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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages
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संन्यासी का गीत

'फल अशुभ अशुभ कर्मों के, शुभ कर्मों के है शुभ फल,
किसकी सामर्थ्य बदल दे, यह नियम अटल औ' अविचल ?
इस मृत्युलोक मे जो भी करता है तनु को धारण,
बन्धन उसके अंगो का होता नैसर्गिक भूषण ।"
यह सच है, किन्तु परे जो गुण नाम-रूप से रहता
वह नित्य मुक्त आत्मा है, स्वच्छन्द सदैव विचरता ।
'तत् त्वमसि'—वही तो तुम हो, यह ज्ञान करो दृढ्यांकित,
फिर क्या चिन्ता सन्यासी, सानन्द करो उद्घोषित—

ॐ तत् सत् ॐ

क्या मर्म सत्य का, इसको वे कुछ भी समझ न पाते,
सुत बन्धु पिता माता के स्वप्नो मे जो मदमाते ।
आत्मा अतीत नातो से, वह जन्म-मरण से विरहित,
वह लिंग-भेद से ऊपर, सुख-दुख-भावो से अविजित ।
वह पिता कहाँ किसका है, किसका सुत किसकी माता ?
वह शत्रु मित्र किसका है, उसका किससे क्या नाता ?
जो एक, सर्वमय शाश्वत, जिसका जोड़ा न कहीं है,
जिसके अभाव मे कोई सम्भव अस्तित्व नहीं है,
'तत् त्वमसि'—वही तो तुम हो, समझो हे संन्यासीवर,
अतएव उठो, गाओ तुम, गाओ यह गान निरन्तर—

ॐ तत् सत् ॐ

चिर मुक्त विज्ञ आत्मा है, वह अद्वितीय, वह अतुलित,
अक्लेद्य अशोष्य निरामय, वह नाम-रूप-गुण-विरहित,

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४

ज्ञानयोग

उसके आश्रय मे बैठी संसार-मोहिनी माया
देखा करती है अपने मादक स्वप्नों की छाया;
साक्षी स्वरूप माया का आत्मा सदैव है सुविदित,
जीवात्मा और प्रकृति के रूपों मे वही प्रकाशित;
‘तत् त्वमसि’ वही तो तुम हो, समझो हे संन्यासीवर,
उच्च स्वर में यह गाओ, यह तान अलापो सुन्दर—
ॐ तत् सत् ॐ

हे बन्धु, मुक्ति पाने को तुम फिरते कहाँ भटकते ?
इस जग या लोकान्तर मे तुम मुक्ति नहीं पा सकते;
अन्वेषण व्यर्थ तुम्हारा शास्त्रो, मन्दिर मन्दर मे;
जो तुमको खींचा करती वह रज्जु तुम्हारे कर मे।
दुख शोक त्याग दो सारा, तुम वीतशोक बस हो लो,
वह रज्जु हाथ से छोड़ो, बोलो संन्यासी, बोलो—
ॐ तत् सत् ॐ

दो अभय-दान सबको तुम—‘हों सभी शान्तिमय सुखमय,
है-प्राणिमात्र को मुझसे कुछ भी न कहीं कोई भय,
पृथ्वी पाताल गगन मे मैं ही आत्मा चिर-संस्थित,
आशा भय स्वर्ग नरक को मैंने तज दिया अशंकित।’
काटो काटो काटो तुम इस विधि माया के बन्धन,
निःशंक प्राणपण से तुम गाओ गाओ यह गायन,—
ॐ तत् सत् ॐ

चिन्ता मत करो तनिक भी नश्वर शरीर की गति पर,
यह देह रहे या जाए, छोड़ो तुम इसे नियति पर;

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संन्यासी का गीत

६

जब कार्य शेष है इसका है, तब जाता है तो जाए;
प्रारब्ध कर्म फिर इसको अब चाहे जहाँ बहाए;
कोई आदर से इसको मालाएँ पहनाएगा,
कोई निज घृणा जताकर पैरों से ठुकराएगा;
तुम चित्त शान्ति मत तजना, आनन्द-निरत नित रहना;
यश कहाँ, कहाँ अपयश है—इस धारा मे मत बहना।
जब निन्दक और प्रशंसक, जब निन्दित और प्रशंसित,
एकात्म एक ही हैं सब, तब कौन प्रशंसित निन्दित ?
यह ऐक्य-ज्ञान हृदयंगम करके हे संन्यासीवर,
निर्भय आनन्दित उर से गाओ यह गान मनोहर—

ॐ तत् सत् ॐ

करते निवास जिस उर मे मद काम लोभ औ' मत्सर,
उसमे न कभी हो सकता आलोकित सत्य-प्रभाकर;
भार्यत्व कामिनी में जो देखा करता कामुक बन,
वह पूर्ण नहीं हो सकता, उसका न छूटता बन्धन;
लोलुपता है जिस नर की स्वल्पातिस्वल्प भी धन में,
वह मुक्त नही हो सकता रहता अपार बन्धन मे;
जंजीर क्रोध की जिसको रखती है सदा जकड़ कर,
वह पार नहीं कर सकता दुस्तर माया का सागर।
इन सभी वासनाओं का अतएव त्याग तुम कर दो,
सानन्द वायुमण्डल को बस एक गूँज से भर दो—

ॐ तत् सत् ॐ

सुख हेतु न गेह बनाओ, किस घर में अमा सकोगे ?
तुम हो महान्, फिर कैसे पिंजड़े के विहग बनोगे ?

