कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
by युगल आनंद विहारी
Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)
About this granth
Kabir Krishna Gita (कबीरकृष्णगीता) is a Kabirpanthi text in which Krishna and other Puranic figures proclaim the greatness of Kabir and of the True Name (satyanam). Its title page calls it the first volume of the Kabir Darshan Granthamala, compiled by Swami Yugalanand Vihari, 'Bharat Pathik', associated with the Hazuri Mahant Shri Yugaldas of Kabir Dharmanagar and known for restoring Kabirpanthi texts.
Its episodes include the court of Dharmaraja, the glory of the True Name, the story of King Chhatrajit, a dialogue between Narada and Krishna, Yama's messenger questioning Krishna about a devotee of Kabir, accounts of Satyaloka, the soul and Niranjan, the play of Kal and the way to escape it, a dialogue of Niranjan and Vishnu, Shukadeva's many births, King Nirmoh, the marks of a true guru, the Pandavas with Krishna, the sage Kapila, Vyasa asking Kabir to show him Satyaloka, and the way across the Kali age.
The book is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai; the copy scanned is the edition of September 2015. Its 168 pages help readers understand the Kabirpanth's own mythology and cosmology.
निरंजन और त्रिदेवका सम्वाद - शिवादिदेवका कोप करना
कबीरकृष्णगीता ।
७५
जीव सोहंग रमता थिर करता। भंरा खाली कर खाली भरता ॥
सत्यनाम सब मँहैं सोइ न्यारा । सोइ परम गुरु भो कंडहारा ॥
सत्यनाम सड़ुरु कहाये । पुन गुरु तात मात बंधु भाये ॥
दोहा--सकल समाये रहै सो, प्रगट होइहिं जहैं सांच ॥
विष्णु व्यास सुखदेव कहैं, सांच बिना जिव कांच ॥
सांच सोई जो विनशे नाही । जठर योनि नहिं आवे जाई ॥
जब यम जीव कहैं सांसत कीन्हा । जीव पुकारे सड़ुर लीन्हा ॥
कस जिव अघ पतसे बहु जाभी । अमरलोक अम्बरपति स्वामी ॥
कहि जो कियऊं ताहुपर जाऐ । सत्यनाम सो जरत उबारे ॥
तत्क्षण प्रगट भये सतनामा । कालहिं मार बिंधसेउ धामा ॥
स्वास निकसतन सुन्य कहाया। काल भेट सुन्यकार बसाया ॥
दाना भीर राखेउ यहि लागी । बिना पयोद दाम न पागी ॥
सत्यनाम सोइ सत्यकबीर । जोगजीत है काल बधीर ॥
दोहा--बंदीछोर कबीर प्रभु, राम अछाह कबीर ।
प्रथम विष्णु मिल धायके, कबीर राज दिये थीर ॥
ब्रह्मा पत्री कर ढुम साली । सत्यकबीर कुल विष्णु अमाली ॥
शब्दवेदके मते जो चलि है । ताके त्रास काल महि खिलि है ॥
वेद पुराण कुराणकी बात । विरला सैल निरख मग जाता ॥
गुरु साधु सो होय अधीना । सेवा सबके स्वामी चित दीन्हा ॥
सबन मथनके देख परेखा । स्वामी सत्यकबीर अलेखा ॥
विष्णु व्यास अज कृष्णउचारा । सत्यकबीर जिव तारन हारा ॥
७६
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा—सबके मटुक कबीर गुरु, बिन कबीरकुछ नाहिं ।
सुरत स्वास सुख संतत, सो कबीरके छाहिं ॥
अविचल स्वाधी परख कबीरा । महाकालको मस्तक चीरा ॥
कहैं कृष्ण कबीरसे वैना । निस दिन दरश देहु भर नैना ॥
गुप्त प्रगट हरदम देहु दर्शन । सवहि पदरस प्राप्त गुरु प्रशन ॥
दरश परस मम हिय रहु भिनी । कृष्ण कबीर कहैं बिनती कीन्ही ॥
आये कबीर कृष्णके सीसा । ताप गई शीतल हर दीसा ॥
जबलग रहे कबीर डर माथा । तबलग कृष्ण सो रहे सनाथा ॥
