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ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

ज्ञानयोग (स्वामी विवेकानन्द - हिन्दी अनुवाद)

Jnana Yoga - Swami Vivekananda (Hindi)

by स्वामी विवेकानन्द

DevanagariHindipublished332 pages

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माया <span style="float: right;">२१</span>

है। यही माया है। इस रहस्य की आप क्या मीमांसा करते है ? हम प्रतिदिन ही नई नई युक्तियाँ सुनते है। कोई कहते है, अन्त मे सब का कल्याण होगा। इस प्रकार की सम्भावना अत्यन्त संदेहास्पद होने पर भी हम ने स्वीकार कर ली। किन्तु इस पैशाचिक उपाय से मंगल होने का कारण क्या है ? पैशाचिक रीति को छोड़ कर क्या मंगल द्वारा ही मंगलसाधन नही हो सकता ? वर्तमान मनुष्यो की सन्तान सुखी होगी; किन्तु उससे हमे क्या फल मिलेगा जिसके लिये हम इस समय ये भयानक यन्त्रणाये भोग रहे हैं ? यही माया है। इसकी मीमांसा नहीं है। सुना जाता है कि दोषों का क्रमशः धीरे धीरे दूर होता जाना क्रमविकासवाद ( Darwin's Evolution ) की एक विशेषता है; संसार से दोष का इस प्रकार क्रमशः दूर हो जाने पर अन्त मे केवल मंगल ही मंगल रह जायगा। सुनने मे तो बड़ा अच्छा लगता है। इस ससार मे जिसके पास सब वस्तुओ का प्राचुर्य है, जिन्हे प्रतिदिन कठोर यन्त्रणा सहनी नही पडती, जिन्हे क्रमविकास के चक्र मे पिसना नहीं पडता, उन लोगों के दम्भ को इस प्रकार के सिद्धान्त बढ़ा सकते है। सचमुच ही उनके लिये ये सिद्धान्त अत्यन्त हितकर और शान्तिप्रद हैं। साधारण जनसमूह यन्त्रणा भोगा करे—इनकी क्या हानि है ? वे सब मारे जायें—इसके लिये ये सोच विचार क्यों करे ? ठीक बात है, किन्तु यह युक्ति आदि से अन्त तक भ्रमपूर्ण है। प्रथम तो, ये लोग बिना किसी प्रमाण के ही धारणा कर लेते हैं कि संसार मे अभिव्यक्त मंगल और अमंगल का परिमाण एकदम निर्दिष्ट है। दूसरे, इससे भी अधिक दोषयुक्त धारणा यह है कि मंगल का परिमाण तो क्रमवृद्धि-शील है और अमंगल निर्दिष्ट परिमाण मे विद्यमान रहता है। अतएव ऐसा समय आयेगा कि जब अमंगल का अंश इसी प्रकार क्रमविकास