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ज्ञानयोग -

आकाश अनन्त चँदोया, शय्या धरती तृण-शोभित,
रहने के लिए तुम्हारे यह विश्वगेह है निर्मित;
जैसा भोजन मिल जाए, सन्तोष उसी पर करना;
सुस्वादु स्वाद-विरहित मे कुछ भी मत भेद समझना;
शुद्धात्मरूप का जिसमे सद् ज्ञानालोक चमकता,
कुछ खाद्य पेय क्या उसको अपवित्र कहीं कर सकता ?
उन्मुक्त स्वतंत्र प्रवाहित तुम नदी तुल्य बन जाओ,
छेड़ो यह तान अनूठी, सानन्द गीत यह गाओ—

ॐ तत् सत् ॐ.

ज्ञानी विरले, अज्ञानी कर घृणा हँसेगे तुम पर;
हे हे महान्, तुम उनको मत लखना आँख उठा कर ।
स्वाधीन मुक्त तुम, जाओ, पर्यटन करो पृथ्वी पर,
अज्ञान-गर्त-पतितों का उद्धार करो तुम सत्वर;
माया-आवरण-तिमिर मे जो पड़े वेदना सहते,
तुम उन्हे उबारो जाकर, जो मोह-नदी मे बहते ।
विचरो जन-हित-साधन को स्वच्छन्द मुक्त तुम अविजित
दुख की पीड़ा से निर्भय, सुख-अन्वेषण से विरहित;
सुख दुख के द्वन्द्व-स्थल के तुम परे महात्मन्, जाओ;
गाओ गाओ संन्यासी, उच्चस्वर से तुम गाओ—

ॐ तत् सत् ॐ.

इस विधि से छीजू दिनोंदिन, है कर्म स्वीय बल खोता;
बन्धन छुटता आत्मा का, फिर उसका जन्म न होता;

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७

संन्यासी का गीत

फिर कहाँ रह गया—मै तू, मेरा तेरा, नर ईश्वर ?
मै हूँ सब मे मुझमे सब आनन्द परम लोकोत्तर ।
आनन्द परम वह हो तुम आनन्द सहित अब गाओ,
हे बन्धुवर्य संन्यासी, यह तान पुनीत उठाओ—

ॐ तत् सत् ॐ


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२. माया

( लन्दन में दिया हुआ भाषण )

माया शब्द प्रायः आप सभी ने सुना होगा। इसका व्यवहार साधारणतः कल्पना, कुहक अथवा इसी प्रकार के किसी अर्थ में किया जाता है, किन्तु यह इसका वास्तविक अर्थ नहीं है। मायावाद रूप एक स्तम्भ पर वेदान्त की स्थापना हुई है, अतः उसका ठीक ठीक अर्थ समझ लेना आवश्यक है। मैं तुमसे तनिक धैर्य की अपेक्षा रखता हूँ, क्योंकि मुझे बड़ा भय है कि कहीं तुम उसे (माया के सिद्धान्त को) ग़लत न समझ लो।

वैदिक साहित्य में कुहक अर्थ में ही माया शब्द का प्रयोग देखा जाता है। यही माया शब्द का सबसे प्राचीन अर्थ है। किन्तु उस समय वास्तविक मायावाद-तत्त्व का उदय नहीं हुआ था। हम वेद में इस प्रकार का वाक्य देखते हैं—"इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते," अर्थात् इन्द्र ने माया द्वारा नाना रूप धारण किये। यहाँ पर माया शब्द इन्द्रजाल अथवा उसी के समान अर्थ में व्यवहृत हुआ है। वेदों के अनेक स्थलों में माया शब्द इसी अर्थ में व्यवहृत हुआ देखा जाता है। इसके बाद कुछ काल तक माया शब्द का व्यवहार एकदम लुप्त हो गया। किन्तु इसी बीच तत्प्रतिपाद्य जो अर्थ या भाव था वह क्रमशः परिपुष्ट हो रहा था। इसके बाद के समय में एक प्रश्न देखा

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माया

९

जाता है, “हम जगत् के गुप्त रहस्य को क्यों नहीं जान पाते ?” और इसका इस प्रकार निगूढ़ भाव व्यञ्जक उत्तर प्राप्त होता है:— “हम सब व्यर्थ जल्पना करते है, हम इन्द्रिय-सुख से परितृप्त होने वाले और वासनापर है, अतएव इस सत्य को नीहारावृत करके रखने हैं”—

“नीहारेण प्रावृता जल्प्पा चासुतृप उक्थशासश्चरन्ति !” १

यहाँ पर माया शब्द का व्यवहार तो विल्कुल ही हुआ नहीं, किंतु इससे यही भाव प्रकट होता है कि हमारी अज्ञता का जो कारण निर्धारित हुआ है वह इस सत्य और हमारे बीच कुज्झटिका के समान वर्तमान है। अब इसके बहुत समय के वाद, अपेक्षाकृत आधुनिक उपनिषदो मे माया शब्द का फिर आविर्भाव देखने मे आता है। किन्तु इसी बीच मे इसका प्रभूत रूपान्तर हो चुका है; उसके साथ कई नये अर्थ संयोजित हो गये है; नाना प्रकार के मतवाद प्रचारित और पुनरुक्त हुये है; और अन्त मे माया विषयक धारणा एक स्थिर रूप प्राप्त कर चुकी है। हम श्वेताश्वतर उपनिषद् में पढते हैं—