जबहिं कबीर गुप्त होय जाहीं । तब गोपाल पथ पितु जे माहीं ॥
पितु जननी धर्मराय भवानी । ताके छाया अनित चलानी ॥
चलहिं अपंथ जो विष्णु सयाना । तब पितु काल बांध सिरहाना ॥
वार अनेक विष्णुहिं यासे काला । तबहिं विष्णु औ सब बेहाला ॥
तब कबीरके शरण समाये । कबीर शरण जग त्रास नसाये ॥
नगद पंथ निरगुण कबीरा । सरगुण जानहु भर्म खोगीरा ॥
सरगुण तीरथ व्रत भ्रम पूजा । पुन सरगुण काया यह दूजा ॥
निर्गुण एक कबीर अधिनाशी । ब्रह्म बोलता सब घट वासी ॥
बहु निर्गुण वरणो अब नीरा । दुस्वित निरवान सकल शरीरा ॥
नीर कबीरको अंस बखाना । शीतल नीरसो साधस ज्ञाना ॥
नीर बिना नहिं जीवे प्राणी । नीर सकल शरीर निसानी ॥
अन्ननेत औ तरवर चीना । कंद मूल फल दल बिनहीना ॥
दल पानी करुनाम बखाना । दल देव भाषा जल नर जाना ॥
कवीरकृष्णगीता ।
७७
पानी नीर उदक अंभु वारी । जल कह जले नीर संसारी ॥
दोहा-नीर कवीरहिं मिल गया, अंतर रहा न रेख ।
तीनों मिल एके भया, नीर कवीर अलेख ॥
जाके होय सत्तके जोरा । सो गुरु करे कवीर वंदीछोरा ॥
जो पुन दया सत्तके हीना । तिन भज त्रिगुण देवी पंथ लीन्हा
त्रिगुण मता देवी सरगुण संसारी ॥ निर्गुण सत्यकवीर जिवतारी ॥
नीर बिना नहिं पण पछली । महि बिना कोइ बैठे न चली ॥
सो महि मीन रूप स्थापा । मीन भषहिं बड लागहि पापा ॥
मीन एक गौ द्विज शत कोटी । तिल भर मीन नरकके कोटी ॥
महादेववचन ।
कोध महादेव वचन उचारा । विनामीन नहिं मातु अहारा ॥
अष्टंगविवचन ।
उठ अष्टंगी सबहिं बुझावा । कक्षप सूकर महादेव खावा ॥
मैं तो आद निरंजन बामी । हमरी प्रत को श्रवण प्राणी ॥
एक दिन जो कोइ तिलभर खाई । पुरुषा सहित सो नरक सिधाई ॥
हम तो विष्णु ब्रह्मा शिव माता । एक दिन मम कामन राता ॥
ब्रह्माहु मम वचन नसाये । तुमहु शिव नीके बरताये ॥
विष्णु भागि गो साधुन संग । खाहिं मीन हम तेहि नहिं संग ॥
हमहू मीन खाय अघ बूढे । मांस खाय अघ सुडे बूढे ॥
जल शिव सभा माहिं हम हारा । तुरत भरम होहु आप हमारा ॥
भयउ भरम शिव बहुरि जियाय ॥ सर्व जीवके तेहि मीन खवाया ॥
७८
कबीरकृष्णगीता ।
मीन खवाय ज्ञान हर लीन्हा । प्रेतक ईस महादेव कीन्हा ॥
ब्रह्मा कहा जननी परखावा । औरहिं ब्रह्म ज्ञान बतलावा ॥
ब्रह्माहि बधुपुन तुरत जिआवा । मीन मांस भर सुरा खवावा ॥
ब्रह्मा कहैं तब कीन्हेट प्रेता । द्विज तन जगत भेष धर केता ॥
प्रेत अंस औ नौ गृह अंसा । भाषि हैं सखा तुव मांस परसंसा ॥
विष्णु जननी कहैं सीस नवावा । मैं बालक माते बरतावा ॥
भई विष्णु पर मात दयाला । कबीरके हांथ देवाइव माला ॥
कहे अघा कबीरसे रोई । विष्णुहिं चांप सके नहिं कोई ॥
दोहा—ब्रह्मा शिव एक मत भये, विष्णुहिं करिहैं उदास ।
तोहि शरण कबीर हरि, राखि लेहु यहि पास ॥
तुमका अघा सौपहु आज्ञ । हरिकर कीन्ह प्रथम हम काज् ॥
विष्णु साधुकी संगत कीन्हा । ताते हम विष्णुहिं चित दीन्हा ॥
साधु सनेह औ गुरुके सनेही । कबहुँ दोष नहिं आवे तेही ॥
तुमहू अघा सेवहु साधू । गुरुकर मिटे काल उपाधू ॥
सहस्रसुखी सिखवन मान हमारी । हमरी सुरत ध्यान चित धारी ॥
एक काल निरंजन राई । बांचहि हमरे हुकुम चलाई ॥
अष्टंगीवचन ।
कहे अष्टंगी हम तुव चरी । तुम्हरे शरण जीव सब करी ॥
दोहा—सुरतके चौका सर्वारके, दीन्ह अष्टंगी पान ।
आद कला सो लोक गई, कीतम अंस सब जान ॥
सत्यकबीर प्रमारथ बोले । कबीर प्रताप सबे पक्ष खोले ॥
कृष्णको निरंजन शिवके कोपसे बचानेके लिये कबीरका प्रकट होना
कबीरकृष्णगीता ।
७९
जापर दया करहिं सतनामा । सत्यनाम सो कबीर सुखधामा ॥
