का अन्वेषण किया जाता