“मायन्तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनन्तु महेश्वरम् ।”

—माया को ही प्रकृति समझो और मायी को महेश्वर जानो। भगवान शंकराचार्य के पूर्ववर्ती दार्शनिक पण्डितों ने इसी माया शब्द का विभिन्न अर्थों में व्यवहार किया है। मालूम होता है, बौद्धों ने भी माया शब्द या मायावाद को कुछ रञ्जित किया है। किन्तु बौद्धों ने इसको प्रायः विज्ञानवाद २


१ ऋग्वेद-दशम मण्डल, ८२ सूक्त, ऋक्।

२ हमारी इन्द्रियों से ग्राह्य समस्त जगत् हमारे मन की ही विभिन्न अनुभूतिमात्र है, इसकी वास्तविक सत्ता नहीं है, इसी मत को विज्ञानवाद या Idealism कहते हैं।

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१०

ज्ञानयोग

(Idealism) में परिणत कर दिया था और माया शब्द इसी अर्थ मे साधारणतः आजकल व्यवहृत होता है। हिन्दू लोग जब जगत् को “मायामय” बताते है तब साधारण मनुष्य के मन मे यही भाव उदय होता है कि “जगत् कल्पना मात्र है।” बौद्धो की इस प्रकार की व्याख्या का कुछ आधार है; कारण, एक श्रेणी के दार्शनिक पहले वाह्य जगत् के अस्तित्व मे बिलकुल ही विश्वास नहीं करते थे। किन्तु वेदान्त में वर्णित माया का अन्तिम निश्चित स्वरूप,—विज्ञानवाद, वास्तववाद † (Realism) अथवा किसी प्रकार का मतवाद नहीं है। हम क्या हैं, और अपने चारो ओर हम क्या देखते है, इस सम्बन्ध मे प्रकृत घटना का यह सहज वर्णनमात्र है। मै आपसे पहले ही कह चुका हूँ कि जिनके अन्तःकरण से वेद निकले उनकी चिन्ताशक्ति मूल तत्त्व की खोज में तथा आविष्कार मे ही लगी हुई थी। इन सब तत्त्वों का विस्तृत अनुशीलन करने के लिए मानों उन्हे अवसर ही नहीं मिला और उन्होने इसकी आवश्यकता भी नहीं समझी। वे तो वस्तु-मात्र के अन्तरतम प्रदेश में पहुँचने के लिये ही व्यग्र थे। ऐसा जान पड़ता है मानो उस पार उन्हे कोई बुला रहा था। अतः वे ठहर नहीं सकते थे। वस्तुतः उपनिषदो मे इधर उधर बिखरी हुई आधुनिक विज्ञान की विषयीभूत विशेष प्रतिपत्ति बहुधा भ्रमात्मक होते हुये भी उनके मूल तत्त्वो के साथ विज्ञान के मूल तत्त्वो का कोई प्रभेद नहीं है। यहाँ पर एक दृष्टान्त दिया जाता है। आधुनिक विज्ञान का ईथर (Ether) अथवा आकाशविषयक नवीन तत्त्व उप-निषदो में विद्यमान है। यह आकाश-तत्त्व आधुनिक वैज्ञानिकों के-


† जगत् केवल हमारे मन की अनुभूतिमात्र नहीं है, उसकी वास्तविक सत्ता है, इस मत को वास्तववाद या Realism कहते हैं।

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माया ११

ईथर की अपेक्षा अधिक परिपुष्ट रूप से पाया जाता है। किन्तु वह मूल तत्त्व मे ही पर्यवसित था। वे लोग इस आकाशतत्त्व के कार्य की व्याख्या करते समय बहुत से भ्रमो में पड गये थे। जगत् की सम्पूर्ण जीवनी शक्ति जिसका विभिन्न विकास मात्र है वही सर्वव्यापी जीवनी शक्ति-तत्व वेद में—उसके ब्राह्मणांश मे ही प्राप्त हो जाता है। संहिता के एक बड़े मंत्र मे समस्त जीवनी शक्ति के विकासक प्राण की प्रशंसा की गई है। इसी सम्बन्ध में आप लोगों मे से कुछ को यह जानकर आनन्द होगा कि आधुनिक योरोपीय वैज्ञानिको के सिद्धान्तो के सदृश इस पृथिवी के जीवो की उत्पत्ति का सिद्धान्त वैदिक दर्शनों मे पाया जाता है। आप सभी निश्चय ही जानते है कि जीव अन्य ग्रहों से संक्रामित होकर पृथ्वी पर आता है, ऐसा एक मत प्रचलित है। जीव चन्द्रलोक से पृथ्वी पर आता है, किसी किसी वैदिक वैज्ञानिक का यही स्थिर मत है।

मूल तत्त्व के सम्बन्ध में हम देखते है कि उन्होने व्यापक साधारण तत्त्वो की छानबीन मे अतिशय साहस और आश्चर्यजनक निर्भीकता का परिचय दिया है। बाह्य जगत् से इस विश्व-रहस्य के मर्म को निकालने में उन्हे यथा सम्भव उत्तर मिला। और, इस प्रकार उन्होने जितने मूल तत्त्वो का आविष्कार किया था उससे जगत् के रहस्य की ठीक मीमांसा जब नहीं हो सकी, तब, आधुनिक विज्ञान की विशेष प्रतिपत्ति भी उसकी मीमांसा मे अधिक सहायक न हो सकेगी, यह निश्चित है। यदि प्राचीन काल मे आकाशतत्त्व विश्वरहस्य को भेदने मे समर्थ नहीं हुआ तब उसका विस्तृत अनुशीलन भी हमें सत्य की ओर अधिक अग्रसर नहीं कर सकता। यदि यह सर्वव्यापी