सत्यकबीरकी जापर दया । सत संतोष दया तहैं छाया ॥
कबीर सुवास फूल तिल संसीरा ॥ सत्यकबीर घृत जग तम हीरा ॥
कबीर अभी विष राय निरंजन । तारहिं कबीर काल शिरभंजन ॥
दोहा—कैसो अधीन अगाध होय, जो गुरु करी कबीर ।
विष्णु व्यास सत कहतहैं, तेहि छूटे भोजलपीर ॥
कबीरके सुमरे पाप नसाई । कबीरके भजे यम निकट न जाई ॥
अजहरवचन ।
अजहर विनवे दोइ कर जोरी । श्रीकृष्ण सुन विनती मोरी ॥
कहु सोहंग कर मूल बखानी । कासो भये सोहंग उत्पानी ॥
निराकार अद्या पितु माता । तिनतो कीन्हा सोहंग घाता ।
मात पिता घाती नहिं होई । गुरु साध घाती नहिं कोई ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन रुद्र वियोगी । तुव समान नहिं जगमा जोगी ॥
सो तुम आद सोहंग न चीन्हा । हम तो आद सतनाम गहि लीन्हा ॥
सत्यनाम जग प्रगट कबीर । स्वासा सोहंग अंस सत धीर ॥
अमर कबीर अमर सतलोक । अंस सोहंगम कबीर निहसोका ॥
शिववचन ।
कहैं शिव जो कबीर करतारा । मम बल जीतहिं तो हम हारा ॥
दोहा—वाठे शिव आकाश लहि, कीन्ह कृष्ण पर धाव ।
विष्णु कबीर पुकारहौं, कबीर प्रगटे तेहि ठांव ॥
८०
कबीरकृष्णगीता ।
भयउ सुगंध महा घन घोरा । भयउ अंजोर भाग चल चोरा ॥
लिंग समेट गदहा होइ भागा । तबहिं विष्णु शिव गोहने लागा ॥
फिर शिव देख कहा बल भयऊ । कबीरके त्रास गदहा होयगयऊ ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर हरि आव सिंहसन । विष्णो झोह हीन भक्ष डासन ॥
प्रेत पिशाच भूत रखवारे । तासो बंजनी कहा हमारे ॥
हमरे साथ भजन सतनामा । भूत पिशाच घोर अघकामा ॥
साधनका जो दुखावे आई । आपन बल करे नाम सुहाई ॥
हमरे नाम सुरत चित गहहू । सकल समयस्तो निर्भय रहहू ॥
प्रथमहिं सिंध मथन तिहुं लरऊ । कबीर प्रताप तहाँ निश्तरऊ ॥
ब्रह्मा शिव देवी कर दूता । कहैं विष्णु भोहि दुखावे बहुता ॥
सत्यकबीर एक तुव प्रतापा । कालहिं जीत भक्त स्थापा ॥
दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, हम तोहि सदा सहाय ।
सुमरे नाम जो मेरो, और सतपंथ चलाय ॥
त्रिगुणके पिता निरंजन ऐठा । पुनहिं पाप करावे वैठा ॥
पुण्य पाप नहिं नाम समाना । साधुसेवा गुरु भक्त प्रणामा ॥
दोहा—कहैं कबीर कृष्ण सुन, साधु सरूप है राम ।
विष्णु साधु सरूप गुरु, गुरु सरूप सतनाम ॥
बहुरि शंभु सनकादिक आये । ब्रह्मा अवागन ससुझाये ॥
यहां कबीर कृष्ण सतरूपा । अंतर दीन्ह दर्श नहिं भूपा ॥
एक वार शिव बरस अंगारा । सब अंगारपर रुद्र कपारा ॥
सनकादिका शिवका जिलानेके लिये प्रार्थना करना
कवीरकृष्णगीता ।
८१
जरा जरे बांच लट तीनी । बहुर कवीर भस्म तेहि कोन्ही ॥
तब अज सनकादिक चल भागी । तबहींके तन लूक सो लागी ॥
तब सनकादिक विष्णु पुकारा । विष्णु कहा सुमरहु करतारा ॥
कवीर बस्ते तो बांचहु झारा । सबके मूल कवीर करतारा ॥
सनकादिकमचन ।
कहैं सनकादिक राख कवीरा । ज्वाला छुटा भौ निर्धल शरीरा ॥
तब सनकादिक स्तुति कीन्हा । सत्यकवीर कहा सब चीन्हा ॥
सनकादिक तन तपके पूजा । हीरा विष्णु रुद्र अज गुंजा ॥
दोहा—सत्यकबीरके पगु परे, सनकादिक बिलखाय ।
अब तो बरुसहु चक्र प्रभु, रुद्रहि देहु जिआय ॥
सरजिव कीन्ह कवीर दयाला । चक्षुहीन जपु सुंडके माला ॥
रुद्र आंखके भा रुद्राक्षा । आपन चक्षु आप शिववाक्षा ॥
बहुर चक्षु कवीर कर दीन्हा । आद सिरसापन दैवे लीन्हा ॥
तुम तीनों भई हर सरदारा । रहियो विष्णुके आज्ञाकारा ॥
तबते रुद्र कवीरहिं चीन्हा । रहियो सेवा विष्णु अधीना ॥
छांठ धुरत मत जोग अराधा । भांग धतूरा माहुर साधा ॥
