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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

by युगल आनंद विहारी

Source: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (origin)

Devanagarihipublished168 pages

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कवीरकृष्णगीता ।

७७

पानी नीर उदक अंभु वारी । जल कह जले नीर संसारी ॥

दोहा-नीर कवीरहिं मिल गया, अंतर रहा न रेख ।

तीनों मिल एके भया, नीर कवीर अलेख ॥

जाके होय सत्तके जोरा । सो गुरु करे कवीर वंदीछोरा ॥

जो पुन दया सत्तके हीना । तिन भज त्रिगुण देवी पंथ लीन्हा

त्रिगुण मता देवी सरगुण संसारी ॥ निर्गुण सत्यकवीर जिवतारी ॥

नीर बिना नहिं पण पछली । महि बिना कोइ बैठे न चली ॥

सो महि मीन रूप स्थापा । मीन भषहिं बड लागहि पापा ॥

मीन एक गौ द्विज शत कोटी । तिल भर मीन नरकके कोटी ॥

महादेववचन ।

कोध महादेव वचन उचारा । विनामीन नहिं मातु अहारा ॥

अष्टंगविवचन ।

उठ अष्टंगी सबहिं बुझावा । कक्षप सूकर महादेव खावा ॥

मैं तो आद निरंजन बामी । हमरी प्रत को श्रवण प्राणी ॥

एक दिन जो कोइ तिलभर खाई । पुरुषा सहित सो नरक सिधाई ॥

हम तो विष्णु ब्रह्मा शिव माता । एक दिन मम कामन राता ॥

ब्रह्माहु मम वचन नसाये । तुमहु शिव नीके बरताये ॥

विष्णु भागि गो साधुन संग । खाहिं मीन हम तेहि नहिं संग ॥

हमहू मीन खाय अघ बूढे । मांस खाय अघ सुडे बूढे ॥

जल शिव सभा माहिं हम हारा । तुरत भरम होहु आप हमारा ॥

भयउ भरम शिव बहुरि जियाय ॥ सर्व जीवके तेहि मीन खवाया ॥