कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context௵ श्रीकालिका पुराण ௵ ११९
अतीव दुःख से व्याकुल इन्द्रियों वाली इस प्रकार से स्थित उन सबको
देखकर अत्यन्त दीन मुख वाले प्रजापति कोप से वह्नि के ही समान
ज्वलित हो गये थे। इसके अनन्तर कोप से व्याप्त महात्मा दक्ष की
नासिका के अग्रभाग से बहुत ही भीषण यक्ष्मा निकल पड़ा था। वह
यक्ष्मा दाढ़ों से कराल मुख वाला था और कृष्ण वर्ण वाले अंगार के
समान था वह बहुत ही लम्बे विशाल शरीर वाला था उसके केश बहुत
ही थोड़े थे वह अतीव कृश और धमनियों से संतत था।
उसका मुख तो नीचे की ओर था, उसके हाथ में एक दण्ड था,
वह विश्राम करके निरन्तर कास (खाँसी) को करता जा रहा था,
उसके नेत्र नीचे की ओर बैठे हुए थे तथा वह स्त्री के साथ सम्भोग
करने के लिए अत्यन्त लालायित रहता था। उस यक्ष्मा ने दक्ष प्रजापति
से कहा था- हे मुनि! मैं अब किस स्थान में स्थित रहूँगा अथवा मुझे
क्या करना होगा? हे महामते! आप मुझे यह अब बतलाइए। तब तो
प्रजापति दक्ष ने उस यक्ष्मा से कहा था कि आप बहुत शीघ्र सोमदेव
के समीप में जाइये। आप सोमदेव का भक्षण करिये और उसी सोम
में स्वेच्छा से सदा संस्थित रहिए। मार्कण्डेय ऋषि ने कहा- इसके
अनन्तर महामुनि दक्ष के इस वचन को श्रवण करके वह धीरे-धीरे
सोमदेव के समीप गया था और वह सोम का गद (रोग) ही था। उस
समय में वह सोम के समीप में इसी भाँति प्राप्त हुआ था जैसे सर्प
अपनी बाँबी में प्रवेश किया करता है। वह महागद अर्थात् विशाल रोग
चन्द्रमा के हृदय में छिद्र की प्राप्ति करके प्रवेश कर गया था। उस
दारुण राज्यक्ष्मा के उस सोम के हृदय में प्रविष्ट हो जाने पर चन्द्रदेव
मोहित हो गये अर्थात् उनको मोह हो गया था और वह बहुत बड़े विषम
तन्द्र को प्राप्त हो गया था। क्योंकि यह रोग प्रथम उत्पन्न होकर उस
राजा में लीन हो गया था। हे द्विज! इस कारण से उस रोग की लोक
में 'राजयक्ष्मा' इस नाम से प्रसिद्धि हो गयी थी।
इसके अनन्तर वह सोम (रोहिणी का पति) उस राजयक्ष्मा नामक
रोग के द्वारा अभिभूत हो गया था और वह प्रतिदिन ग्रीष्म ऋतु में क्षुप्र