गगन ध्यान मन जोत प्रकाशा । परम जोत दिन मुक निरासा ॥
परमजोत सत्यनाम कवीरा । जोत निरंजन काल अहीरा ॥
सत्यकबीर गुप्त होय गयऊ । सनकादिक हर पूछे लियऊ ॥
कहिये विष्णु कबीरके माहिभा । हम बहु माना कबीरके सीमा ॥
कहैं हरि तुव मानिक होई । सत्यकबीरके यम डर रोई ॥
सुनहु आदके बात गोसाई । जबते हम कवीर लाखि पाई ॥
सनकादि और विष्णुका सम्वाद - वेदादिकी उत्पत्ति
८२
कबीरकृष्णगीता ।
प्रथमहि सतयुग यम मोहि जारो । निराकार यम पिता हमारो ॥
तीनों देव औ कोट तैतीसा । सबकहैं जार भ्रम कर पीसा ॥
जीवहिं कब दीन्ह बहु काला । तहाँ भगट सतपुरुष दयाला ॥
जिन सब जीव सोंप धर्मराई । सो सत्यनाम कबीर सुखदाई ॥
महाभयंकर काल निरंजन । धर्म अजाजिल वंस अंजन ॥
अजाजील धर्मराय लखाये । आप काल करता कहलाये ॥
कहइ रक्षाके भक्षक ताहीं । ध्रुव प्रह्लाद अजहु पछताहीं ॥
भक्ष करे जिव चांपे काला । जार बार करे निपट बेहाला ॥
राम कहे सत कहे नरेशा । सत्यनाम विन कागके भेषा ॥
दोहा-धुनकट कौसे अंस भरी, सप्रथ सत्यकबीर ।
पतिव्रता गंगा गती, वण्ड्य व्यास रघुवीर ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण प्रगटे सतनामा । सत्यकबीर जोगजीत सुखके धामा ॥
हने सीस मम पितुके अनंता । जार भ्रम किय यमहिं तुरंता ॥
सत्यकबीर आजा मैं नाती । कबीर दुलहा हम सबहि बराती ॥
कालहिं जार भ्रम यम साखा । दान कदसा अंस भर राखा ॥
दोहा-धुनकट केंस अंस भरि, बहरे काल बरिआन ॥
जाय स्वर्ग गे लागा, देवतन देख रिसान ॥
सकल देव तेहि यासन धावा । भाग सबे कबीर पहुँ आवा ॥
तत्क्षण सत्यकबीर जोगजीता । कालीहिं भ्रम कीन्ह भये रीता ॥
लक्ष बार तेहि जार निकंदा । पुनि सजीव कीन्ह कहैं मैं बंदा ॥
कवीरकृष्णगीता
८३
कवीरवचन ।
कहे कवीर वंदा तैं काकर । जाकर दास नाम ले ताकर ॥
निरजनवचन ।
कहे काल कवीरको दास । जिन मोहि छिनया सिरज विनासा ॥
कहे कवीर तैं कासो डरसी । काकर भक्त विहुन भक्ष करसी ॥
कहे काल मैं पुरुषके अंसा । पुरुष कवीर एक परसंसा ॥
सत्यकवीर सो हमरे श्रेष्ठा । और न करे छिनक महे नष्टा ॥
बहुर सहस्र बेर तेहि जारा । सिरजेउं बहुरि काल तव हारा ॥
पृच्छिहि जोगजीत सुन काला । कासो डरस कहु यम ब्याला ॥
बोले काल रोप सिर धुनिया । तुम्हरो दास तुव मेरे सिर मणिया ॥
तुव सत्यपुरुष हम तुम्हरे चेरा । तुम्हरे दास मकुट सिर मेरा ॥
जो लेहि सत्यनाम परवाना । तोहे सम ताहि गिनो निरवाणा ॥
दोहा—सत्यकवीरके दास, जो मैं पुन ताके दास ।
जो जिव विलग कवीरसे, यम तेहि घाले फांस ।
धन्य सत्यनाम कवीर अटोटा । जिन महाकाल बांध यम कोटा ॥
यमके कोट कर्म भ्रम धोखा । सत्यकवीर विन पावे नहि मोषा ॥
कवीरवचन ।
कहे कवीर सुन काल निरंजन । अजाजील तुम साकटभंजन ॥
हमहिं गौय कस पाया चोरा । आपहि पुरुष थाप कस भोरा ॥
कालवचन ।
कहे काल मोहि व्यापेउ ऐसा । पुरुषहिं मेट राज करें वैसा ॥
जब मन महे अस चितवन कीन्हा । दस बीस सीस दूट परभीना ॥
८४
कबीरकृष्णगीता ।
बहुर कीन्ह मैं सुमरण साईं । सीस मोर धड लागे आई ॥
तब मैं जाना पुरुष दयाला । सेवक चूक न मन महीं चाला ॥
निशि दिन धरों मैं पितु पगु ध्याना । पै कछु मन महीं भौ अभिमाना
तब तुम योहिं भ्रम कर डारा । कबीरते आद अंत यम हारा ॥
जो सतनाम राखे तो रहऊं । डाहे तो बिन अगिन डहाऊं ॥
दोहा—सत्यकबीर जो सुमरहीं, तोहि मैं निकट न जाऊं ।
कबीरके भक्त विद्वान जो, कहे काल तेहि खाऊं ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण सनकादिक सुनहूँ । आद पुरुष कबीर चित गुनहूँ ॥