३२ ज्ञानयोग

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३२ ज्ञानयोग

प्राणतत्त्व विश्वरहस्य के उद्घाटन मे असमर्थ रहा तो उसका विस्तृत-अनुशीलन निरर्थक है; कारण, वह विश्वतत्त्व के सम्बन्ध मे कोई परिवर्तन नही कर सकता। मै यह कहना चाहता हूँ कि तत्त्वा-नुशीलन मे हिन्दू दार्शनिक आधुनिक विद्वानों की भाँति ही एवं कभी कभी उनसे भी अधिक साहसी थे। उन्होने इस प्रकार के अनेक-सुविस्तृत साधारण नियमो का आविष्कार किया है जो आज भी बिलकुल नवीन है, और उनके ग्रन्थो मे इस प्रकार के अनेक मत विद्यमान है जो कि वर्तमान विज्ञान आज भी मतवाद के रूप मे भी प्राप्त नही कर सका। दृष्टान्त रूप से दिखलाया जा सकता है कि वे केवल आकाशतत्त्व पर पहुँच कर ही सन्तुष्ट अथवा थकित नहीं हो गये, किन्तु उन्होने और भी आगे बढ़कर समष्टि मन की भी एक सूक्ष्मतर-आकाश के रूप मे कल्पना की है एवं उसके भी ऊपर एक अधिकतर सूक्ष्म आकाश को प्राप्त किया है। किन्तु इससे कुछ भी मीमांसा नहीं हुई। रहस्य का उत्तर देने में ये सब तत्त्व समर्थ नहीं है। संसार के सम्बन्ध मे व्यर्थ का ज्ञान कितनी ही दूर तक विस्तृत क्यों न हो जाय, इस रहस्य का उत्तर न दे सकेगा। मन मे आता है, मानों कुछ थोड़ा बहुत हमे मालूम हो गया है, कुछ सहस्र वर्ष और प्रतीक्षा करने पर इसकी मीमांसा हो जायगी। वेदान्तवादियों ने मन की ससीमता को निःसंशय ही प्रमांणित किया है, अंतएव वे उत्तर देते है, “नहीं, सीमा से बाहर जाने की हमारी शक्ति नहीं है। हम देश, काल, निमित्त के बाहर नही जा सकते।” जिस प्रकार कोई भी अपनी सत्ता का उल्लंघन नहीं कर सकता उसी प्रकार देश और काल के नियम ने जो सीमा का बन्धन स्थापित कर दिया है उसको अतिक्रमण करने की क्षमता किसी मे नही है। देश-काल-

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  • माया १३

निमित्त सम्बन्धी रहस्य को-खोलने का प्रयत्न ही व्यर्थ है, क्योकि इसकी चेष्टा करते ही इन तीनो की सत्ता स्वीकार करनी होगी। तब-यह किस प्रकार सम्भव है? और ऐसा होने पर जगत् के अस्तित्ववाद का क्या रूप रहेगा?—“इस जगत् का अस्तित्व नहीं है।” जगत् मिथ्या है—इसका अर्थ क्या है? इसका यही अर्थ है कि उसका निरपेक्ष अस्तित्व नहीं है। मेरे, तुम्हारे और अन्य सब के मन के साथ इसका केवल आपेक्षिक अस्तित्व है। हम पाँच इन्द्रियों द्वारा जगत् को जिस रूप मे प्रत्यक्ष करते है, यदि हमारे एक इन्द्रिय और होती तो हम इससे अधिक कुछ नवीन प्रत्यक्ष करते और इससे भी अधिक इन्द्रिय सम्पन्न होने पर हम इसे और भी विभिन्न रूपो मे देख पाते। अतएव इसकी सत्ता नहीं है—वह अपरिवर्तनीय, अचल, अनन्त सत्ता इसकी नही है। किन्तु इसको अस्तित्वशून्य नहीं कहा जा सकता, कारण इसकी वर्तमानता है और इसके साथ मिलकर ही हमे कार्य करना होगा। यह सत् और असत् का मिश्रण है।

सूक्ष्म तत्त्वो से लेकर जीवन के साधारण दैनिक स्थूल कार्यों तक पर्यालोचन करने पर हम देखते है कि हमारा सम्पूर्ण जीवन ही सत् और असत् इन दोनो विरुद्ध भावो का सम्मिश्रण है। ज्ञान के क्षेत्र मे भी यह विरुद्ध भाव दिखाई पड़ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य जिज्ञासु होने से ही समस्त ज्ञान प्राप्त कर लेगा; किन्तु दो चार पग चलने के बाद ही एक ऐसा अभेद्य व्यवधान देखने मे आता है जिसको अतिक्रमण करना मनुष्य के वश के बाहर है। उसके सभी कार्य एक वृत्ताकार परिधि के अन्दर घूमते रहते हैं जिसको वह कभी लाँघ नही सकता। उसके अन्तरतम एवं प्रियतम रहस्य

