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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

by युगल आनंद विहारी

Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)

Devanagarihipublished168 pages

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कबीरकृष्णगीता ।

७९

जापर दया करहिं सतनामा । सत्यनाम सो कबीर सुखधामा ॥
सत्यकबीरकी जापर दया । सत संतोष दया तहैं छाया ॥
कबीर सुवास फूल तिल संसीरा ॥ सत्यकबीर घृत जग तम हीरा ॥
कबीर अभी विष राय निरंजन । तारहिं कबीर काल शिरभंजन ॥

दोहा—कैसो अधीन अगाध होय, जो गुरु करी कबीर ।

विष्णु व्यास सत कहतहैं, तेहि छूटे भोजलपीर ॥
कबीरके सुमरे पाप नसाई । कबीरके भजे यम निकट न जाई ॥

अजहरवचन ।

अजहर विनवे दोइ कर जोरी । श्रीकृष्ण सुन विनती मोरी ॥
कहु सोहंग कर मूल बखानी । कासो भये सोहंग उत्पानी ॥
निराकार अद्या पितु माता । तिनतो कीन्हा सोहंग घाता ।
मात पिता घाती नहिं होई । गुरु साध घाती नहिं कोई ॥

कृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण सुन रुद्र वियोगी । तुव समान नहिं जगमा जोगी ॥
सो तुम आद सोहंग न चीन्हा । हम तो आद सतनाम गहि लीन्हा ॥
सत्यनाम जग प्रगट कबीर । स्वासा सोहंग अंस सत धीर ॥
अमर कबीर अमर सतलोक । अंस सोहंगम कबीर निहसोका ॥

शिववचन ।

कहैं शिव जो कबीर करतारा । मम बल जीतहिं तो हम हारा ॥
दोहा—वाठे शिव आकाश लहि, कीन्ह कृष्ण पर धाव ।
विष्णु कबीर पुकारहौं, कबीर प्रगटे तेहि ठांव ॥