सनकादिकवचन
कहे सनकादिक अब हम चीन्हा । सब मूल कबीर गम कीन्हा ॥
अब हम सत्यकबीरके शिष्या । कबीरके सुरत हृदयमो लिखा ॥
बला सुत हम सहस्र अठासीं । कबीर बिना सब परे यमफांसी ॥
अब जिव सत्य कबीरहिं दीन्हा । कबीरके अगुवा विष्णुहिं चीन्हा ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण जब लेहो परवाना । यम त्रिण तोर संहाय सतनामा ॥
यह सुन सनकादिक धर ध्याना । कृष्णके स्तुति आप बखाना ॥
सत्यलोकके हंस संग आये । झलकत झलझल सुवास बसाये ॥
कोटिन रावे शशि एक न तुलहीं । एक हंस ससि अर्बन तुलहीं ॥
शोभासिंधु राससुख मूछं । ताहि सुख जेहि कबीरसम तुछं ॥
सत्यकबीर जग दास कहाये । साधरूप धर भक्त हठाये ॥
इह हम कहैं यमसुखते बचावा । जगमहैं हमरे नाम खिडावा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
८५
कहै कृष्ण पग समर्थ नाई । कहैं लग कहों मैं समर्थ बढाई ॥
सतकबीर मेटो यम दुःखा । सनकादिक सुन प्राण पिशुषा ॥
यम त्रिण तोड कालसुख थूका । आरती यंगल यम धर लूका ॥
दोहा—दियो पान सनकादिको, मग्न भये सब साथ ।
कहे सनकादिक सुख भये, मिटा काल आध ॥
कहैं सनकादिक धन्य सतनामा । क्षण यहैं हम सबको भो कामा ॥
जै जै सत्यकबीर दयाला । सनकादिक जप कबीरको माला ॥
मग्न भये सब तन मन शोधा । पांच पचीस मन सहज सभोधा ॥
चैदह यम त्रिगुण जेहिथाकी । अरिहित सम लघु दृग एक ताकी
धन्य सो सतकबीर सत्यनामा । मैं लघु सेवक कबीर सुखधामा ॥
सयकादिक बहु स्तुति कबीरा । सुरति निरति गहि तन मन थीरा
व्याघ्र भ्यानहर अज बिग कागा । चारों झोहर करने लागा ॥
सब हरे सनकादिक क्रांति । मिल सनकादिक साधुके पांती ॥
एक बारके हुकार सब गजी । आप आप कह अज हरी तजी ॥
तब कबीर सनकादिक आगे । सतकबीर आवत यम भागे ॥
कछु पग जाय भये चक्षुहीना । बहुर कुष्ट होय चुये अभीना ॥
पगुके हीन भये सिर कूटा । जरि भो चिता केर जस खूंट ॥
दोहा—चारों मूठ नर पूछे, कहे आप महशोय ।
जो कबीर ना आवते, तो सब खात बिगोय ॥
ऐसे भौ पुन चारों वेदा । स्तुति करहि कबीरको भेदा ॥
कहा कबीर वेद समुझाई। धर तन शक्त करहु मनलाई ॥
८६
कबीरकृष्णगीता ।
चारों वेदके तारन हारा । पंचयें सुसम वेद सोहंगम तारा ॥
सतकबीरको अंस सोहंगा । स्तुति वेद कबीर प्रसंगा ॥
आज्ञा मान भक्त चित दीन्हा । चार वर्ण भये भक्त अधीना ॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य औ शूद्रा । कोई करे भक्त कोई तपमुद्रा ॥
भक्त विना धन वित सब छारा । सतकबीर विनती यम धारा ॥
सत्यकबीर सत्य सो राजी । काम क्रोध मिथ्या यम बाजी ॥
सोहंसा सारपद चाही । अजर अमर जिव अमर व्याही ॥
भजहिं कबीर सो जाहिं अमरपुर । सब सुख विलसहिं कर्म कालदुर
भजे सो सत्यकबीर पतिव्रत छवा । तिभिर थिठै जब उदे ज्ञानवा ॥
तिभिर त्रिगुण मन मत सब चारा । सोतहवां अंजोर कबीर मत सार ॥
विष्णु अवरण तुलसी भूषण । मृतुका तिलक काहु नहिंदूषण ॥
अंकुर कंद मूल गुर घीऊ । पान फूलपट सेत सोइ लेऊं ॥
दोहा—मीन मांस जो भखे, तासु अन्न जल नाहिं ।
साकटको घर भात ताजि, छूट साधको खाइ ॥
एक दिन महाकाल रिसियाना । तीन. लोकमो परा भगाना ॥
सहस्रमुखी तक्षक होइ उठा । जाय इंद्रासन इस इंद्र सुडा ॥
भागे देवता अखिल पताला । वहां सहस्रमुखी जहैं जवाला ॥
दौरे काल कैलासहि आवा । शिव कहैं डंक कीन्ह बहु भावा ॥
बहुर काल धाये वैकुंठा । जै औ विजय सांस धर उठा ॥
खैच उरधके डसेउ बनाई । विष्णुके ढिग दीन्ह गिराई ॥
मृतुक साथ तक्षक गिर तहां । विष्णु व्यास सुखदेव सब जहां ॥