१४ ज्ञानयोग

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१४ ज्ञानयोग

मीमांसा के लिये उसे दिन रात उत्तेजित तथा आह्वान करते है परन्तु इसका उत्तर देने मे वह असमर्थ है, कारण कि वह अपनी बुद्धि की सीमा का उल्लघन नहीं कर सकता। फिर भी वासनाएँ उसके अन्तर मे प्रवल वेग से उठती रहती है; किन्तु इस उत्तेजना का दमन ही एक मात्र मङ्गलकर पथ है, यह भी हम अच्छी तरह जानते है। हमारे हृत्पिण्ड का प्रत्येक स्पन्दन प्रत्येक निःश्वास के साथ हमे स्वार्थपर होने का आदेश करता है। दूसरी ओर एक अमानुषी शक्ति कहती है कि निःस्वार्थता ही एक मात्र मङ्गल का साधन है। जन्म से लेकर प्रत्येक बालक सुखाशावादी ( Optimist ) होता है; वह केवल सुख के ही स्वप्न देखता है। युवावस्था मे वह और भी अधिक आशावादी हो जाता है। मृत्यु, पराजय अथवा अपमान नाम की भी कोई वस्तु है यह बात किसी युवक की समझ मे आना कठिन है। अब वृद्धावस्था आती है; जीवन केवल एक ध्वंसराशि हो जाता है, सुख के स्वप्न आकाश मे विलीन हो जाते है और वृद्ध लोग निराशावादी हो जाते है। इसी प्रकार हम प्रकृति से ताडित होकर आशाशून्य, सीमा तथा गन्तव्य-ज्ञान से शून्य होकर एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव की ओर दौडते रहते है। ललितविस्तार मे लिखे हुए बुद्ध चरित का एक प्रसिद्ध गीत इस सम्बन्ध मे मुझे याद आता है। वर्णन इस प्रकार है कि बुद्धदेव ने मनुष्यों के परित्राता के रूप मे जन्म ग्रहण किया, किन्तु जब राजप्रासाद की विलासिता मे वे आत्मविस्मृत होने लगे तब उनको जगाने के लिये देवकन्याओं ने एक गीत गाया था जिसका मर्मार्थ इस प्रकार है,—“हम एक प्रवाह मे बहते चले जा रहे है, हम अविरत रूप से परिवर्तित हो रहे है—कही निवृत्ति नहीं है, कहीं विराम नहीं है।” इसी प्रकार हमारा जीवन विराम नहीं जानता,

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माया १५

अविरत चलता ही रहता है। अब उपाय क्या है ? जिनके पास खाने पीने की प्रचुर सामग्री है वे सुखाशावादी हो जाते है और कहते हैं, “ भय उत्पन्न करनेवाली दुःख की बाते मत कहो, क्लेश की बात मत सुनाओ।” उनके पास जाकर कहो—“ सभी मंगल है।” वे कहेगे, “ हम तो निरापद है ही ; यह देखो, कितनी सुन्दर अट्टालिकाओं मे हम वास करते है, हमे शीत का कोई भय नही है। अतएव हमारे सम्मुख यह भयावह चित्र मत लाना।” किन्तु दूसरी ओर देखिये, शीत और अनाहार से कितने ही लोग मर रहे है। जाओ उन्हे जाकर शिक्षा दो कि ‘ सभी मङ्गल है।’ किन्तु यह, जो इस जीवन मे भीषण क्लेश पा रहा है. वह तो सुख, सौन्दर्य और मंगल की बात सुनेगा ही नही, वह कहता है, “ सभी को भय दिखाओ, मै जब रो रहा हूँ तो और सब कैसे हँसेगे ? मै तो अपने साथ सभी को रुलाऊँगा; कारण कि जब मै दुःख से पीड़ित हूँ तो सभी दुःख से पीडित हो, इसीसे मेरी शान्ति होगी।” हम इसी प्रकार सुखाशावाद से निराशावाद की ओर चले जाते है। इसके बाद मृत्युरूप भयावह व्यापार आता है—सारा संसार मृत्यु के मुख मे चलता जा रहा है; सभी मरने जा रहे है। हमारी उन्नति, हमारे व्यर्थ के आडम्बर पूर्ण कार्यकलाप, समाज-संस्कार, विलासिता, ऐश्वर्य, ज्ञान—मृत्यु ही सब की एक, मात्र गति है। यही सर्वस्व है, यही सुनिश्चित है। नगर के नगर बनते और बिगडते जाते है। साम्राज्यो के उत्थान और पतन होते है, ग्रहादिक खण्ड खण्ड होकर धूलि के समान चूर्ण बन कर विभिन्न ग्रहो के वायु-प्रवाह मे इधर उधर विक्षिप्त होते रहते है। इसी प्रकार अनादिकाल से चलता आ रहा है। इस सब का लक्ष्य क्या है ? मृत्यु ही सब का लक्ष्य है, मृत्यु जीवन का लक्ष्य है,

१६ ज्ञानयोग

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१६ ज्ञानयोग

सौन्दर्य का लक्ष्य है, ऐश्वर्य का लक्ष्य है, शक्ति का लक्ष्य है, और तो और, धर्म का भी लक्ष्य है। साधु और पापी दोनों मरते हैं, राजा और भिक्षुक दोनों मरते हैं, सभी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। तब भी जीवन के प्रति यह विषम ममता विद्यमान है। हम क्यो इस जीवन की ममता करते हैं ? क्यो हम इसका परित्याग नहीं कर पाते ? यह हम नहीं जानते। यही माया है।

