कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context१२० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
नदी की ही भांति क्षय रोग को प्राप्त होने लगा था। इसके अनन्तर उस
चन्द्र के क्षीय माण हो जाने पर समस्त औषधियाँ क्षय को प्राप्त हो
गयीं थीं। उन औषधियों के क्षय को प्राप्त हो जाने पर यज्ञ नहीं प्रवृत्त
होते थे। यज्ञों का अभाव हो जाने से देवों का सब अन्य भी क्षय को
प्राप्त हो गया था। तब तो सभी मेघ नष्ट हो गये थे और वृष्टि का
एकदम अभाव हो गया था अर्थात् फिर वर्षा नहीं हुई थी। जब वृष्टि
का ही अभाव हो गया तो लोगों के व्यवहार क्षीण हो गये थे। हे
द्विजोत्तमो! दुर्भिक्ष (अकाल) और उसके कारण से होने वाले व्यसन
(दुःख) से समस्त रोग हो गये थे। तब तो लोगों का दान देना और
धर्म के कृत्य करना सभी कुछ लोक के लिए प्रवृत्त नहीं होता है।
समस्त प्रजा सत्त्व से हीन हो गयी थी और सब लोभ से उपहत इन्द्रियों
वाले हो गये थे। वे सभी प्रजायें कुकर्मों में रति रखने वाली हो गई
थीं तथा सभी सागर और ग्रह भी क्षुभित हो गये थे। इसके अनन्तर
जगत् को अधिक व्याकुल और दस्युओं (चोर लुटेरों) से प्रपीड़ित
देखकर चन्द्र को अपना नायक बनाते हुए सब देवगण ब्रह्माजी के
समीप में गये थे।
इस सृष्टि की रचना करने वाले, जगतों के स्वामी देवेश्वर ब्रह्माजी
के पास पहुँचकर उन्होंने उनको प्रणाम किया तब वे सब यथोचित
स्थानों पर उपविष्ट हो गये थे। लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने सब देवों
को मलिन मुख वाले देखकर जो कि ऐसे प्रतीत होते थे मानों किसी
दूसरे के पराभूत हैं और अपने विषयों को अपहृत किए हुए से दिखाई
पड़ रहे थे। तब तो ब्रह्माजी ने देवों के गुरु बृहस्पति इन्द्र और अग्नि
को आमने सामने बिठाकर उनसे पूछा था। ब्रह्माजी ने कहा हे देवगणों!
आपका मैं स्वागत करता हूँ अर्थात् आपका यहाँ पर समागम परम शुभ
मानता हूँ। आप लोग अब यह बतलाइये कि आप सब किस प्रयोजन
को सुसम्पन्न करने के लिए यहाँ आये हैं? मैं देख रहा हूँ कि आप
सभी लोग किसी महान दुःख से उपहृत देहों वाले हैं और आप अधिक
म्लान हो रहे हैं। आप सबको बाधाओं से रहित, आतंक से हीन तथा