कबीरकृष्णगीता ।
८७
कै प्रहापे अहि धाय विष्णु पर । सतकबीर तब कहा सुरलीधर ॥
सहस्रमुख सन्मुख कबीरा । पुन कबीर घर अमित शरीरा ॥
रूप कबीर देखत यम हारा । आपन विष भौ आपहिं छारा ॥
लीन्ह उवार विष्णुहिं सतनामा । जै कबीर कह विष्णु प्रणामा ॥
जै २ सत्यकबीर अरिघातक । काल मर्दन रक्षक सतपातक ॥
सत्यकबीर सबे गुण आगर । पतित तार देहीं सुक्त उजागर ॥
इंद्र रुद्र सब देव जिआये । सब देवन मिलस्तुति लाये ॥
सहस्रमुखी तब विष्णुहिं कीन्हा । महाविष्णुकी पदवी दीन्हा ॥
वेद विदित जाने संसारा । सहस्रसिरषा पुर्ष विचारा ॥
सहस्रसिरषापातिआनंदसिपासो । सो सतपुरुष कबीर दिखासो ॥
एक अनंतकी कौन बतावे । कोट अनंत पार नहिं पावे ॥
जाके खोजत सब पचहारे । सो सतनाम कबीर पुकारे ॥
जासु अंस एक रोम निरंजन । सो सतनाम कबीर दुखभंजन ॥
जिन प्रभु इच्छाते सब कीन्हा । सो सदुरु कबीर हर चीन्हा ॥
महाविष्णु औ विष्णु व्यासा । सत्यकबीर सुभरो हरि स्वासा ॥
दोहा—सत्यकबीरसत्यनामप्रभु, दुखनासिकासुखधाम ।
सर्व मई सो रम रहे, संतनमें विश्राम ॥
जहां सांच तहैं प्रगट आही । दयाहीनके निकट न जाही ॥
गुरु भक्त सबते अधिकारी । साध भक्त गुरु भक्त सुखारी ॥
कोटिन देवी देव अराधे । विन गुरु भक्त काल घर बाधे ॥
कोट अनंत कर्म संसारा । गुरुके भक्त विनसवे असारा ॥
८८
कबीरकृष्णगीता ।
इहां वहां गुरु भक्त सुहेखा । गुरु आज्ञा कर सोई चेला ॥
गुरु कहैं आद ब्रह्म कर लेखे । गुरु सरूप संतन कहैं पेखे ॥
गुरु सोई जो तिहुँलोकते न्यारा । सद्गुरु अमरलोक विस्तारा ॥
विष्णु अंस सद्गुरुके आहीं । सद्गुरु सर्वे मई बरताहीं ॥
सद्गुरु सत्यकबीर अविनाशी । रहे निरंतर सब घटवासी ॥
जिभि चंदा नभ कुंभक दीसा । पुनि जिभिरविप्रकाशपद ईसा ॥
एके साहेब सद्गुरु आदी । कीतनउपजी विनासिषटस्वादी ॥
तीन लोककेहैं विष्णु श्रेष्ठा । विष्णुते सत्यकबीर गरिष्ठा ॥
सत्यकबीर सबके सुखदाई । सुरति सुमतिते वै भल पाई ॥
दोहा—सत्यकबीर सुखदाया, जो सुमरे एक चित्त ।
विष्णु व्यास कहैं सब, ते सुख कबीर प्रतीत ॥
जै जै जै सतनाम कबीरा । सत्यसुक्त सो अजर शरीरा ॥
पुष्पविमान सतलोकते आवा । सकलआयचरणनशिर नावा ॥
निज सिंहासन ठाकुर दीन्हा । चरणपस्वारचरणाभूतलीन्हा ॥
विष्णुव्यास सुखदेव सतव्यासा । सतकबीर पग परस हुलासा ॥
कर जोरे जै हरखित कहहीं । सतकबीर कहत सुख लहहीं ॥
जो सुमरे सतनाम सुखधामा । सच २ सो सद्गुरु नामा ॥
सत्यलोक अम्बर सुचकाया । तहां सो सत्य पुरुष रहाया ॥
बेहंग सोहंग वोहंगके मूला । ओंकार मकारके मूला ॥
कालके कारण करण गोसाई । रक्षपालक सब जिव सुखदाई ॥
तीन लोकते न्यारा रहहीं । सर्वे मई पुन सबसों कहहीं ॥
अवतारोंकी कथा
कवीरकृष्णगीता ।
८९
धरणी अकाश पवन औ पानी । चंद सूर्य जेते नष सानी ॥
सबके आद सोहे सतनामा । सच दया मिल जीवको कामा ॥
सर्वमूल अविनाशी रामा । सोई सतकवीर सुखवाया ॥
जो सुभरे सतनाम कवीरा । ताके काल न आवे निषरा ॥
कीन्हो स्तुति विष्णु बहुता । कहा कवीर वैठहु पूता ॥
तुम स्तुति जब बहुते कीन्हा । तब हम आय दरशतोहि दीन्हा ॥
कौन काज तुम सुभरेहु मोही । टोरो सब संकट जत तोही ॥
परहि कालमुख झरकहि जबहीं । सतकवीर कह चितवे तवहीं ॥
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण पलकन पग झारे । मैं नाती तुम आज्ञा प्यारे ॥
धन्य भाग्य मम शुभ दिन मोश । दीन्हो दरश कवीर बंदीछोरा ॥
कवीरते अधिक और नहि कोई । आद अंत सब जिनते होई ॥
हम सब हैं कवीरके अंसा । सतकवीरके सब निज वंसा ॥