माता बड़े यत्न से सन्तान का लालन पालन करती है। उसका समस्त मन, समस्त जीवन मानो इसी सन्तान के लिये है। बालक बड़ा हुआ, युवावस्था को प्राप्त हुआ और शायद दुश्चरित्र एवं पशु होकर प्रतिदिन अपनी माता को मारने पीटने लगा, किन्तु माता फिर भी पुत्र पर मुग्ध है। जब उसकी विचारशक्ति जागृत होती है तब वह उसे अपने स्नेह के आवरण मे ढक कर रखती है। किन्तु वह नहीं जानती कि यह स्नेह नहीं है; एक अपरिज्ञेय शक्ति ने उसके स्नायु-मण्डल पर अधिकार कर लिया है। वह इसे दूर नहीं कर सकती। वह कितनी ही चेष्टा क्यों न करे, इस बन्धन को तोड़ नहीं सकती। यही माया है।

हम सभी कल्पित सुवर्ण लोमों* की खोज मे दौड़ते फिरते हैं। सभी के मन मे होता है कि यह हमारा ही प्राप्तव्य है; किन्तु


* सुवर्ण लोम (Golden Fleece):—ग्रीक पौराणिक साहित्य की कथा है कि ग्रीस के अन्तर्गत थेसाली देश मे राजवंशी आथामास की पत्नी नेफ़ेल के गर्भ से फ्रिक्सस नामक पुत्र और हेल नाम की कन्या ने जन्म लिया। कुछ दिन के बाद नेफ़ेल की मृत्यु होने पर आथामास ने कैडमस की कन्या ईनो के साथ विवाह किया। ईनो ने सपत्नी की सन्तान के प्रति विद्वेष होने के कारण नाना

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माया १७

उनमे से कितने मनुष्य इस संसार मे जीवित है ? सभी ज्ञानी लोग समझते हैं कि इस सुवर्ण लोम को प्राप्त करने की उनकी दो करोड़ मे एक से अधिक सम्भावना नही है ; तथापि प्रत्येक मनुष्य उसके लिये कठोर प्रयत्न करता है; किन्तु अधिकांश किसी को कुछ प्राप्त नहीं होता; यही माया है।

इस संसार मे मृत्यु रात दिन गर्व से मस्तक ऊँचा किये घूम रही है; हम सोचते है कि हम सदा जीवित रहेगे। किसी समय राजा युधिष्ठिर से यह प्रश्न पूछा गया कि "इस पृथ्वी पर अत्यन्त आश्चर्य की बात क्या है ?" राजा ने उत्तर दिया था, "नित्य ही लोग चारों ओर मर रहे हैं किन्तु जो जीवित है वे समझते है कि वे कभी मरेगे ही नही।" यही माया है।


प्रकार से अपने पति को फ्रिक्सस की देवताओ को बलि चढ़ा देने से सहमत किया। किन्तु बलिदान के पूर्व ही फ्रिक्सस की स्वर्गीया माता की आत्मा उनके सम्मुख आविर्भूत हुई और एक सुवर्ण लोम युक्त मेढे को उनके निकट लाकर उनको उस पर चढ़ कर समुद्र पार भाग जाने का आदेश देने लगी। मार्ग मे उसकी बहिन हेल गिर कर डूब गई—फ्रिक्सस ने कृष्ण सागर की पूर्व दिशा मे कलचिस नामक स्थान में उतर कर वहाँ के जिउस देवता को उसी मेंढे की बलि चढ़ा कर उसकी खाल को मार्स ( मंगल ) देवता के कुञ्ज मे टाँग दिया। एक दैत्य उसकी रखवाली के लिये नियुक्त हुआ। कुछ दिन बाद इस सुवर्ण लोम की खाल को लाने के लिये आथामास का भतीजा जैसन उसके प्रतिद्वन्द्वी पेलियस द्वारा नियुक्त किया गया और वह आर्गो नामक एक बड़े जहाज मे अनेक प्रसिद्ध वीर पुरुषों सहित बैठ कर नाना प्रकार के बाधा-विघ्नो को पार करता हुआ उक्त सुवर्ण लोम के लाने में सफल हुआ। ग्रीक पुराणों में यह कथा Argonautic Expedition नाम से विख्यात है।

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१८ ज्ञानयोग

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१८ ज्ञानयोग

हमारी बुद्धि, ज्ञान, जीवन, प्रत्येक घटना में यही विषम विरुद्ध भाव दिखाई पड़ता है। सुख दुःख का और दुःख सुख का अनुगामी हो रहा है। सुधारक आते हैं और किसी जाति के दोषों को दूर करने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु इसी बीच मे किसी दूसरी दिशा में बीस हजार दोष उस सुधार से पहले ही उठ खडे होते हैं। पतनोन्मुख जीर्ण अट्टालिका की भाँति एक स्थान पर जीर्णोद्धार करते करते दूसरे स्थान पर जीर्णता आक्रमण कर देती है। भारतीय स्त्रियों के बालविधवा हो जाने के दोष को दूर करने के लिये हमारे सुधारक लोग चीत्कार तथा प्रचार कर रहे हैं। किन्तु पाश्चात्य देशों मे अविवाहित रहना ही प्रधान दोष माना जाता है। एक स्थान पर अविवाहिताओ का कष्ट दूर करने मे सहायता करनी होगी तो दूसरे स्थान पर विधवाओं का कष्ट मिटाने का यत्न करना होगा; शरीर मे पुरानी वातव्याधि के समान शिर-स्थान से हटाने पर यह कमर आदि का आश्रय ले लेती है, वहाँ से हटाने पर पैरों का आश्रय ढूँढती है।

