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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ११५
कीजिए। जो पुरुष बहुत सी दाराओं वाला हो और राग के वशीभूत
होकर उनमें से किसी भी एक ही स्त्री का सेवन किया करता है वह
पाप का भागी होता है और स्त्री के द्वारा जित भी हुआ करता है तथा
उसका अशौच सनातन अर्थात् सर्वदा ही बने रहना वाला हुआ करता
है। हे विधो! स्त्रियों को जो स्वाम्य सम्भोगज दुःख हुआ करता है उस
दुःख के समान अन्य कोई भी दुःख नहीं हुआ करता है। जो पुरुष परम
सती और ऋतुकाल वाली पत्नी का संग नहीं किया करता है, ऋतुकाल
के शुद्ध होने पर भी उसके संग से रहित होता है, वह भ्रूण ही होता
है। भ्रूण गर्भ में रहने वाले शिशु को कहते हैं।
जितने समय तक भार्या आत्रेयी होती है उतने ही समय पर्यन्त
निबोधन है। उस भार्या संग में कुछ विहित का आचरण न करना
चाहिए। बहुत-सी भार्याओं वाले पुरुष का जो ऋतुकाल के मैथुन का
विनाश है वह शास्त्र के द्वारा भी कथित कुछ भी कर्म नहीं होता है।
विधि के साथ विवाहित भार्याओं का निरन्तर तोष करना चाहिए।
अन्य प्रकार से कल्याण करने वाले पुरुष का भी उन भार्याओं की
तुष्टि से कल्याण होता है। भार्या के द्वारा तो भर्त्ता सन्तुष्ट हो और भर्त्ता
के द्वारा भार्या संतुष्ट होवे, जिस कुल में यह नित्य ही होता है वहाँ पर
निश्चित रूप से ही कल्याण रहा करता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं
है। सौभाग्य के मद से अहंकार वाली जिस पत्नी के द्वारा सपत्नी का
संगम करने के लिए भर्त्ता का विरोध किया जाया करता है वह स्त्री
दूसरे जन्म में वैश्या हुआ करती है और उसको अधर्म भी होता है। ऐसी
स्त्री का तथा पिता का कुल दोनों ही प्रसन्न नहीं हुआ करते हैं। पति
के विरुद्ध मान होने पर जो सपत्नी के साथ प्रवृत्त होता है उस
अकल्याण करने वाले दोनों को ही अधिक दुःख हुआ करता है।
मार्कण्डेय ऋषि ने कहा-इस रीति से उनके द्वारा बहुत अधिक
कठोर वचन कहने पर चन्द्रमा रोहिणी के मुख की कान्ति को मलिन
देखकर बहुत ही अधिक कुपित हुए थे। उस समय में रोहिणी ने भी
उन सबकी उग्रता को बारम्बार देखकर वह भी भय, शोक और लज्जा