सिद्ध साध मत वेद पुराना । सतकवीर गुण सबहि बखाना ॥
कवीर निरवान मुक्तके दाता । जाको अंत न लखे विधाता ॥
दोहा—सब करताके करता, सब दाताके तार ।
सकल मूल सतसाहेब, सो कवीर औतार ॥
सच २ सच हर गई । सतकवीर जिव रक्षक भाई ॥
ये कवीरको महिमा जानो । और सब मनभत बौरानो ॥
गरुड चरण हरि शीस नवाई । महिमा कृष्ण कवीर परवाई ॥
अस शोभा नहि देखो काहू । करता कृष्ण राम तुव आहू ॥
५
९०
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सोई पुरुष कबीर है, जेहि हम कीन्हो खोज ।
सबे कहै मोहि वाउर, कहै भसुंड बनरोज ॥
त्रेता रामचंद्र मोहि जांचा । नागफांस परिचित भौ कांचा ॥
तहां पहुँच अहिनास उबारा । तब मैं करतातेहिनावविचारा ॥
करता निरबंद योनि नहि आवे । नागफांस तेहि बांधको पावे ॥
तब हम चीन्ह कौसिल जाये । भक्तवत्सल क्षत्रीरूप धर आये ॥
दोहा-क्षत्रीरूप राजसी, सातकी सद्गुरु रूप ।
तमगुण तामस सकल सब, त्रिगुण बित्त तेहि भूप ॥
अब हम सत्यपुरुषको चीन्हा । कबीरकेस्तुतिगरुडबहुकीन्हा ॥
कृष्णवचन ।
कहै कृष्ण गरुड तुम जानहु । कबीरकेअंस सुपच पाहिचानहु ॥
जिनके भोजन घंट जो बाजा । अधर अकाशजो धजा विराजा ॥
सो कबीरके सेवक रहई । जेहि सपनाकोउतिहँपुरअहई ॥
उधसेन भक्त बंद मै छोरा । ताते मोहि संत कहैं बंदिछोरा ॥
कबीर छोरहिँ चौरासी यम फंदा । निर्गुण नाम कबीर निर्दिदा ॥
जापर दायरा करहिँ सतनामा । सो देखे सतलोक सुखधामा ॥
कहैं कृष्ण सुन आसन मोरा । महा सुज्ञान गरुड बल जोरा ॥
हमही रहे त्रेता रघुवंसा । तवहीं कबीर मेटे यम संसा ॥
सतकबीरके अंस एक राऊ । सो पूंजी यम पितहिँ दियाऊ ॥
राय रभिता राम सोहँगी । ताके नार देह अर्धगी ॥
रामचंद्र अर्धगी सांता । रावण चोर संधि सिर दीता ॥
कबीरकृष्णगीता ।
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तेहि प्रति रामचंद्र दुख पावा । वन २ रटत वचन पितु पावा ॥
वचन सरूप धरे सब देवा । डासन त्रिण भोजन फल मेवा ॥
सिंधु सेत वांधे हरि ताका । पर्वत सबे सिंधु महीं राखा ॥
वांधन लगे सिंधु गंभीरा । तब हरि सुमरे सत्यकवीरा ॥
आय कबीर तुरत दरसावा । कबीर रूप हरि हृदय समावा ॥
रामचंद्रके हृदय कबीरा । आद ब्रह्म कबीर गंभीरा ॥
कबीरके अंस हैं लक्ष्मण वाला । लिखा मेर पर अंक रिसाला ॥
लक्ष्मण अंक सेतु लेहु वांधा । रामचंद्रका छूटा धंधा ॥
उत्तरा सैन लंकागढ दूटा । सकल देवका वंदी छूटा ॥
दीन्हो राज्य विभीषण थापी । कोइ न वांचे राक्षस पापी ॥
सिय बंदिछोर राम लियो संग। । सत्यकबीर प्रताप सुरंगा ॥
सुन खगपति सब देव मुनीसा । सृष्टि कबीर सबन कहैं दासा ॥
दोहा—कहैं कृष्ण सुनु देव मुनि, रक्षक नाम कबीर ।
हमहिं औसर सुमरहीं जन, गाठे परे शरीर ॥
जीवके सुख देवे कारण । पुरुष कबीर प्रगट कलि सारन ॥
रामनाम गुरु महिमा भाषा । सत्संगतके इच्छा राखा ॥
सत्संगत गुरु मार्ग पाई । गुरु सदुरु मिल ज्यास नसाई ॥
खरा खोटा परख दिखाये । सदुरु सो जिन सत्य चिन्हाये ॥
निर्गुण एक कबीर बखाना । सर्गुण सकल देव मिल जाना ॥
निर्गुण बोलता कबीरको अंसा । रमता राम सकल घट हंसा ॥
कहैं कृष्ण कबीर परजाई । सदुरु सत्य कबीर गोसाई ॥
९२
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सद्गुरु सत्य कबीर हैं, निहचल अजर शरीर ।
भौसागर तारन तरन, समर्थ सत्य कबीर ॥
व्यास सुखदेव समेता । अज हरि हर प्रभु कृपानिकेता ॥
नारद ऋषि इंद्रादि सनकादी । सके न कोई कबीरसंवादी ॥
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुखदेऊ । कबीरहिं मानुष कहे जनि कोऊ ॥