कोई कोई दूसरों की अपेक्षा अधिक धनवान हो गये हैं—विद्या, सम्पत्ति और ज्ञानानुशीलन केवल उन्हीं की सम्पत्ति हो गये हैं। ज्ञान कितना महत्तर और मनोहर है, ज्ञानानुशीलन कितना सुन्दर है! यह केवल कुछ लोगों के हाथ में है। कितनी भयानक बात है। अब सुधारक आये और सर्वसाधारण में इस ज्ञान का विस्तार करने लगे। इससे जनसाधारण एक प्रकार से कुछ सुखी हुए अवश्य, किन्तु ज्ञानानुशीलन जितना ही अधिक होने लगा, शारीरिक सुख शायद उतना ही अन्तर्हित होने लगा। अब कौन से मार्ग का अवलम्बन किया जाय?—क्योकि सुख के ज्ञान से ही तो दुःख का

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माया १९.

ज्ञान् होता है। हम लोग जो थोड़ासा सुख भोग रहे है, अन्य कहीं पर उससे उतना ही दुःख उत्पन्न हो रहा है। सभी वस्तुओ की यही अवस्था है। युवकगण शायद इस बात को न समझ पायें। किन्तु जिन्होने संसार मे बहुत दिन बिताये है, जिन्होने बहुतसी यंत्रणाये भोगी है वे इस बात को समझ सकेंगे। यही माया है। दिन रात ये समस्त व्यापार संघटित हो रहे है, किन्तु इनकी ठीक प्रकार से मीमांसा करना असम्भव है। इस प्रकार यह सब जो हो रहा है उसका कारण क्या है? इस विषय मे वास्तव मे न्यायसंगत कोई प्रश्न ही नही हो सकता; अतएव इस प्रश्न का उत्तर भी असम्भव है। इसका कारण जाना नहीं जा सकता। उत्तर देने से पहले इसका तात्पर्यबोध ही नहीं होगा, यह क्या है यह हम नहीं जान सकते। हम इसे एक क्षण को भी स्थिर नही रख सकते—प्रति क्षण यह हमारे हाथ से निकलता रहता है। हम सब अन्धे यंत्रो के समान परिचालित हो रहे हैं। यद्यपि हमने कभी कभी निःस्वार्थ भाव से जो कार्य किया है, परोपकार की जो चेष्टा की है उसे स्मरण करके कह सकते है, ‘क्यो, यह कार्य तो हमने समझ बूझ कर, सोच विचार कर किया था।’ किन्तु वास्तव मे हम उन कार्यों को किये बिना रह ही नहीं सकते थे, इसी कारण उन्हे किया था। मुझे इसी स्थान पर खड़े हो कर आप लोगो को भाषण द्वारा उपदेश देना पड़ रहा है और आप लोगो को बैठ कर इसे सुनना पड़ रहा है, यह भी हम लोग बिना किये रह नहीं सकते इसीलिये कर रहे है। आप घर लौट जायेंगे, शायद कुछ लोग थोड़ी बहुत शिक्षा भी प्राप्त करेगे. दूसरे शायद मन मे कहेगे, यह आदमी व्यर्थ ही वक रहा है। मैं भी घर चला जाऊँगा और सोचूँगा कि मैने आज भाषण दिया। यही माया है।

२० ज्ञानयोग

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२० ज्ञानयोग

अतएव इस संसार की गति के वर्णन का नाम ही माया है। साधारणतया लोग यह बात सुन कर भयभीत हो जाते हैं। हमें साहसी होना पड़ेगा। अवस्था के विषय को छिपाने से रोग का प्रतिकार नहीं होगा। कुत्तो से पीछा किये जाने पर जिस प्रकार खरगोश अपने मुँह को टाँगों मे छिपा कर अपने को निरापद समझता है, उसी प्रकार हम लोग भी आशावादी अथवा निराशावादी होकर ठीक उस खरगोश के समान कार्य करते है। यह रोगमुक्ति की औषधि नहीं है।

दूसरी ओर सांसारिक जीवन की प्रचुरता, सुख और स्वच्छन्दता भोगने वाले इस मायावाद के सम्बन्ध मे बड़ी आपत्तियाँ उठाते है। इस देश में, इंग्लैण्ड मे निराशावादी होना बहुत कठिन है। सभी मुझसे कहते है—जगत् का कार्य कितने सुंदर रूप से चल रहा है, जगत् कितना उन्नतिशील है ! किन्तु वे अपने जीवन को ही अपना जगत् समझते है। एक पुराना प्रश्न उठता है—ईसाई धर्म ही एक मात्र धर्म है। कारण, ईसाई धर्म को मानने वाली सभी जातियाँ समृद्धिशाली हैं। इस प्रकार की युक्ति से तो यह सिद्धान्त स्वयं ही भ्रामक सिद्ध हो जाता है। अन्य जातियो का दुर्भाग्य ही तो ईसाई जातियों की समृद्धि का कारण है, क्योकि एक का सौभाग्य दूसरो के शोणित द्वारा शोषण के बिना नही बनता। तो जब समस्त पृथिवी ईसाई धर्म को ही मानने लगेगी तब भक्ष्य स्वरूप इतर जातियो का नाश करने वाली ईसाई जाति स्वयं ही दरिद्र हो जायगी। अतः इस युक्ति ने अपना ही खण्डन कर दिया। उद्भिज पशुओ के लिये अन्न स्वरूप है, मनुष्य पशुओ का भोक्ता है, और सब से अधिक गर्हित कार्य यह है कि मनुष्य एक दूसरे का, दुर्बल बलवान् का भक्ष्य बन रहा है। यही हाल सर्वत्र विद्यमान्

