Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

१०० ज्ञानयोग

Page 104Permalink

१०० ज्ञानयोग

यदि संसार के नरनारियों के लाखवें भाग का एक भाग भी बिल्कुल चुप रह कर एक क्षण के लिये भी कहे,—" तुम सभी ईश्वर हो; हे मानवगण, हे पशुओ, हे सभी प्रकार के जीवित प्राणियो ! तुम सभी एक जीवन्त ईश्वर के प्रकाश हो, " तो आधे घण्टे के अन्दर ही समस्त जगत् का परिवर्तन हो जायगा। उस समय चारों ओर घृणा का बीज न फैला कर, ईर्ष्या और असत् चिन्ता का प्रवाह न फैला कर सभी देशो के लोग सोचेंगे कि सभी 'वह' है। जो कुछ तुम देख रहे हो या अनुभव कर रहे हो, वह सब वही है। तुम्हारे भीतर अशुभ न रहने पर तुम अशुभ किस तरह देखोगे ? तुम्हारे भीतर ही यदि चोर नहीं है तो तुम किस प्रकार चोर को देखोगे ? तुम स्वयं यदि खूनी नहीं हो तो किस प्रकार खूनी को देख सकते हो ? साधु हो जाओ, तो असाधुभाव तुम्हारे अन्दर से एक दम चला जायगा। इसी प्रकार समस्त जगत् का परिवर्तन हो जायगा, यही समाज का महान् लाभ है। मनुष्य के पक्ष मे यह महान् लाभ है। इन्हीं सब भावों को भारत मे प्राचीन काल मे अनेक महात्माओ ने आविष्कृत और कार्य रूप मे परिणत किया था। किन्तु आचार्यों की संकीर्णता तथा देश की पराधीनता आदि कारणो से यह सब चिन्ता चारो ओर प्रचार न पा सकी। ऐसा होने पर भी ये सब महान् सत्य है। जहाँ भी इन विचारों का प्रभाव पड़ा है वही मनुष्य ने देवत्व को प्राप्त किया है। इसी प्रकार के एक देवतास्वरूप मनुष्य के द्वारा मेरा समस्त जीवन परिवर्तित हो गया है; इस सम्बन्ध मे आगामी रविवार को मैं आप से कुछ कहूँगा। इस समय यही सब भाव जगत् मे प्रचार करने का समय आ गया है। मठों मे आबद्ध न रह कर, केवल पण्डितो के पढ़ने के लिये दार्शनिक पुस्तक-समूह मे आबद्ध न रह

Page 105Permalink

मनुष्य का यथार्थ स्वरूप १०१

कर, केवल कुछ सम्प्रदायों के अथवा कुछ पण्डितों के एकमात्र अधिकार मे न रह कर इसका समस्त जगत् मे प्रचार होगा जिससे यह साधु, पापी, आबालवृद्धवनिता, शिक्षित, अशिक्षित सभी की साधारण सम्पत्ति हो सके। तब ये सब भाव जगत् की वायु मे खेलेगे और हम जो वायु श्वास-प्रश्वास द्वारा ले रहे है वह प्रत्येक ताल पर बोलेगी—'तत्त्वमसि', यह असंख्य चन्द्र-सूर्य-पूर्ण ब्रह्माण्ड वाक्योच्चारण करने वाले प्रत्येक पदार्थ के भीतर से बोल उठेगा—'तत्त्वमसि'!


Page 106Permalink

५. माया और ईश्वरधारणा

का

क्रमविकास

हमने देखा कि अद्वैत वेदान्त की एक मूलभित्ति स्वरूप माया-वाद अस्पष्ट रूप से संहिताओं मे भी देखा जाता है, और उपनिषदो मे जिन तत्त्वों को खूब परिस्फुट रूप मिल गया है वे सभी संहिताओं मे अस्पष्ट रूप से किसी न किसी आकार मे विद्यमान है। आप मे से बहुत से लोग अब मायावाद के तत्त्व को सम्पूर्ण रूप से समझ गये होंगे या समझ सकेंगे; प्रायः लोग भ्रान्तिवशतः माया को 'भ्रम' कह कर व्याख्या करते हैं, अतएव वे जब जगत् को माया कह कर पुकारते है तब उसे भी भ्रम ही कह कर व्याख्या करनी पड़ेगी। माया को 'भ्रम' के अर्थ मे लेना ठीक नहीं है। माया कोई विशेष मत नहीं है, वह तो केवल विश्वब्रह्माण्ड के स्वरूप का वर्णन मात्र है। उसी माया को समझने के लिये हमे संहिता तक जाना पडेगा और प्रथम माया का क्या अर्थ था, उसके सम्बन्ध मे क्या धारणा थी यह भी देखना पड़ेगा। हम देख चुके हैं, लोगों मे देवताओ का ज्ञान किस रूप मे आया। हमे समझना होगा कि ये 'देवता पहले केवल शक्तिशाली पुरुष मात्र थे। आप लोगों मे से बहुत से यह पढकर कि ग्रीक, हिब्रू, पारसी अथवा अन्य जातियों के प्राचीन शास्त्रों में देवता लोग हमारी दृष्टि मे जो सब कार्य अत्यन्त घृणित है वे करते थे,

Page 107Permalink

माया और ईश्वरधारणा का क्रमविकास १०३

भयभीत हो जाते है; किन्तु हम एक दम भूल जाते हैं कि हम लोग उन्नीसवी शताब्दी के हैं और देवता अनेक सहस्र वर्ष पहले के जीव थे; और हम यह भी भूल जाते हैं कि इन सब देवताओं के उपासक लोग उनके चरित्र मे कुछ भी असंगत देख नही पाते थे और वे जिस प्रकार से उन देवताओ का वर्णन करते थे उससे उन्हें कुछ भी भय नही होता था, कारण वे सब देवता उन्ही के समान थे। हम लोगो को आजीवन यह बात सीखनी होगी कि प्रत्येक व्यक्ति के बारे मे उसी के आदर्शों के अनुसार विचार करना होगा, दूसरो के आदर्शों के अनुसार नही। ऐसा न करके हम दूसरों को अपने आदर्शों की दृष्टि से देखते है। यह ठीक नहीं। हमारे आसपास रहने वाले सभी लोगो के साथ व्यवहार करने मे हम सदा यही भूल करते है, और मेरे मतानुसार, दूसरों के साथ हमारा जो कुछ भी वाद-विवाद होता है वह सब इसी एक कारण से होता है कि हम दूसरो के देवता को अपने देवता के द्वारा, दूसरों के आदर्शों को अपने आदर्शों के द्वारा और दूसरो के उद्देश्य को अपने उद्देश्य के द्वारा विचार करने की चेष्टा करते है। विशेष विशेष अवस्थाओ में हो सकता है कि मैं कोई विशेष कार्य करूँ, और जब मै देखता हूँ कि अन्य व्यक्ति वही कार्य कर रहा है तो मै सोच लेता हूँ कि उसका भी वही उद्देश्य है; मेरे मन मे यह बात एक बार भी नहीं उठती कि यद्यपि फल एक हो सकता है तथापि भिन्न भिन्न सहस्रो कारण वही एक फल उत्पन्न कर सकते है। मै जिस कारण से उस कार्य को करने मे प्रवृत्त होता हूँ, अन्य सब लोग उसी कार्य को अन्य उद्देश्यों से कर सकते है। अतएव इन सब प्राचीन धर्मों के ऊपर विचार करते समय हम जिस भाव से दूसरो के सम्बन्ध मे सोचते है वैसा न करें