कबीर सर्वाधिक करताके करता । भरी ठरै फिर खाड़ी भरता ॥
भक्त रूप धर प्रगट दिखाये । गुरुकी भक्ति ठिग दास कहाये ॥
युग २ रक्षा हमरी कीन्हा । भक्त रूप होय दर्शन दीन्हा ॥
रामरूप संग लक्ष्मण सीता । सत्यकबीर बन दास पुनीता ॥
दोहा-कहैं कृष्ण सब कोइ सुनो, इत उत दास कबीर ।
सतकबीर सत युग २ सुमेर, दोउ दीन गुरु पीर ॥
व्यासवचन ।
कहैं व्यास सकल मिल वाणी । धन्य कबीर जेहि कृष्ण बखानी ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख देऊ । हमहु न लखा कबीरका भेऊ ॥
जब कबहुँ हम त्रसित निरंजन । तहां कबीर काल शिर भंजन ॥
कबीरको चरणोदक जब लीन्हा । जबते अगम गम्य हम चीन्हा ॥
हमरे कहे के पिता निराकारा । हम कहै ये कबीर प्रतहारा ॥
कबीरके पांव निरंजन लागे । और जीव कहा कस आगे ॥
निरंजन एक दिन प्राप्त धाये । कबीर नाम जप जीव बचाये ॥
गुरुभक्तिकी महिमा
कवीरकृष्णगीता ।
९३
दोहा—एक हंसके पाछे, + आद नाम सर देख ।
अद्वुत शोभा अकह छिव, कवीरको कला अनेक॥
कवीर है अमरलोकके माहीं । यहां दरद देस जीव बंचाही ॥
जब हम बैठे सप्त पताला । नाथे कालीनाग निसाला ॥
तब नाथिन मोहि विष संचारा । तहैं कबीर गये प्राण उबारा ॥
संगहि आये बलभद्रके भेसा । बालबच्छ राचि मेढेउ अहेसा॥
जब हरनाकुश कीन्होसि वरिआई । तहैं कबीर पुन भये सहाई ॥
रामरूप चेतता हम जांचा । परम जोत कहि बोलेहु बाचा॥
परम जोति कहि कियेउं पुकारा । तहां कबीर आय दुख दारा ॥
दोहा—कबीर सुखदाता जीवके, अमरलोक विश्राम ॥
सो जिव सुख घर पहुँचे, जो सुमरे कबीरको नाम ॥
कलि हमरे जो बोध शरीरा । देवल थापेउ दास कबीरा ॥
तट देवल सिंधु तर गाडा । तब कबीरको ध्यान हम माडा॥
तुरत कबीर प्रगटे तुलसी चौरा । विप्ररूप मैं दर्शनको दौरा ॥
तुलसी चौरा जाय मैं दासा । हंस कबीर अंकम ले परसा ॥
सिंधुतीर गये आसन कीन्हा । सिंधु त्रास भये चरण अधीना॥
बोइल द्वारिका दै मंडपराखा । सत्यकबीरके हम सब साखा ॥
चारों युग भो वार अनेका । सब दिन सत्यकबीर मोहि टेका॥
दोहा—कहैं कृष्ण गुरु गुप्त रासि, कबीर सबनके मूल ।
हम कबीर कहैं सुमरहीं, भक्त मुक्त समतूल ॥
गरुडकी चेतना - गरुड और कबीर सम्वाद
९४
कवीरकृष्णगीता ।
सकल देवता सुन थर हरेऊँ । धाय कवीरके चरणन परेऊ ॥
चरणोदक लै मुखमहँ लीन्ह। चरण परसि प्रदक्षिण कीन्ह। ॥
कबीरवचन ।
कहँ कवीर सुनो सुनि व्यासा । गुरुके भक्त कटे यम फाँसा ॥
गुरु विन राम न भावे हांथा । गुरु विन डोलहिँ जीव अनाथा ॥
गुरुकी भक्त साधुकी सेवा । हरषि गोपाल मिले यह भेवा ॥
हमहू गुरुको करता जाना । काउ जीत गुरु नाम बसाना ॥
गुरु सोई जो अंतहु थीठा । जन्म बरण गुरुलागे सीठा ॥
दोहा—योग यज्ञ तप तीर्थ, प्रतिमा भूत मसान ।
कहँ कवीर सदुरु विना, जीव जात यम थान ॥
उठके गरुड टाढ बये आगे । हरिसों विनती करने लागे ॥
आज्ञा देहु मोहि त्रिसुवननाथा । हमहु जीव निज करहु सनाथा ॥
हम कवीर कहँ सदुरु करहीं । सेवा तुम्हार ध्यान उर धरहीं ॥
कृष्ण विहँस कहवे अस लीन्ह। सुनहु विहँग सबन चित दीन्ह ॥
यहिते श्रेष्ठ अमर कछु नाहीं । धन्य सो जो गुरु शरण समाहीं ॥
हमहू गुरुके शरण समाने । सदुरु कर कवीर कहँ जाने ॥
कबीरके आस सबनको भाई । कहहि कृष्ण पुन गरुड बुझाई ॥
दोहा—खगपति गये कवीर पहुँ, शरण देहु सतनाम ॥
यमसे त्रास निवारहु, देहु भक्त सतधामा ॥
कबीरवचन ।
कहँ कवीर सुनो खगराई । बडे भाग गुरु शरण समाई ॥
गुरुकी आज्ञा शिष्य जो माने । शिष्य सोईजो गुरु सुरति समाने ॥