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माया <span style="float: right;">२१</span>

है। यही माया है। इस रहस्य की आप क्या मीमांसा करते है ? हम प्रतिदिन ही नई नई युक्तियाँ सुनते है। कोई कहते है, अन्त मे सब का कल्याण होगा। इस प्रकार की सम्भावना अत्यन्त संदेहास्पद होने पर भी हम ने स्वीकार कर ली। किन्तु इस पैशाचिक उपाय से मंगल होने का कारण क्या है ? पैशाचिक रीति को छोड़ कर क्या मंगल द्वारा ही मंगलसाधन नही हो सकता ? वर्तमान मनुष्यो की सन्तान सुखी होगी; किन्तु उससे हमे क्या फल मिलेगा जिसके लिये हम इस समय ये भयानक यन्त्रणाये भोग रहे हैं ? यही माया है। इसकी मीमांसा नहीं है। सुना जाता है कि दोषों का क्रमशः धीरे धीरे दूर होता जाना क्रमविकासवाद ( Darwin's Evolution ) की एक विशेषता है; संसार से दोष का इस प्रकार क्रमशः दूर हो जाने पर अन्त मे केवल मंगल ही मंगल रह जायगा। सुनने मे तो बड़ा अच्छा लगता है। इस ससार मे जिसके पास सब वस्तुओ का प्राचुर्य है, जिन्हे प्रतिदिन कठोर यन्त्रणा सहनी नही पडती, जिन्हे क्रमविकास के चक्र मे पिसना नहीं पडता, उन लोगों के दम्भ को इस प्रकार के सिद्धान्त बढ़ा सकते है। सचमुच ही उनके लिये ये सिद्धान्त अत्यन्त हितकर और शान्तिप्रद हैं। साधारण जनसमूह यन्त्रणा भोगा करे—इनकी क्या हानि है ? वे सब मारे जायें—इसके लिये ये सोच विचार क्यों करे ? ठीक बात है, किन्तु यह युक्ति आदि से अन्त तक भ्रमपूर्ण है। प्रथम तो, ये लोग बिना किसी प्रमाण के ही धारणा कर लेते हैं कि संसार मे अभिव्यक्त मंगल और अमंगल का परिमाण एकदम निर्दिष्ट है। दूसरे, इससे भी अधिक दोषयुक्त धारणा यह है कि मंगल का परिमाण तो क्रमवृद्धि-शील है और अमंगल निर्दिष्ट परिमाण मे विद्यमान रहता है। अतएव ऐसा समय आयेगा कि जब अमंगल का अंश इसी प्रकार क्रमविकास

२२ ज्ञानयोग

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२२ ज्ञानयोग

के द्वारा घट जाने पर अन्त में बिलकुल नष्ट हो जायगा और केवल मंगल ही विराजित रहेगा—यह कहना बड़ा सरल है। किन्तु क्या यह प्रमाणित किया जा सकता है कि अमंगल का परिमाण निर्दिष्ट रहता है ? क्या अमगल की भी क्रमशः वृद्धि नहीं हो रही है ? एक जंगली मनुष्य है जो मनोवृत्तियों के परिचालन से सर्वथा अनभिज्ञ है, एक पुस्तक भी नहीं पढ़ सकता, हस्तलिपि किसे कहते है, उसने कभी सुना भी नहीं; आज रात को उसके बीस टुकड़े कर दो, कल वह स्वस्थ हो उठेगा। धार धरा हुआ अस्त्र उसके शरीर मे घुसा कर बाहर निकाल लो, फिर भी वह अच्छा हो जायगा; किन्तु हम अधिक सभ्य होने पर भी मार्ग मे चलते हुए ठोकर खाते ही मर जाते हैं।

मशीनो के द्वारा धन आदि सुलभ हो रहा है; उन्नति और क्रमविकास की वृद्धि हो रही है; किन्तु एक व्यक्ति धनी हो जायगा इसलिये लाखो मनुष्यो को पीसा जा रहा है—एक व्यक्ति धनवान बने इसलिये सहस्रो मनुष्य दरिद्र से दरिद्रतर हो रहे हैं—संख्यातीत मनुष्य के वंशज क्रीतदास बनाये जा रहे हैं। जगत् की धारा ही ऐसी है। जो मनुष्य पशुवत् हैं उनके समस्त सुखभोग इन्द्रियो में ही सीमित हैं; उनके दुख और सुख इन्द्रियों के भीतर ही सन्निविष्ट हैं। यदि उसे पर्याप्त भोजन नहीं मिलता अथवा उसे कोई शारीरिक रोग या कष्ट होता है तो वह अपने को अभागा समझता है। इन्द्रियो मे ही उसके सुख-दुख का उत्थान और पर्यवसान हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्ति की जब उन्नति होती रहती है तो उसके सुख की सीमा के विस्तार के साथ ही साथ उतने ही परिमाण में उसके दुःख की भी वृद्धि होती जाती है। जंगली मनुष्य ईर्ष्या के वश में होना